
Divorce Is Not the End: बेटी बोझ नहीं, गर्व है!
वेद माथुर
मेरठ के रिटायर्ड जज ने तलाक को जश्न में बदलासमाज में आज भी तलाक को “असफलता” या “कलंक” की तरह देखा जाता है। खासकर लड़कियों के मामले में सवाल उठते हैं – “अब क्या करेगी?”, “घर कैसे चलेगा?”, “समाज क्या कहेगा?” लेकिन उत्तर प्रदेश के मेरठ में एक रिटायर्ड जज ने इन पुरानी सोचों को पूरी तरह चुनौती दी है। डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार शर्मा ने अपनी इकलौती बेटी प्रणिता वशिष्ठ (या प्रणिता शर्मा) के तलाक को शोक का विषय नहीं, बल्कि स्वाभिमान और नई शुरुआत का उत्सव बना दिया। 4 अप्रैल 2026 को जब मेरठ फैमिली कोर्ट ने उनके तलाक पर मुहर लगाई, तो पिता ने ढोल-नगाड़े, फूलों के हार, मिठाइयां और जश्न के साथ बेटी का स्वागत किया। परिवार के सदस्यों ने “I Love My Daughter” वाली टी-शर्ट पहनकर पूरे रास्ते नाचते-गाते बेटी को घर लाए।क्या था पूरा मामला?
प्रणिता की शादी दिसंबर 2018 में भारतीय सेना के एक मेजर गौरव अग्निहोत्री से हुई थी। शादी के बाद उन्हें मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। सात साल तक संघर्ष करने के बाद, जब स्थिति असहनीय हो गई और आत्मसम्मान पर सवाल उठने लगा, तब प्रणिता ने फैसला लिया – अपने सम्मान की रक्षा के लिए रिश्ते से बाहर निकलना बेहतर है।पिता ज्ञानेंद्र शर्मा ने साफ कहा: “अगर मेरी बेटी शादी में खुश नहीं है, तो उसे वहाँ जबरदस्ती रखना मेरा कर्तव्य नहीं है। उसका सम्मान और खुशी सबसे ऊपर है।”
वे आगे बोले कि बेटी कोई “सामान” नहीं है जिसे किसी रिश्ते में फेंक दिया जाए। जब वह टूट चुकी थी, तब पिता का फर्ज था कि उसे सहारा दें और सम्मानजनक जीवन दें।प्रणिता का संदेशप्रणिता खुद एक फाइनेंस डायरेक्टर हैं और मनोविज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएट। तलाक के बाद उन्होंने महिलाओं से अपील की: आत्मनिर्भर बनो।
प्रताड़ना सहन मत करो।
अपनी आवाज उठाओ।
गलत रिश्ते में रहना हार नहीं, बल्कि उससे बाहर निकलना जीत है।
समाज के लिए यह उदाहरण क्यों महत्वपूर्ण है?भारतीय समाज में बेटियों को अक्सर कहा जाता है – “पराया धन”, “ससुराल उनका घर”, “मायका सिर्फ अस्थायी”। लेकिन हकीकत यह है कि मायका भी उनका घर है। जब कोई लड़की ससुराल में प्रताड़ना झेल रही हो, आत्महत्या की नौबत आ रही हो, तो उसे मायके लौट आने में शर्म नहीं होनी चाहिए। जज साहब ने जो किया, वो सिर्फ अपनी बेटी के लिए नहीं, बल्कि हजारों ऐसी बेटियों के लिए एक मिसाल है जो चुपचाप दुख सह रही हैं। उन्होंने दिखाया कि:बेटियाँ बोझ नहीं, गर्व होती हैं।
तलाक कोई अंत नहीं, नई शुरुआत हो सकती है।
पिता का सबसे बड़ा कर्तव्य बेटी की खुशी और सुरक्षा है, न कि “समाज क्या कहेगा”।
यह घटना याद दिलाती है कि रिश्ता टूट सकता है, लेकिन रिश्तेदार नहीं टूटने चाहिए। माता-पिता का साथ अगर मजबूत हो, तो कोई भी लड़की डरकर गलत रिश्ते में नहीं रहेगी।अंत में…डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार शर्मा और उनकी पत्नी माधवी ने जो साहस दिखाया, वह सराहनीय है। उन्होंने न सिर्फ अपनी बेटी को सम्मान दिया, बल्कि पूरे समाज को यह संदेश दिया कि बेटी का घर हमेशा उसका अपना होता है – चाहे मायका हो या ससुराल। सही समय पर सही फैसला लेना हार नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की जीत है।
नोट -जो माता-पिता इस खबर को पढ़ रहे हैं, उनसे एक छोटी सी अपील – अपनी बेटी को सिर्फ शादी के लिए नहीं, बल्कि खुश रहने के लिए पालें। और जो बेटियाँ पढ़ रही हैं – याद रखें, आपका सम्मान किसी रिश्ते से बड़ा है।
आपका क्या विचार है? कमेंट में जरूर बताएं। क्या ऐसे पिता और परिवार की जरूरत है आज के समय में?





