बैंकों की कठिन होती डगर

बैंकों की कठिन होती डगर

मीडियावाला.इन।
जनता और जनता में शामिल मै सरकार के हर कदम का समर्थन करने का जब-जब मन बनाता हूँ सरकार एक न एक काम ऐसा कर देती है कि ये सपना चकनाचूर हो जाता है ।नए मोटर व्हीकल क़ानून का समर्थन कर मैंने सोचा था कि सरकार को जनता की बहुत चिंता है लेकिन मेरा सोचना गलत निकला।जिस सरकार ने जन-धन खातों के जरिये आम आदमी को बैंकों तक आकर्षित किया था वो ही सरकार अब अपने नियमों  में संशोधन कर आम जनता के लिए बैंकों की डगर को कठिन बनाने जा रही है।
देश के सबसे बड़ी सरकारी बैंक भारतीय स्टेट बैंक ने 1  अक्टूबर से अपनी तमाम सेवाओं को स-शुल्क बना दिया है। अब आप अपने खाते से केवल तीन बार पैसा जमा कर पाएंगे और अगर चौथी बार गए तो आपको पैसा देना पड़ेगा वो भी जीएसटी के साथ ।ये शुल्क भी थोड़ा-बहुत नहीं पूरे पचास रूपये ,पांचवीं बार के लिए ये रकम 56  रूपये होगी ।भले ही आप चौथी बार मात्र सौ रुपया जमा करना चाहते हों बैंक ने चैक वापसी पर भी अपने नियमों में बदलाव किया है ,अब चैक वापस होने पर 158  रूपये देना पड़ेंगे ।
आपको बता दें कि दुनिया तेजी से डिजिटल होती जा रही है। एक जमाना था, जब हर काम नकदी से होता था लेकिन अब क्रेडिट और डेबिट कार्ड चलता है। सरकार भी 'डिजिटल इंडिया' को जोर-शोर से प्रमोट करती है और कैशलेस लेन-देन को बढ़ावा दे रही है। ऐसे में यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि आज के जमाने में कोई व्यक्ति ऐसा भी होगा, जिसका कोई बैंक खाता नहीं है।मगर सच्चाई यह है कि दुनिया की एक बड़ी आबादी बैंकिंग सेवाओं से महरूम है और ऐसे वंचित लोगों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी भारत में है।
विश्व बैंक की एक  रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के करीब 19 करोड़ वयस्कों का कोई बैंक खाता नहीं है, जबकि यह चीन के बाद दूसरी सबसे बड़ी आबादी है। हालांकि देश में खाताधारकों की संख्या वर्ष 2011 में 35 फीसदी से बढ़कर 2017 में 80 फीसदी हो चुकी है।भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, जन धन खाताधारकों की संख्या साल 2017 के मार्च में 28.17 करोड़ थी, जो 2018 के मार्च में बढ़कर 31.44 करोड़ हो गई। देश में 2015 के मार्च में कुल चालू और बचत खातों की संख्या 122.3 करोड़ थी, जो 2017 के मार्च में बढ़कर १५७.1 करोड़ हो गई। साथ ही बैंक खातों के मामले में लैंगिक भेद कम हुआ है और अब 83 फीसदी पुरुषों और 77 फीसदी म हिलाओं के पास बैंक खाते हैं
माना जाता है कि  वित्तीय सेवाओं तक लोगों की पहुंच मुहैया कराना गरीबी और असमानता को मिटाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है । लेकिन बैंकों के नए नियम इन कदमों में एक बड़ी बाधा है। नए नियमों के तहत चालू खाताधारक प्रति दिन 25  हजार रूपये तक जमा करा सकते हैं लेकिन इसके बाद उन्हें प्रति  एक हजार की राशि पर 7   रूपये और जीएसटी देना होगी 25  हजार रूपये तक का बैलेंस रखने वाले केवल दो बार मुफ्त में पैसा जमा करा सकते हैं इसके बाद उन्हें हर बार 50  रूपये देना होंगे ।एक लाख तक का बैलेंस रखने वाले खाता धारक ही केवल 15  बार निशुल्क जमा करने का लाभ ले सकता है सोलहवीं बार उसे भी लें-दें पर अतिरिक्त पैसा देना होगा ।
बैंक वाले हम लेखकों से ज्यादा अर्थशास्त्री होते हैं इसलिए उन्होंने बहुत मगजमारी कर ये नियम बना लिए हैं ।काजों में नए नियमों से बैंकों की आमदनी बढ़ जाएगी लेकिन किसी ने ये नहीं सोचा कि इसका बैंकिंग पर क्या और कैसा प्रतिकूल असर पडेगा ।क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक जन-धन खाता धारक इस बढ़े हुए शुल्क को वहन कर सकता है ? क्या एक कारोबारी जिसकी रोजाना की बिक्री 25  हजार रूपये से ज्यादा होगी इस राशि को आसानी से झेल सकता है ? शायद नहीं ।मुझे लगता है कि ऐसा करने से बैंकों में रकम जमा करने और निकालने की प्रवृत्ति हतोत्साहित होगी और धन की तरलता कम होगी ।लोग बैंकों से विमुख होने लगेंगे ।समस्या ये है कि बैंक सेवाओं से कमाई करने के इस छुपे प्रयास के खिलाफ न हमारे जन प्रतिनिधि बोलते हैं और न अन्य संगठन ।सब कुछ चुपचाप थोप दिया जाता है ।आने वाले कल में बैंकों पर नए नियमों से ग्राहकों की भीड़ बढ़ेगी या घटेगी कहना कठिन है लेकिन ये व्यवस्था भारत जैसे देश में जन विरोधी है
@ राकेश अचल 

 

 

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राकेश अचल

राकेश अचल ग्वालियर - चंबल क्षेत्र के वरिष्ठ और जाने माने पत्रकार है। वर्तमान वे फ्री लांस पत्रकार है। वे आज तक के ग्वालियर के रिपोर्टर रहे है।