Controversy over Babar: बाबर पर लिखी पुस्तक पर विवाद- भारत भवन केंद्र में

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Controversy over Babar: बाबर पर लिखी पुस्तक पर विवाद- भारत भवन केंद्र में

रंजन श्रीवास्तव

भारत में मुगल सल्तनत का अध्याय शुरू करने वाले बाबर जिन्हें उनके दरबारी तथा प्रजा ज़हीर-उद-दीन मुहम्मद बाबर नाम से संबोधित करती थी, ने अपनी मृत्यु के लगभग 500 वर्षों बाद भोपाल में आयोजित लिटरेचर फेस्टिवल में एक ऐसे विवाद को जन्म दे दिया जिसकी गूंज आने वाले समय में ना सिर्फ भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल में बल्कि देश के अन्य हिस्सों में आयोजित किए जाने वाले लिटरेचर फेस्टिवल में सुनाई देती रहेगी. इस विवाद ने कई ऐसे सवालों को जन्म दे दिया है.

वास्तव में, विवाद सिर्फ बाबर के नाम को लेकर ही नहीं है बल्कि इससे जुड़ा विवाद अब भारत भवन को भी लेकर हो गया है.

भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल पिछले 8 वर्षों से आयोजित एक प्रतिष्ठित आयोजन है जिसकी शुरुआत मध्य प्रदेश के पूर्व ब्यूरोक्रेट रिटायर्ड आईएएस अधिकारी राघव चंद्रा के प्रयासों से हुई. तब से लेकर अब तक राघव चंद्रा ही इसके मुख्य कर्ताधर्ता रहे हैं. और हर वर्ष यह आयोजन भारत भवन में किया जाता है. इस वर्ष यह आयोजन 9 से 11 जनवरी तक किया गया.

इस विवाद के केंद्र में लेखक और वास्तुकार आभास मालदहियार की पुस्तक “बाबर: द क्वेस्ट फॉर हिंदुस्तान” थी जिस पर चर्चा के लिए फेस्टिवल के आयोजकों ने इस पुस्तक पर एक सत्र रखा था. जैसे ही इस सत्र की जानकारी एक अखबार के समाचार से सार्वजनिक हुई, भोपाल के कुछ स्थानीय संगठनों जैसे संस्कृति बचाओ मंच और हिंदू उत्सव समिति ने इसका कड़ा विरोध शुरू कर दिया. विरोध करने वालों का तर्क था कि भोपाल जैसी नगरी में, और वह भी ‘भारत भवन’ जैसे सरकारी वित्त पोषित स्थान पर, एक ‘आक्रांता’ का महिमामंडन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

इस विवाद के चलते आयोजकों को उस सत्र को निरस्त करना पड़ा. जाहिर है बाबर का नाम ही संघ और उससे जुड़े संगठनों को उद्वेलित करने वाला था.

पिछले कई दशकों तक संघ से भाजपा और संघ से जुड़े संगठनों का आंदोलन ही इसी बात पर था कि बाबर के कार्यकाल में मीर बाकी जो बाबर का सेनापति था, ने राम जन्मभूमि पर स्थित मंदिर तोड़कर वहां मस्जिद बनाई जिसका नाम बाबर के नाम पर रखा गया. इस बड़े आंदोलन ने भाजपा को ना सिर्फ पूरे देश में मजबूत किया बल्कि इसकी परिणति अयोध्या में राम मंदिर के रूप में आई.

पर क्या बाबर के ऊपर लिखी गई इस किताब पर विवाद उचित था?

इस पुस्तक के लेखक का कहना है कि इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि विरोध करने वाले लोगों ने पुस्तक पढ़ी ही नहीं थी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुला खत लिखने की बात करते हुए लेखक ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर कहा है कि इस विवाद ने उस किताब को विवादित बना दिया जो कि शायद चंदेरी की राजपूत महिलाओं को समर्पित एकमात्र किताब है, जिन्होंने बाबर की सेना के हमले के समय जौहर किया था. उन्होंने चुनौती देते हुए कहा है कि उनकी पुस्तक से एक भी ऐसा उदाहरण दिखाया जाए जहां बाबर का महिमामंडन किया गया हो.

उन्होंने यह भी कहा कि इससे भी ज्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि मध्य प्रदेश के संस्कृति मंत्री, धर्मेंद्र सिंह लोधी ने किताब का एक भी पन्ना पढ़े बिना सार्वजनिक रूप से सेशन की निंदा की. इससे मध्य प्रदेश के संस्कृति मंत्रालय के कामकाज और बौद्धिक ईमानदारी पर गंभीर सवाल उठते हैं, जहां साहित्यिक कृतियों को पढ़े बिना ही उन पर फैसला सुनाया जा रहा है.

विवाद अभी बढ़ता ही जा रहा है. भारत भवन के न्यासी विजय मनोहर तिवारी ने इस विवाद को लेकर मध्य प्रदेश के संस्कृति मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी को एक पत्र लिखकर भारत भवन को बीएलएफ के आयोजन स्थल चुने जाने को लेकर आपत्ति उठाई है. उनका कहना है कि बीएलएफ के आयोजक अपना फेस्टिवल किसी होटल, रिसॉर्ट या धर्मशाला में आयोजित कर सकते हैं। वे नरेटिव बनाने के लिए विषय चुनने को लेकर भी स्वतंत्र हैं पर यह आयोजन अगले वर्ष से भारत भवन में नहीं होना चाहिए. तिवारी का यह भी कहना है कि पुस्तक के लेखक एक अलग तरह का नरेटिव खड़ा कर रहे हैं जबकि यह विवाद भारत भवन और बीएलएफ के बीच है.

विजय मनोहर तिवारी के सवाल उठाने से भारत भवन के एक अन्य न्यासी राजीव वर्मा के उस बात को बल देता है कि भारत भवन सिर्फ बीएलएफ के लिए ही क्यों? किसी अन्य बाहरी व्यक्ति के लिए क्यों नहीं.

भारत भवन से जुड़े लोगों में से कुछ का मत यह है कि बीएलएफ को सिर्फ इसलिए भारत भवन में आयोजित करने की इजाजत मिलती है क्योंकि बीएलएफ के कर्ताधर्ता राघव चंद्रा मध्य प्रदेश में स्वयं एक प्रभावशाली ब्यूरोक्रेट रहे हैं और बहुत से ब्यूरोक्रेट्स की पुस्तकों को चर्चा कराने के लिए वे उनके सत्र आयोजित करते हैं. उनका यह भी कहना है कि ब्यूरोक्रेसी की लॉबी इतनी ताकतवर है कि संस्कृति मंत्रालय के अधिकारी भी बीएलएफ का ही समर्थन करते हैं. वे दो वर्ष पूर्व तत्कालीन संस्कृति मंत्री उषा ठाकुर के नोटशीट की याद दिलाते हैं जिसमें उन्होंने भारत भवन को बीएलएफ का आयोजन न करने के बारे में लिखा था पर संस्कृति मंत्रालय के एक प्रभावशाली अधिकारी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से बात करके मंत्री को ही मजबूर कर दिया कि वे अपने नोटशीट को वापस ले लें.