त्रिपुरा की घटना ने इंदौर का प्रसंग याद दिलाया

त्रिपुरा की घटना ने इंदौर का प्रसंग याद दिलाया

मीडियावाला.इन।

गायक सोनू निगम के वीडियो के बाद मैंने त्रिपुरा के उस विवाह समारोह का वीडियो देखा, जिसमें कलेक्टर शैलेष यादव का कारनामा इस समय देश भर में गरियाया जा रहा है। अजित भारती के यूट्यूब चैनल पर वह पूरा वीडियो है। बेहद शर्मनाक। निहायत ही घटिया। शैलेष यादव उसमें कलेक्टर लग ही नहीं रहे। जैसे वर्दी पहनाकर कुछ गुंडों को उनका सरदार शादी के जलसे में धमकाने और बेइज्जत करने आ गया हो। न भाषा से, न भाव-भंगिमा से वह कहीं से एक आईएएस अधिकारी नहीं लग रहे।

उस शादी में कोई बहुत भीड़ भी नहीं दिखी। सजे-धजे दूल्हा-दुल्हन एक नई जिंदगी शुरू करने जा रहे हैं। हर तरफ देश में जब बुरी खबरें हैं तब दो परिवार बाकायदा प्रशासन की अनुमति से अपने आँगन में खुशियाँ मना रहे हैं। वे नियमों का पालन कर रहे हैं। हो सकता है घंटा-आधा घंटा ज्यादा-कम हुआ हो। लेकिन एक माँगलिक प्रसंग को पाँच मिनट के इस शर्मनाक घटनाक्रम ने ऐसा बना दिया कि दोनों परिवारों में कोई उसे कभी याद करना नहीं चाहेगा। एक कलेक्टर या कोई भी सरकारी मुलाजिम ऐसा कर कैसे सकता है? वो दुल्हन की बगल में खड़े दूल्हे को थप्पड़ मार रहा है। घर की किसी महिला को अरेस्ट करने की घुड़की दे रहा है। गेट के बाहर अनुनय-विनय कर रहे एक संभ्रांत परिजन को कांस्टेबल के हवाले कर रहा है। किसी को सुनने को तैयार नहीं है। प्रशासन की अनुमति का पत्र फाड़कर फेंक रहा है। इसे कहते हैं आग मूतना!

इस दुखद वीडियो ने मुझे इंदौर का एक ऐसा ही दुखद वाकया याद दिला दिया। यह तब की बात है जब मैं एक टीवी चैनल में था। एबी रोड पर इंडस्ट्री हाऊस की छठवीं मंजिल पर हमारा स्टुडियो और ऑफिस था। एक दोपहर ब्यूरो प्रमुख प्रकाश हिंदुस्तानी और मैं किसी कार्यक्रम से लौटे। पार्किंग से जब लिफ्ट की तरफ आए तो वहाँ भीड़ देखकर चौंके। आमतौर पर एेसा होता नहीं था। बिल्डिंग में दो लिफ्ट थीं और इनमें एक खराब न हो तब तक इमारत के दफ्तरों का ट्रैफिक कभी रुकता नहीं था। लेकिन उस वक्त दोनों लिफ्ट चालू थीं। फिर भी कई लोग लिफ्टों के सामने जमा थे। मैनेजर को बुलाया तो पता चला कि एक लिफ्ट सातवीं मंजिल पर रोकी हुई है। ऐसा भी पहले कभी नहीं हुआ था कि कोई ऊपर जाए और लिफ्ट अपने लिए पूरे समय रोककर रखे। सातवीं मंजिल पर रेडियो मिर्ची का स्टुडियो था। तब वह अकेला एफएम रेडियो चैनल था, जो इंदौर में काफी सुना जाने लगा था।

हमने जानना चाहा कि ये कौन साहब हैं, जिन्होंने लिफ्ट रोकी हुई है। पता चला कि कलेक्टर साहब हैं। रेडियो मिर्ची के किसी शो में बतौर मेहमान उनकी रिकॉर्डिंग चल रही है। ऊपर जाने वालों में हर उम्र के लोग थे। एक बहुत बुजुर्ग सज्जन भी थे, जो बहुत परेशान हो रहे थे। कई महिलाएँ थीं और सब बेबस खड़े घड़ी देख रहे थे। जब हमारे आने के बाद वजह पता चली तो सब एक सुर में कलेक्टर की शान में जो फरमा रहे थे, उन्हें यहाँ लिखा नहीं जा सकता। उन आम नागरिकों के निशाने पर अकेला वह कलेक्टर नहीं था, जो ऊपर लिफ्ट रोककर मजे से स्टुडियो में बैठा किसी सुंदर आरजे कन्या के सामने अपनी घटिया अफसरी झाड़ रहा था। लिफ्ट के इंतजार में खड़े वे लोग सारे अफसरों को एकमुश्त बुरा-भला कह रहे थे। हालांकि मैं मानता हूँ कि बहुत अच्छे, संस्कारवान, आम लोगों की तकलीफों को समझने वाले, रहमदिल और कर्त्तव्यनिष्ठ अफसर भी हमारे सिस्टम में हमारे आसपास ही हैं। लेकिन सबको दुखी और परेशान कर देने वाले उस एक कटु प्रसंग ने सारे अफसरों को उस दिन एक ही थैली का चट्टा-बट्टा बना दिया था।

बात यहीं खत्म हो जाती तो भी ठीक था। धीमी गति वाली एक चालू िलफ्ट से लोग ऊपर जाते-आते रहे। लेकिन भीड़ भी बढ़ती रही। काफी देर बाद उस रोकी हुई तेज रफ्तार लिफ्ट के ऊपर से नीचे आने के संकेत मिले। वह जब ग्राउंड फ्लोर पर आई तो एक गनमेन भीड़ को चीरने के अंदाज में बाहर आया। पीछे कलेक्टर साहब बिल्कुल किसी बिगड़ैल नवाब की तरह पूरी निर्लज्जता से नमूदार हुए। तब तक वहाँ गहमागहमी बढ़ गई थी। हमसे रहा नहीं गया। हमने उनसे जानना चाहा कि लिफ्ट किसने और क्यों रोकी थी? क्या आपको नहीं मालूम कि यहाँ इतने लोग परेशान हो रहे हैं? ये क्या तरीका है? जैसा कि होता है, सबसे पहले गनमैन ने आँखें तरेरकर साहब की तरफ उंगली दिखाकर सबको खामोश रहने का इशारा किया। लेकिन तब तक बाकी लोग भी आगे आ गए।

कलेक्टर साहब को अपनी किरकिरी होने के आसार दिखे तो बजाए विनम्र होने के वे दंभ से भरकर बोले कि मैं कलेक्टर हूं और मुझे यह अधिकार है कि मैं रोक सकता हूँ। ऐसे मौकों पर ऐसे बेहूदे लोग अक्सर हिंदी भूल जाते हैं। अचानक अंग्रेजी प्रेत उनके सिर पर सवार हो जाता है। प्रकाश हिंदुस्तानी ने अंग्रेजी में ही उत्तर दिया। अब तो वे और भड़क गए। एक आम आदमी की क्या औकात कि वह साहब बहादुर से अंग्रेजी में मुँह लगे। वह एक अत्यंत अशोभनीय दृश्य था, जिसके मूल में यह एक आदमी था, जो अफसर की कुर्सी पर था। एक जिले का मालिक!

सच बताऊँ, मैं एक बेहद जज्बाती आदमी हूँ। दो-तीन मिनट के उस कड़वे प्रसंग ने मुझे हिला दिया। अगर कोई मवाली ऐसा सुलूक करके निकल रहा होता तो शायद ऐसा न भी होता, क्योंकि उससे किसी संस्कार या सभ्य सुलूक की उम्मीद ही बेमानी थी। लेकिन वह कलेक्टर थे। मालूम नहीं क्यों लेकिन देश की सबसे प्रतिष्ठित मानी जाने वाली यूपीएससी की परीक्षा को पार करके चयनित होने वाले और इंदौर जैसे सभ्य शहर में कलेक्टर बनाकर भेजे गए किसी भी अफसर से कम से कम यह बिल्कुल ही अपेक्षित नहीं था। हो सकता है कि उन्होंने लिफ्ट न रुकवाई हो और साहब की सुविधा के लिए गनमैन ने अपने उत्साह में रोककर रखी हो। वे आधे मिनट में सॉरी कहकर सबसे अच्छे से मिलकर भी जा सकते थे। वैसे भी हम भारतीय कम्बख्त बहुत भावुक लोग हैं। कोई कितना भी बेइज्जत कर दे, एक माफी में पिघलकर सब भुलाकर आगे बढ़ने में यकीन रखते हैं।

हमारा व्यवहार हमारी परवरिश और खानदानी हैसियत का भी परिचय देता है। हम नहीं जानते कि शैलेष यादव किस पृष्ठभूमि से चार-पाँच साल कोचिंग में रट्टे मारकर यूपीएससी क्लियर किए होंगे। आदमी के मूल संस्कार कुर्सी के मोहताज नहीं होते। ऊँचा ओहदा उस कच्चे रँग की तरह ही है जो एक सियार को हुआ-हुआ करने के उसके मूल संस्कार से रोक नहीं पाता। अक्सर नकचढ़े लोगों को पद और मिल जाए फिर देखिए। वे वही करते हैं जिसे आग मूतना कहते हैं। शैलेष यादव उस शादी समारोह में आग मूतकर ही निकले। इंदौर के इंडस्ट्री हाऊस की लिफ्ट के बाहर भी मैंने अपने कपड़ों पर यूरीन की गंध महसूस की थी।

मेरे पच्चीस साल के लेखन और पत्रकारीय जीवन में इंदौर के वे कलेक्टर अकेले ऐसे अफसर चंद मिनट के लिए ही सामने आए, जिनका रिकॉर्ड तोड़ने वाला दूसरा इन सोलह सालों में दूसरा नहीं मिला। हालांकि मुझे जानने वाले लोग अच्छे से जानते हैं कि मंत्रालयों और सचिवालयों में मेरा आना-जाना बहुत ही कम रहा है, लेकिन अल्लाह का शुक्र है कि वैसा नगीना दूसरा नहीं मिला। किसी खबर, किताब या किसी और विषय के संदर्भ में देश भर में और जिन आईएएस और आईपीएस अफसरों से मिलना हुआ, वे सब भले मनुष्य ही थे। इसलिए ऐसे एक या दो कलेक्टरों की महिमा से अफसरों की पूरी बिरादरी को दोष देना भी ठीक नहीं, लेकिन उस दिन लिफ्ट के बाहर खड़े लोगों ने एक साथ सबको एक ही थैली के चट्‌टे-बट्‌टे की तरह लपेट दिया था।

आप कुछ भी हो जाएँ। इंसान तो बने रहें। आग मूतने का अधिकार किस नियुक्ति पत्र में दिया जाता है?

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विजय मनोहर तिवारी

मध्यप्रदेश में सागर जिले के मंडी बामौरा नाम के कस्बे में पैदा हुए। स्कूली पढ़ाई मंडी बामौरा और शिवपुरी में की। 1991 में विदिशा के एसएसएल जैन पीजी कॉलेज से गणित में फर्स्ट क्लास फर्स्ट एमएससी के बाद एक साल कॉलेज के गणित विभाग में पढ़ाया। लेकिन लिखने का शौक मीडिया में ले लाया। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि के दूसरे बैच के टॉपर हैं। दिल्ली में राष्ट्रीय सहारा में ट्रेनिंग के बाद नईदुनिया इंदौर में रिपोर्टिंग से करिअर की नई शुरुआत। नौ साल प्रिंट में रहने के बाद 2003 में सहारा समय न्यूज चैनल में आए। 2006 में प्रिंट में वापसी दैनिक भास्कर भोपाल के पॉलिटिकल ब्यूरो से। 2010 में दैनिक भास्कर के नेशनल न्यूजरूम में ऑल इंडिया रिपोर्टिंग के लिए चुने गए।

फिर 2015 तक अलग-अलग विषय पर रिपोर्टिंग के लिए पांच साल में लगातार भारत के कोने-कोने की आठ यात्राएं। टीवी और प्रिंट में बीस साल की रिपोर्टिंग के दौरान ऐसे विषयों पर हमेशा पैनी निगाह रही, जिन्हें पांच सौ या हजार शब्दों की खबरों से ज्यादा अहमियत की दरकार थी। यहीं से स्थाई लेखन ने अलग जगह बनाई और छपकर आईं छह किताबें आईं। ये किताबें पत्रकारों और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए गौरतलब दस्तावेज हैं।

अब तक छपी किताबें- 2001 में पहली किताब-प्रिय पाकिस्तान छपी। यह ऐसे आलेखों का संग्रह है, जो छपे हैं, जो नहीं छपे हैं और जो कहीं छप नहीं सकते थे। टीवी में इंदिरा सागर बांध में डूबे हरसूद शहर की लाइव रिपोर्टिंग पर 20005 में प्रकाशित चर्चित किताब-हरसूद 30 जून-को भारतेंदु हरिश्चंद्र अवार्ड मिला। एनएसडी ने इस पर नाटक लिखा। मशहूर कथाकार कमलेश्वर ने इस किताब से प्रेरित होकर एक कहानी लिखी, जिसमें विजय मनोहर तिवारी को ही एक किरदार बनाया।

2008 में समकालीन राजनीति पर दिलचस्प उपन्यास-एक साध्वी की सत्ता कथा प्रकाशित। 2010 में वरिष्ठ पत्रकार राहुल बारपुते पर एक मोनोग्राफ लिखा। इसी साल अदालत से भोपाल गैस हादसे का फैसला आने पर लिखी-आधी रात का सच। पांच साल तक भारत भर की लगातार यात्राओं पर 2016 में छपी-भारत की खोज में मेरे पांच साल। भोपाल के भारत भवन में इस किताब का लोकार्पण करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने कहा-यह किताब प्रामाणिक पत्रकारिता का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें सच को सच की तरह सामने लाया गया है। यह किताब इक्कीसवीं सदी के भारत को हर रंग-रूप और हर माहौल-मूड में सामने लाती है। इंदौर लिटरेचर फेस्टीवल-2016 में यह यात्रा वृत्तांत चर्चित रहा, जहां तारेक फतेह, अमीश त्रिपाठी और कुमार विश्वास जैसी जानी-मानी हस्तियो ने शिरकत की। पत्रकारिता के कई अवार्ड मिले हैं। सभी किताबों की देश के मीडिया में चर्चा, समीक्षाएं हुईं हैं।

पुरस्कार: हरसूद 30 जून के लिए राष्ट्रीय भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार, गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान और यात्रा वृत्तांत के लिए मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी पुरस्कार। इसके अलावा श्रेष्ठ रिपोर्टिंग के कई पुरस्कार।