सत्ता के अश्व को रोकने का सामर्थ्य किसके पास?

सत्ता के अश्व को रोकने का सामर्थ्य किसके पास?

मीडियावाला.इन।

बंगाल के चुनावी समर में चरों ओर से घिरी ममता बनर्जी ने प्रतिपक्ष के सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को पत्र लिखकर अश्वमेघ यज्ञ के साथ सत्ता के विस्तार के जयघोष के साथ बढ़ रहे राजनीतिक अश्व को रोकने के लिए एकजुट होने का आग्रह किया है| सबसे पहले तो उनके लिए ही एकता नहीं दिख रही| अश्व रोकने के बजाय ममता की मातृ पार्टी कांग्रेस के नेता अदीब चौधरी तो जी जान से उनका सिंहासन ही नहीं पूरा किला-महल ध्वस्त करने में लगे हुए हैं | इसी तरह पुराने दुश्मन कम्युनिस्ट ममता के हाथी घोड़े मारकर उन्हें भी मैदान से बाहर करने में लगे हैं| पड़ोसी तेज प्रताप या एक शहर के नेता अरविन्द केजरीवाल क्या भाजपा का रथ रोकने जैसी ताकत रखते हैं? उद्धव ठाकरे, शरद पवार, सुखबीर बादल, अखिलेश यादव, मायावती, स्टालिन आदि अपने घर आँगन तक सीमित हैं| वे अपनी हवेली बचाने में व्यस्त रहते हैं| वे अश्व मेघ यज्ञ के अश्व की लगाम खींचकर सवारी या युद्ध की कितनी क्षमता रखते हैं?

गांधी परिवार के पुराने वफादार कांग्रेसी लगभग सात वर्षों से प्रार्थना आरती कर रहे हैं कि केवल राहुल बाबा डूबते जहाज की कमान संभालकर सत्ता के महल पर विजय दिला सकते हैं| उनकी धारदार जहरीली हुंकारों से सत्ता के अश्व का मुंह मोड़कर सत्ताधारियों के सिंहासन को छीना जा सकेगा| लेकिन विडम्बना यह हैं कि राजकुमार राहुल को पुराने कारतूस की तरह पुराने बुजुर्ग चेहरे, उनकी कार्य शैली , राय तक रास नहीं आती| उन्हें नए युवा अंग्रेजीदां कारिंदे पसंद हैं, जो गूगल ज्ञान, फेस बुक, ट्वीटर, इंस्टाग्राम आदि से फ़िल्मी डायलॉग, सस्ती भद्दी भाषा-भाषण प्रस्तुत कर अपनी मूंछ पर ताव देते रहते हैं| प्रियंका बहन भाई की मदद के लिए बहुत देर से मैदान में आई हैं और भावनाओं के साथ खतरों को भी समझती हैं| फिर उनके और परिवार के लिए राबर्ट के काम  धंधे बोझ की तरह बाधा बनते रहते हैं|

 कांग्रेस से ही निकली ममता बनर्जी इस समय अपने पुराने नए साथियों से चुनावी तलवारबाजी से घायल हैं| उनकी पुकार पर सहानुभूति दिखाने वाले बुजुर्ग सेनापति शरद पवार महाराष्ट्र के सिंहासन के आस पास खड़े पृथ्वीराज चव्हाण जैसे नेताओं के खतरों से चिंतित हैं| गाँधी परिवार से पुराने मीठे, खट्टे, कड़वे अनुभवों के पन्ने अब तक विचलित करते हैं| अब एक नए ठाकरे परिवार में महारानी , महाराज , युवराज के पुण्य अथवा पापों का बोझ शरद पवार के हाथों को और कमजोर कर रहा है| वे पहले मोदी दरबार में पेशी दे चुके, हाल में रात के अँधेरे में भाजपा के शाह से किसी रहस्यमय मुलाकात की| ममताजी या मास्टर राहुलजी को शायद यह नहीं मालूम है कि शरद पवार कबड्ड़ी के खेल और संगठनों से निकलकर राजनीति में उतरे थे| कबड्ड़ी के अच्छे खिलाड़ी सामान्यतः दूसरे पाले में जाकर वापस आने में माहिर होते हैं| सांस चलते रहना चाहिए| वह किसी भी पाले और मौसम में खेल सकते हैं| तभी तो मराठा क्षत्रप अपने पाले के परिजनों को बचाने में मराठा क्षत्रप सफल रहे हैं| वह  सत्ता के रथ को रोकने के लिए युद्ध कटाई नहीं चाहेंगें|

ममता के पड़ोसी महाराज नवीन  पटनायक ने हमेशा अपनी सीमाओं और सिंहासन को सुरक्षित रखने का सिद्धांत बना रखा है और दो दशकों से एकछत्र राज कर रहे हैं| संघर्ष का तो सवाल ही नहीं, दिल्ली दरबार के दर्शन भी बहुत जरुरी होने पर करते हैं| नियमित जीवन और सूरज ढलने के बाद राजनीतिक झमेलों से अलग रहने के कारण उन्हें कोई परेशान भी नहीं करता| वह तो सत्ता के अश्व को रास्ता भी देते रहे हैं| दूसरे पड़ोसी नीतीश ने सत्ता के सारे खेल देखे और खेलें हैं | वे अब ममता की पुकार पर कोई नई लड़ाई लड़ने को तैयार नहीं हो सकते हैं| तेजस्वी तेजी से आगे बढे हैं, लेकिन जल्दबाजी खतरों से भरी है| लालू यादव के मुकदमे, जेल का सिलसिला थम भी जाए ,तो भाई बहनों का हिसाब किताब तेजस्वी को बिहार के बाहर हाथ पैर मारने की ताकत नहीं दे सकता है| यही स्थिति कुछ हद तक अखिलेश यादव की है | कांग्रेस और बसपा के साथ समझौतों का परिणाम वह देख चुके हैं| अजीत सिंह परिवार परिवार पर भरोसे का तो सवाल ही नहीं | अपने बल पर ही लम्बी लड़ाई लड़ने के मूड में हैं| उधर असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों के नेताओं को क्षेत्रीय हितों की चिंता रहती है| दिल्ली में जो भी राज करे, उनके हितों की रक्षा करते रहे| दक्षिण में कर्नाटक, आंध्रा, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल  में भी स्थानीय हित सर्वोपरी हैं| इस दृष्टि से राम राज्य न सही नरेंद्र मोदी राज में पूरब, पश्चिम, उत्तर दिशा में जनता का व्यापक समर्थन सत्ता के रथ के स्वागत करता दिख रहा और अश्व मेघ के अश्व को रोकने का सामर्थ्य फिलहाल किसी नेता और दल का नहीं है| वैसे भी 2024  के लोक सभा चुनाव में तीन साल की दूरी है| लम्बी लड़ाई लड़ने के लिए संगठन और साधन कितनों के पास है?

RB

आलोक मेहता

पद्मश्री (भारत सरकार) से सम्मानित, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार-पत्रकार सम्मान-2006, दिल्ली हिन्दी अकादमी द्वारा श्रेष्ठ लेखन पुरस्कार-1999 पद्मश्री आलोक मेहता हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार हैं। वे "नई दुनिया" के प्रधान सम्पादक हैं।

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