सब तुम्हारी तरह नहीं होते दानिश

सब तुम्हारी तरह नहीं होते दानिश

मीडियावाला.इन।

दानिश सिद्दीकी से मेरी कभी मुलाक़ात नहीं हुई.हो भी नहीं सकती थी .वो मुम्बई का और मै ग्वालियर का पत्रकार.फिर भी मै दानिश को जानता था . दानिश सही मायनों में दानिश था,दानिश यानि शिक्षा,दानिश यानि विज्ञान ,दानिश हर मामले  में दानिश थे  .थे इसलिए कह रहा हूँ ,क्योंकि वे अब नहीं हैं.अफगानिस्तान में एक सैनिक की तरह शहीद हो गए हैं .वे बन्दूक के सिपाही नहीं थे,वे विज्ञान की उस आँख के सिपाही थे जो जान हथेली पर रखकर जो देखती थी सो दुनिया को दिखाती थी ,लेकिन ऐसे दानिश के वध को लेकर हमारी सरकार का मौन भयानक है .लज्जास्पद है ,चिंताजनक है और अंतर्राष्ट्रीय स्टार पर इसके अनेक मायने निकाले जा रहे हैं .
दानिश सुपुर्दे ख़ाक किये जाएंगे   हैं .उनके लिए फातिहा पढ़ा जाएगा .जितने आंसू बहाये जा सकते थे ,बहाये जा चुके हैं,लेकिन हैरान है कि हमारी सरकार,हमारे वजीरे आजम,हमारे वजीरे खारिजा सब खामोशी ओढ़कर बैठे हैं,जैसे दानिश का भारत से कोई ताल्लुक ही न हो .लगता है कि भारत सरकार के लिए दानिश केवल 'रायटर' का एक मुलाजिम भर था .उसके भारतीय होने और जंग के मैदान में मारे जाने से भारत की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता .
मुझे भारत की विदेश नीति का बहुत ज्यादा ज्ञान नहीं है .सुना है कि भारत के विदेश   मंत्रालय में एक कैबिनेट और तीन राज्य मंत्री हुआ करते हैं,लेकिन किसी ने भी दानिश की मौत को न तो शहादत मना और न अफ़सोस ही जताया .मुकिन है कि ये सब हमारी सरकार की विदेशनीति का हिस्सा हो कि देश के भीतर आतंकवाद पर दोनों आँखों से पांच वक्त की नमाज की तरह गंगा-जमुना बहाओ लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर जब बोलने का मौक़ा आये  तो मौन धारण कर लो .विदेश मंत्रालय से हमारा विशेष लगाव इसलिए है क्योंकि देश की आपातकाल के बाद बनी केंद्र सरकार में हमारे शहर के पुरोधा अटल बिहारी बाजपेयी को विदेश मंत्री बनाया गया था .हमें लगता है कि यदि आज डॉ एस जयशंकर की जगह हमारे पंडित अटल बिहारी बाजपेयी होते तो दानिश के वध पर जरूर बोलते .
दरअसल दोष दानिश का है.वे रायटर के मुलाजिम थे.भारत के गोदी मीडिया का हिस्सा नहीं थे,जो होते तो दानिश की मौत पर प्रधानमंत्री से लेकर भागवत साहब तो रोते.छाती पीटते.तालिबान को कड़ी से कड़ी सजा देने के लिए मांग करते .इस समय देश में जो सरकार की गोदी में नहीं बैठता वो अव्वल तो देशप्रेमी नहीं हो सकता और गाहे बगाहे हो भी जाये तो उस सम्मान का हकदार नहीं हो सकता जो एक शहीद पत्रकार को मिलना चाहिए ..
दानिश ने अपनी छोटी सी जिंदगी में बड़े कारनामे किये.बड़े सम्मान भी हासिल किये.हमें दानिश पर फक्र होता है लेकिन देश में फक्र का काम केवल राजनेता करते हैं ,पत्रकार,साहित्यकार,इतिहासकार ,कलाकार नहीं करते .भारत में शोक भी केवल राजनेताओं के लिए मनाया जाता है .झंडे भी उन्हों के लिए झुकते हैं .दानिश चाहे पत्रकार हो या और कोई ,गर्व का कारण नहीं हो सकता .अगर यही दानिश किसी राजनीतिक दल का सदस्य होता .किसी मोर्चे से जुड़ा होता तो मुमकिन है कि उसकी मौत को भी शहादत मान  लिया जाता .
वातानुकूलित दफ्तरों और सरकारी विमानों में बैठकर काम करना अलग बात है और दानिश की तरह बारूद की आग और बम धमाकों के बीच काम करना अलग बात है. हमारे देश में सैन्य विज्ञान में स्नातक,स्नातकोत्तर और डॉक्टरेट को उपाधियाँ हासिल कर सरकारी नौकरियां हासिल करने वालों की कोई कमी नहीं है. कोई कमी नहीं है सेना से प्रशिक्षण लेकर सैन्य गतिविधियों का कव्हरेज करने वाले पत्रकारों की भी ,किन्तु सबको दानिश की तरह न काम करने के अवसर मिलते हैं और न शहादत की अनमोल घड़ियाँ ,ऐसी घड़ियों पर दुनिया के तमाम पुरस्कार वारे जा सकते हैं .
दानिश के दो छोटे बच्चे हैं,पिता हैं ,वे उसकी शहादत पर गर्व करेंगे.उसके मुहल्ले वाले करेंगे ,उसके शहर वाले करेंगे .कर रहे हैं. एक सरकार को छोड़ पूरे देश को दानिश की शहादत पर गर्व है,जिन्हें गर्व नहीं है वे और लोग हैं.और क्या वे पक्के देशभक्त लोग हैं.दानिश ने उनसे कभी देशभक्ति का प्रमाण पत्र लिया ही नहीं  .दुनिया में आतंकवाद और नृशंसता का प्रतीक तालिबान अपने आपको निर्दोष बताता है. तालिबान  के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने एक बयान में कहा, हमें नहीं पता कि किसकी गोलीबारी में पत्रकार मारा गया। हम नहीं जानते कि उनकी मृत्यु कैसे हुई। 
गर्व और दुख से भरी आवाज में अपने 'प्रतिभाशाली' बेटे दानिश सिद्दीकी को याद करते हुए मोहम्मद अख्तर सिद्दीकी ने कहा, 'वह बहुत भावुक व्यक्ति था।'दानिश यदि भावुक न होता तो जंग के मैदान में मानवता के साथ होने वाली क्रूरता का तर्जुमा अपने कैमरे से करने न जाता .दानिश कोई अनाड़ी नौजवान नहीं था ,उसने पूरे होशो-हवास में अपने लिए जंग का मैदान चुना था .दानिश सिद्दीकी 2011 से समाचार एजेंसी रॉयटर्स के साथ बतौर फोटो पत्रकार काम कर रहे थे। उन्होंने अफगानिस्तान और ईरान में युद्ध, रोहिंग्या शरणार्थी संकट, हांगकांग में प्रदर्शन और नेपाल में भूकंप जैसी महत्वपूर्ण घटनाओं की तस्वीरें ली थीं। मुंबई में रह रहे दानिश को पुलित्जर पुरस्कार भी मिल चुका था।दानिश की भूमिका महाभारत के संजय जैसी थी वो संजय जो दृष्टिबाधित धृतराष्ट्र को युद्ध के समाचार देखकर सुनाता था .संयोग देखिये कि आज भी दुनिया में संजय और धृतराष्ट्र दोनों मौजूद हैं ,लेकिन उनके रिश्ते पहले जैसे मधुर नहीं रहे .
 दानिश सिद्दीकी अफगानिस्तान आने के बाद से ही अपने ट्विटर हैंडल पर काफी सक्रिय थे और उन्होंने 13 जुलाई को अपने ऊपर तालिबान के हमले का एक वीडियो भी शेयर किया था। जिसमें उन्होंने बताया कि वो हमले में बाल-बाल बचे, लेकिन तीन दिन बाद तालिबान ने उन्हें मार गिराया।दानिश यदि मौत से खौफजदा होते तो मोर्चा छोड़कर वापस आ सकते थे ,लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया .वे कर्तव्यपथ पर डटे रहे ,एक पत्रकार की तरह,एक सिपाही की तरह .
कहने के लिए भारत सरकार अब इस मामले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ले गयी है ,लेकिन इससे हासिल क्या होगा,जिस तीब्र प्रतिक्रिया की जरूरत थी ,वो तो भारत ने दी ही नहीं .भारत चीन से डरता है.पाकिस्तान से तो क्या उसके ड्रोन से डरता है ऐसे में तालिबान से यदि डर गया तो कोई नई बात नहीं है.भारत से तो बेहतर तालिबान से जूझ रहा अफगानिस्तान  है.अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने  दानिश सिद्दीकी की हत्या पर दुख जाहिर किया।लेकिन हमारे प्रथम नागरिक मौन हैं .ये सब बातें ही भारतीयों को हतोत्साहित करती हैं .आज पूरे भारत को दानिश पर गर्व होना चाहिए था,लेकिन नहीं है ,क्योंकि वो किसी भगवा संगठन का सदस्य नहीं था ,दानिश रोहित सरदाना नहीं था ,इसलिए उसकी मौत उतना द्रवित नहीं करती न सरकार को और न गोदी मीडिया को ..दानिश तुम जाओ,तुम्हारी शाहदत चाँद-तारों ने देखी है .तुम्हारा नाम फलक पर रोशन है .दानिश मुमकीनहै की हमारी सरकार गुसलखाने में हो ,इसलिए तुम पर गर्व करना या क्षोभ जताना भूल गयी हो.! 

राकेश अचल

राकेश अचल ग्वालियर - चंबल क्षेत्र के वरिष्ठ और जाने माने पत्रकार है। वर्तमान वे फ्री लांस पत्रकार है। वे आज तक के ग्वालियर के रिपोर्टर रहे है।

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