खत लिख दिया माई-बाप सरकार के नाम

खत लिख दिया माई-बाप सरकार के नाम

मीडियावाला.इन।

मान्यवर  प्रशासन,

मजलूम अवाम का नमस्कार कबूल करें। 
लम्बे अरसे से आपसे कुछ बोलने-बतियाने की हुक उठ रही है। क्या आप हमसे बात करना पसंद करेंगे? चलिये, बात मत कीजिये, सुनना चाहेेंगे? कोई बात नहीं, वह न सही तो रियाया का रिरियाना ही सुन लीजिये। यह तो चलेगा ना ? तो मुद्दे पर आते हैं। देश में बिन बुलाये मेहमान की आमद हुई तो उससे गले मिलने, हाथ मिलाने, बचने के लिये आपने तालाबंदी का फरमान जारी कर सब कुछ बंद कर दिया, हमने स्वागत किया। आपने राशन-पानी बंद कर दिया, हमने स्वीकार किया। आपने दूध,सब्जी, फल भी बंद कर दी तो भी हमने सहमति दी। एक-दो दिन नहीं अब तो पंद्रह दिन तो और बढ़ ही गई है तो ढाई महीना पक्का ही समझें। 
   थोड़ा आगे बढ़ते हैं। कुछ जाहिल लोगों ने आप पर थूंका, पत्थर बरसाये,हमने उनकी भद कर दी। इस तालाबंदी से जिनका राशन-पानी बंद हो गया था, उनके लिये हमने मैदान संभाला तो आप रैफरी बनकर आये और कहा कि खिलाड़ी भी आप और रैफरी भी आप तो हमने कहा, जी सर। आप 25 मार्च से हुक्म देते आ रहे हैं, हम तामील कर रहे हैं। कुछ बुराई नहीं है। एकाध हफ्ता बीता तो हम उम्मीद से हुए कि कम से कम राशन की उपलब्धता होने लगेगी। आपकी ओर हसरत भरी निगाह से देखा, आप हिकारत से देखते हुए आगे निकल गये।अवाम से बेरुखाई, यह शायद आपके प्रशिक्षण का हिस्सा है, ऐसा हमने सुना है। ठीक सुना सरकार?
   आपकी पुलिस ने दूध की टंकियां गांव वापस लौटा दी, हम कुछ नहीं बोले। आपने गली-मोहल्ले की छोटी-छोटी किराना दुकानें भी बंद करवा दी, ब्रेड,टोस्ट की बैकरी बंद करवा दी,इंदौरियों की जान, उनकी रगों में बहते खून के समान नमकीन की दुकानें बंद करवा दीं,चाय-पोहे के ठीये बंद करवाये। आपने अप्रैल के पहले हफ्ते में जाकर अंगुलियों पर गिनने लायक किराना दुकानों को ऑर्डर पर किराना घर तक पहुंचाने की सुविधा प्रारंभ की, हमने उसमें अपनी खैर समझी। आपने मई के पहले हफ्ते में हमें सब्जी खाने लायक समझा तो भी हमने उफ नहीं किया। आपने मई के तीसरे हफ्ते में बीमार, बच्चों, व्रत-उपवासी लोगों पर दया कर फलों का प्रदाय प्रारंभ कराने की घोषणा की, हम खुश हो गये।
     कोरोना से लड़ते-लड़ते पुलिस, स्वास्थ्यकर्मी भी चपेट में आ गये तो कुछ कर्तव्यनिष्ठ कोरोना सिपाही जान पर खेल गये, हमने फूल बरसाये, ताली-थाली,शंख,घंटी,बजाई। हम अपनी जिम्मेदारी कभी नहीं भूले सरकार। आपने हमें कहीं दूर-पास अपने परिजन के पास प्रवास कर जाने की इजाजत नहीं दी तो भी हम मान गये। आपने हजामत की दुकान नहीं खुलने दी तो हमने आदि मानव बनना कबूल कर लिया। अरे हां, आपने भले ही एक-दो दिन ही सही मदिरालय खुलवाये तो हम सबसे ज्यादा आभारी हुए, कृतज्ञ हुए। देश की चरमराती अर्थ व्यवस्था में हमारा किंंिचत-सा योगदान हमेशा याद रखा जाये,ऐसी छोटी-सी ख्वाहिश है हमारी।
    हम जानते हैं कि आपने हमें घरों में कैद कर हमारी जान की सलामती का दायित्व निभाया है। आपने हमारी पीढिय़ों को अपने अहसान तले ले लिया कि हमे बेमौत मरने के लिये नहीं छोड़ा। हम जानते हैं कि रियाया का दायित्व है कि वह रिरियाती रहे, तकलीफ उठाये, अभाव झेले, डंडे खाये, गाली खाये,अपमान सहे, रिश्वत दे। यह हमारा राष्ट्रीय चरित्र है और हमारी नियति भी। कसम से, हम इस पर खरे उतरे। पर हुजूर, इजाजत दें तो एक छोटा-सा सवाल पूछूं? बस इतना कि हमसे कभी खुश हो पायेेंगे?
    रहने दीजिये हुजूर, इस पर और कभी बात कर लेंगे, अरे बात नहीं करेंगे , कह लेेंगे भर । आप तो इतना इशारा भर कर दीजिये कि 14 अप्रैल, 17 मई, 30 मई के बाद वो कौन-सी तारीख है, जो घर कैद जारी रखने के लिये मुकर्रर की गई है? कुछ खास नहीं करना था, बस यूं ही। अब खाली बैठे हैं तो थोड़ी दिल्लगी तो बनती है ना हुजूर?
     क्या है ना, काम-धंधा तो कुछ है नहीं और आपने बाहर जाने भी दिया तो सच कहूं, कोई सुन न लें, कोई खास काम-धंधा तो मिलना भी नहीं है,न कारोबार ही दौड़ पडऩा है। बस क्या है कि एक आदत-सी हो गई है कि कहीं अपने दफ्तर, दुकान, कारखाने या चौराहे पर अपनी बारी के इंतजार में सुबह से खड़े हो जाते हैं तो लगता है हमने अपना काम तो कर लिया। यह ऐसी ही आदत है, जैसी तमाकू खाने वाले को सुबह हाजत के पहले फक्की मारने की होती है ना वैसी ही। जैसे लॉटरी का टिकट खरीदते हैं तब लगता है कि पहला नंबर तो अपना ही आयेगा। यह एक उम्मीद होती है जो हर टिकट खरीदने वाले को होती है। ऐसी ही उम्मीद चुनाव में टिकट पाने वाले को भी होती है कि जितेगा तो वही, भले ही उसकी जमानत जब्त हो जाये। दरअसल, जैसे मोहल्ले के कुत्ते को यह गुमान होता है कि वह रात के अंधेरे में बेवजह भौंक लेगा तो लोग समझेंगे कि कोई अजनबी मोहल्ले में घुस आया है या वहां से गुजर रहा है और कुत्ते अपना फर्ज निभा रहे हैं । अवाम भी ऐसी ही गाहे-बगाहे भौंकती रहती है ताकि उसे यह भ्रम बना रहे कि कंपनी सरकार उसकी सुनेगी। कंपनी सरकार कान में तेल डाले बैठी रहे तो अवाम क्या बिगाड़ लेगी? अब अवाम कोई गब्बरसिंह तो है नहीं , वह तो हाथ कटी साक्षात् ठाकुर है। गब्बर उसे रोज सताता है और ठाकुर कटे हाथ से पांच साल में एक बार ठप्पा लगाकर सोचता है उससे बहादुर कोई नहीं। 
      इसलिये करबद्ध प्रार्थना है कि 30 मई के बाद कब, कैसे, कहां-कहां खुलेगा, क्या-क्या बंद रहेगा, यह पता भर चल जाता तो सच्ची एक तौला खून सब का बढ़ जाता। इससे होना-जाना कुछ नहीं है, वह तो आप ही तय करेंगे, हम जानते हैं। लेकिन क्या है कि लोकतंत्र में अवाम के भी कुछ हक होते हैं, ऐसा भाषणों में सुनते रहते हैं तो थोड़ा जुगाली कर लेते हैं। आप बुरा मत मानियेगा। आप तो बड़े दिलवाले हैं। जानते हैं, सब आपके बस का भी नहीं है। कंपनी सरकार भी कोई हुकुम जारी करती है तो आपसे ही पूछती है। तो आप उनसे पूछकर बता दीजियेगा।
    अब देखिये क्या है कि आपने एकदम से कह दिया कि सब कुछ खुल जायेगा तो भी हमारा तो हार्ट फैल ही हो जायेगा। अब आदत ही नहीं रही ना इतनी खुशी की । तो ऐसा कीजियेगा भी मत। यह कोई आदेश नहीं है, आग्रह है। वैसे एक बात बोलें , यदि आप इजाजत दें? यही कि किसी महामारी, बीमारी, संकट, मुश्किल से बचने,बचाने का यह तरीका है नायाब। बम पानसेमल में गिरे तो पचमढ़ी को भी बंद कर दो। खल्लास,कोई चकल्ल्स नहीं होगी। जो मोहल्ले के मोहल्ले ही संक्रमित थे, आपने उनके आस-पड़ोस के अलावा सवा दो महीने तक पूरे शहर के घरों पर ही अलीगढ़ी ताला जड़ दिया । एक कहावत किताबों में तो खूब पढ़ी थी कि न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। इसका अमल अब जाकर देखा। होता है यह तो। वैसे भी हमारे देश में किताबी बातें और होती हैं और व्यावहारिक बातें कुछ और। 
     बहुत मामूली-सी याद है 1962 व 65 के युद्ध काल की। तब रात होते ही सायरन बजता और पूरे देश में बिजली, चिमनी, लालटेन  बंद कर दी जाती। रात के अंधेरे में भी तब सडक़ पर कोई नहीं निकलता। अपनी ही सेना का विमान भी आसमान से गुजरता तो लगता दुश्मन का विमान तो नहीं ? अब कहां तो वाघा सीमा और कहां इंदौर, कुक्षी। फिर भी बंद याने बंद। 65 के बाद पैदा हुई पीढ़ी ने वह सब तब देखा नहीं था तो अब अलग तरह से देख लिया । प्रशासन के नित-नये फरमान रूपी सायरन से सब सहमे-सहमे रह रहे हैं, रात-दिन का भेद भुलाकर। बाहर निकले तो मरेंगे ही,ऐसी कोई गारंटी न होने के बावजूद इतना पक्का है कि घर में ही रहे तो कोरोना कुछ उखाड़ नहीं पायेगा । इसलिये कंपनी सरकार के हुक्म को आपने खूब बजाया। और जिसने आपका हुक्म नहीं बजाया, उसे आपने बजा दिया। इतना हक तो आपको है ही। भले ही नामाकूल लोग आपको काला अंग्रेज कहें, मुझे तो लगता है कि काले हिंदुस्तानियों को तौर-तरीके अंग्रेजीयत से ही सिखाये जा सकते हैं। फिर अंग्रेज काले हों या गोरे, क्या फर्क पड़ता है?
    अब देखिये ना कारोबारियों, उद्योगपतियों का तो काम ही रोते रहना है। धंधा जब चालू रहता है तब मंदी को लेकर रोते रहते हैं। बजट घोषित हो तो बढ़े हुए कर को लेकर रोने लगते हैं। कोई सरकारी मुलाजिम पेढ़ी चढ़ जाये तो उसकी खातिरदारी करने में रो देते हैं। मजदूर आधा काम कर पूरे पैसे मांगने लग जाये तो रो देते हैं। कारोबारी की दुकान पर अदना-सा बाबू शटर गिरा देने के बाद भी पहुंच जाये तो दुकान खोल देने वाला कारोबारी11 बजे का बैंक सवा 11 को खुले तो बोल नहीं सकता, लेकिन पांच बजकर पांच मिनट पर भी खातेदार बैंक जाये और उसका काम न हो तो रो देता है। लाइसेंस, परमिट, अनुमति लेने जाते हैं तो दफ्तरों के चक्कर लगाने में ही रो देते हैं। बाबू,अधिकारी सीट पर घंटों न मिले, कभी लंच,कभी मीटिंग, कभी कांफ्रेस मेें रहने से एक दिन का काम एक महीना-साल लग जाये, कोई बात नहीं,लेकिन कारोबारी तय तारीख निकलने के एक दिन बाद भी पहुंचे तो नियमावली पूरी वंशावली का बखान कर सुना दी जाती है और नतीजा लाइसेंस रद्द । कमाई शुरू हो तो 60 प्रतिशत तक अलग-अलग कर देने में रोते हैं। सरकार कोई नया नियम-कानून ले आये तो विलाप करने लगते हैं। इस कारोबारी कौम को देश की तरक्की से मतलब नहीं, वह सिर्फ अपनी फिक्र करता है। वह तो घणी खम्मा प्रशासन सरकार, आप लोगों ने देश की नब्ज पर आजादी के समय से ही हाथ रख दिया, वरना पता नहीं क्या होता?
   बेहद नकारात्मक प्रवृत्ति है कारोबारी की। भले वह देश के राजस्व का 80 प्रतिशत हिस्सा देता हो, है तो चोर ही। बस चारों तरफ से चोरी करना ही जानता है। इसलिये माई-बाप प्रशासन आपने अच्छा किया जो इस बार एक की,एक भी न सुनी। बंद याने बंद। काम बंद, घरों में बंद। किराना,दूध,सब्जी,फल,सब्जी,हजामत,बिजली,एसी,नमकीन,मिठाई,गैराज,कूलर,पंखे,ठण्डाई, शरबत,कटलरी,बर्तन,रिक्शा,बस,रेल, जूता पॉलिश सब बंद। सडक़ पर ठेला नहीं, चौराहे पर मजदूर नहीं । वैसे, कुत्तों की नसबंदी का स्वर्णिम अवसर था यह। पहले ये मनुष्यों की भीड़ में खो जाते थे या इन्हें बचाने कोई आ जाता था, लेकिन अब तो सडक़ पर इनकी ही हुकूमत है। सरकार, जिस तरह से गाय, सूअर हमारे शहर में सडक़ पर नजर नहीं आते, वैसे ही कुत्तों के लिये भी इस समय किसी तरह की घर बंदी हो जाती तो..। खैैर। अभी तो आदमी की ही खैरख्वाह नहीं पूछी जा रही तो कुत्तों की बात लेकर कहां बैठ गया।

   हुजूर एक आइडिया हाथ कटे ठाकुर को भी आया है।  हमारे देश में हर साल बीमारियों से 70 लाख लोग मर जाते हैं। इसी तरह सड़क दुर्घटना में सालाना डेढ़ लाख और महिला अपराध 3 लाख 78 हजार होते हैं। एक साल तक हम यदि लोगों को घरों से बहार न निकलने दें तो सोचिये कितनी पुण्याई का काम हो जायेगा। नहीं , बस एक आइडिया है ये, माना माना , न माना न माना। अब आइडिया कोई बसंती की घोड़ी धन्नो तो है नहीं कि चाबुक की धमक से चला लिया जाये। 
     सरकार, आपसे कुछ पूछने के हक के तहत नहीं , बल्कि आप ही रियाया पर मेहरबानी कर इतना भर बता दें कि अस्पताल में, रेड लाइट जोन में, क्वारंटाइन हाउस में सब खैरियत तो है न ? यदि ऐसा है तो आपने कुछ तो सोचा होगा कि कब, कैसे, कहां, कितनी, किसे छूट देना है? सडक़ के आदमी को सडक़ पर आने की अनुमति कब से कैसे देना है? यदि थोड़ा-सा पता चल जाये तो अभी जो जहां है, वहां उसे तसल्ली हो जाये कि इसमें उसका नंबर कब आ रहा है, ताकि वह और आराम करने या काम पर जाने का मन बना सके। अब क्या है कि दो-ढाई महीने की अल्लाली के बाद एकदम से काम में मन नहीं लगेगा। जिसे वार्मअप करना है, वह कर लेगा और जिसे पलंग तोडऩा है, वह वैसा करता रहेगा।
   इससे यह भी होगा कि समाज में यह सकारात्मक संदेश जायेगा कि प्रशासन हुजूर सब जानती-समझती है और रियाया की चिंता उसे रहती है। जिसे एक जून से उम्मीद से रहना है और जिसे नहीं रहना है, दोनों अपने-अपने स्तर पर तैयार रहेंगे। एक शब्द बार-बार सुनते रहते हैं-मास्टर प्लान या श्वेत पत्र। जब कोई बड़ी बात होती है, तब इसका जिक्र होता है। अब यदि आप इन बीते लम्हों को युगों के बराबर मानते हो तो इनमें से कुछ जारी कर देते हुजूर। एकबारगी सबको पता चल जाता कि कौन काम से लगेगा और किसके काम लगे रहेेंगे।
   थोड़ा लिखा, ज्यादा समझना। भूल-चूक माफ करना माई-बाप सरकार।

 

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रमण रावल

संपादक - वीकेंड पोस्ट 

स्थानीय संपादक - पीपुल्स समाचार,इंदौर                               

संपादक - चौथासंसार, इंदौर                                                            

प्रधान संपादक - भास्कर टीवी(बीटीवी), इंदौर

शहर संपादक - नईदुनिया, इंदौर

समाचार संपादक - दैनिक भास्कर, इंदौर 

कार्यकारी संपादक  - चौथा संसार, इंदौर  

उप संपादक - नवभारत, इंदौर

साहित्य संपादक - चौथासंसार, इंदौर                                                             

समाचार संपादक - प्रभातकिरण, इंदौर                                                            


1979 से 1981 तक साप्ताहिक अखबार युग प्रभात,स्पूतनिक और दैनिक अखबार इंदौर समाचार में उप संपादक और नगर प्रतिनिधि के दायित्व का निर्वाह किया । 


शिक्षा - वाणिज्य स्नातक (1976), विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन


उल्लेखनीय-

० 1990 में  दैनिक नवभारत के लिये इंदौर के 50 से अधिक उद्योगपतियों , कारोबारियों से साक्षात्कार लेकर उनके उत्थान की दास्तान का प्रकाशन । इंदौर के इतिहास में पहली बार कॉर्पोरेट प्रोफाइल दिया गया।

० अनेक विख्यात हस्तियों का साक्षात्कार-बाबा आमटे,अटल बिहारी वाजपेयी,चंद्रशेखर,चौधरी चरणसिंह,संत लोंगोवाल,हरिवंश राय बच्चन,गुलाम अली,श्रीराम लागू,सदाशिवराव अमरापुरकर,सुनील दत्त,जगदगुरु शंकाराचार्य,दिग्विजयसिंह,कैलाश जोशी,वीरेंद्र कुमार सखलेचा,सुब्रमण्यम स्वामी, लोकमान्य टिळक के प्रपोत्र दीपक टिळक।

० 1984 के आम चुनाव का कवरेज करने उ.प्र. का दौरा,जहां अमेठी,रायबरेली,इलाहाबाद के राजनीतिक समीकरण का जायजा लिया।

० अमिताभ बच्चन से साक्षात्कार, 1985।

० 2011 से नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना वाले अनेक लेखों का विभिन्न अखबारों में प्रकाशन, जिसके संकलन की किताब मोदी युग का विमोचन जुलाई 2014 में किया गया। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को भी किताब भेंट की गयी। 2019 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के एक माह के भीतर किताब युग-युग मोदी का प्रकाशन 23 जून 2019 को।

सम्मान- मध्यप्रदेश शासन के जनसंपर्क विभाग द्वारा स्थापित राहुल बारपुते आंचलिक पत्रकारिता सम्मान-2016 से सम्मानित।

विशेष-  भारत सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा 18 से 20 अगस्त तक मॉरीशस में आयोजित 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में सरकारी प्रतिनिधिमंडल में बतौर सदस्य शरीक।

मनोनयन- म.प्र. शासन के जनसंपर्क विभाग की राज्य स्तरीय पत्रकार अधिमान्यता समिति के दो बार सदस्य मनोनीत।

किताबें-इंदौर के सितारे(2014),इंदौर के सितारे भाग-2(2015),इंदौर के सितारे भाग 3(2018), मोदी युग(2014), अंगदान(2016) , युग-युग मोदी(2019) सहित 8 किताबें प्रकाशित ।

भाषा-हिंदी,मराठी,गुजराती,सामान्य अंग्रेजी।

रुचि-मानवीय,सामाजिक,राजनीतिक मुद्दों पर लेखन,साक्षात्कार ।

संप्रति- 2014 से बतौर स्वतंत्र पत्रकार भास्कर, नईदुनिया,प्रभातकिरण,अग्निबाण, चौथा संसार,दबंग दुनिया,पीपुल्स समाचार,आचरण , लोकमत समाचार , राज एक्सप्रेस, वेबदुनिया , मीडियावाला डॉट इन  आदि में लेखन।