
मोदी राज में तेल ऊर्जा संकट में भी आत्म विश्वास का राज
आलोक मेहता
जर्मनी से एक पत्रकार मित्र ने फोन करके जानना चाहा कि युद्ध और वैश्विक तेल ऊर्जा संकट में भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा अधिक चिंता के बजाय आत्म विश्वास और जनता को भी विचलित न होने के लिए कहने का राज क्या है ? वैसे आधिकारिक दावे के लिए मैंने उन्हें सरकारी अधिकारियों से विस्तृत जानकारी लेने को कहा | लेकिन उनके आग्रह पर मैंने भारत की ऊर्जा क्षमताओं की कुछ पृष्ठ्भूमि तथा हाल के वर्षों में तेल पेट्रोल गैस आदि के लिए हुई तैयारियों की अपनी जानकारियों को उनसे शेयर किया |
इसमें कोई शक नहीं है कि भारत विश्व के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है और अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का लगभग 85% आयात करता है। ऐसे में खाड़ी देश—जैसे संयुक्त अरब अमीरात , सऊदी अरब , ओमान , कुवैत भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार रहे हैं। भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियाँ पिछले कई दशकों से इन देशों के साथ तेल आपूर्ति , खोज और निवेश के समझौते करती रही हैं।
आज भारत केवल तेल खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि खाड़ी देशों के साथ निवेशक, साझेदार और ऊर्जा रणनीतिक सहयोगी बन चुका है। भारत ने पिछले एक दशक में ऊर्जा कूटनीति को नए स्तर पर पहुँचाया है। वहीं अफ्रीका में भारत ने दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिए मजबूत आधार तैयार किया है |
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने ऊर्जा क्षेत्र में ‘ वैश्विक खिलाड़ी ‘ बनने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। भारत ने ऊर्जा कूटनीति को अपनी विदेश नीति का केंद्रीय तत्व बनाया | जहाँ एक ओर खाड़ी देश दशकों से भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अफ्रीका ने “ऊर्जा विविधीकरण” के लिए एक नया अवसर प्रदान किया है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने इन दोनों क्षेत्रों में अपने संबंधों को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। इस दूरगामी नीति के लिए विदेश मंत्री एस जयशंकर और पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी लगातार महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं |
1970–90 के दशक में भारत और खाड़ी देशों के बीच संबंध मुख्यतः “तेल खरीद” तक सीमित थे |भारत कच्चा तेल खरीदता था निवेश या उत्पादन में भागीदारी बहुत कम थी | भारतीय कंपनियों की अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति सीमित थी। 2000 के बाद भारत ने रणनीति बदली और ऊर्जा सुरक्षा के लिए विदेशों में तेल क्षेत्रों में हिस्सेदारी लेना शुरू किया। ओएनजीसी विदेश लिमिटेड ने विदेशों में निवेश बढ़ाया | मोदी सरकार आने के बाद 20014 से 2026 रणनीतिक साझेदारी का नया दौर शुरु हुआ | कार्यकाल में भारत-खाड़ी ऊर्जा संबंधों में बड़ा बदलाव आया। अब संबंध केवल खरीद तक सीमित नहीं रहे, बल्कि निवेश, भण्डारण और गैस के संयुक्त उत्पादन के काम होने लगे |संयुक्त अरब अमीरात के साथ ऐतिहासिक समझौते हुए | 2018 में भारतीय कंपनियों को ऑयलफील्ड में 10% हिस्सेदारी मिली |यह पहला मौका था जब भारत को खाड़ी में उत्पादन में भागीदारी मिली | यह समझौता 40 वर्षों के लिए है | यह भारत के लिए इस दृष्टि से क्रन्तिकारी है , क्योंकि केवल खरीददार के बजाय वह उत्पादक भी बन गया |इसी तरह संयुक्त अरब अमीरात की कंपनी एडनॉक ने भारत के मैंगलोर में सुरक्षित तेल भंडारण में समझौता किया | भारत को आपातकालीन ऊर्जा सुरक्षा मिली | इसी तरह एडनॉक और भारतीय पब्लिक सेक्टर कंपनियों बीच इसी 2026 में 14 साल का एलएनजी ऑफटेक डील हुई | 2024 में क्रिटिकल मिनरल्स के लिए समझौते हुए || सऊदी अरब और ओमान के एलएनजी के लिए दीर्घकालिक समझौते | कुवैत भारत को स्थिर कच्चा तेल देता है |भारत और खाड़ी देशों के बीस|कुल मिलाकर 15–20 से अधिक प्रमुख ऊर्जा समझौते हैं |
इन समझौतों में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका निर्णायक रही | खाड़ी देशों के साथ राजनीतिक विश्वास बढ़ाया | पिछले एक दशक 2014–2025 में लगभग 35–45 अरब अमेरिकी डॉलरकुल विदेशी ऊर्जा निवेश हुआ | अफ्रीका में 20–25 अरब डॉलर , खाड़ी देशों में 10–15 अरब डॉलर और एलएनजी तथा गैस प्रोजेक्ट्स में 10 अरब डॉलर हुआ | वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के वर्तमान दौर में भारत एक संतुलित कूटनीतिक रणनीति अपना रहा है |एक ओर भारत की निजी और सार्वजनिक कंपनियाँ अमेरिका जैसे विकसित देशों में निवेश बढ़ा रही हैं, वहीं दूसरी ओर रूस के साथ ऊर्जा संबंधों को भी मजबूती से बनाए रखा गया है।
हाल ही में रिलायन्स इंडस्ट्रीज द्वारा अमेरिका में रिफाइनरी और ऊर्जा क्षेत्र में निवेश की योजनाओं ने इस संतुलन को और स्पष्ट किया है।यह संकेत है कि भारतीय कंपनियाँ अब केवल घरेलू बाजार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा मूल्य श्रृंखला में प्रवेश कर रही हैं।अमेरिका से एलएनजी आयात में वृद्धि और तेल तथा गैस टेक्नोलॉजी सहयोग भारत के लिए निवेश का प्रमुख स्रोत बन गया है।रूस के साथ संबंध ऊर्जा सुरक्षा का आधार | 2022 के बाद रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल सप्लायर बना |भारत ने रियायती दरों का लाभ उठाया | रिफायनरी के बाद निर्यात का लाभ भी उठाया है |
दूसरी तरफ भारत और ईरान के संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत पुराने और गहरे रहे हैं। एक समय ईरान भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने इन संबंधों को जटिल बना दिया। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने ईरान के साथ “सीमित लेकिन रणनीतिक संबंध” की नीति अपनाई | 2018–19 तक भारत ने ईरान से लगभग 12 अरब डॉलर से अधिक का तेल आयात किया | ईरान भारत का प्रमुख सप्लायर था | 2019 के बाद अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत ने ईरान से तेल आयात लगभग बंद कर दिया | लेकिन 2026 में भारत ने वर्षों बाद ईरान से एलपीजी गैस की पहली खेप खरीदी |भुगतान रुपये में किया गया |चाबहार पोर्ट: भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक परियोजना है | इसका उद्देश्य अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधा मार्ग तथा पाकिस्तान को बायपास करना |2016 में त्रिपक्षीय समझौता हुआ | 10 वर्ष का संचालन अनुबंध है | यह परियोजना ऊर्जा से अधिक “भू-राजनीतिक” महत्व रखती है।2026 तक भारत इस परियोजना को जारी रखने की रणनीति बना रहा है, भले ही प्रतिबंधों का दबाव हो |





