Election Campaign in 5 States: चुनावी कटुता और गिरती भाषायी मर्यादा का खतरनाक दौर

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Election Campaign in 5 States: चुनावी कटुता और गिरती भाषायी मर्यादा का खतरनाक दौर

रंजन श्रीवास्तव 

देश में पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों के परिणाम चाहे जो हों, लेकिन इतना अभी से साफ है कि ये चुनाव भी लोकतांत्रिक विमर्श, जनहित के सवालों और नीतिगत बहसों से अधिक व्यक्तिगत हमलों, आरोप-प्रत्यारोप और भाषायी मर्यादा के पतन के लिए याद किए जाएंगे. भारतीय लोकतंत्र के लिए यह एक चिंताजनक संकेत है कि चुनाव अब विचारों की प्रतिस्पर्धा कम और शब्दों की हिंसा का अखाड़ा अधिक बनते जा रहे हैं.

वास्तव में आज के राजनीतिक माहौल में चुनाव जीतना दलों के लिए लगभग जीवन-मरण का प्रश्न बन चुका है. विपक्ष किसी भी कीमत पर सत्ता में वापसी चाहता है, जबकि सत्तारूढ़ पक्ष किसी भी कीमत पर अपनी सत्ता बचाए रखना चाहता है. इस मनोवृत्ति ने राजनीतिक संवाद को इस हद तक दूषित कर दिया है कि अब सार्वजनिक जीवन की न्यूनतम शालीनता भी दांव पर लगती दिखाई देती है. सत्ता की बेचैनी और विपक्ष की अधीरता मिलकर चुनावी राजनीति को दिन प्रतिदिन अधिक जहरीला बना रही है.

असम इसका ताजा और गंभीर उदाहरण है. वहां चुनावी हमले इतने नीचे उतर गए कि प्रतिपक्ष के प्रमुख चेहरे गौरव गोगोई और मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नियों तक को राजनीतिक आरोपों के घेरे में ला दिया गया.

विवाद की शुरुआत तब हुई जब मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने गौरव गोगोई की पत्नी के कथित पाकिस्तान लिंक का मुद्दा उठाते हुए उन पर पाकिस्तान के एजेंडे पर चलने का आरोप लगाया. इसके जवाब में कांग्रेस के मीडिया प्रभारी पवन खेड़ा ने मुख्यमंत्री की पत्नी के नाम पर तीन-तीन पासपोर्ट होने का आरोप लगाकर विवाद को और हवा दे दी. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ने 52,000 करोड़ रुपये का भ्रष्टाचार कर अमेरिका के एक प्रांत में निवेश किया है. मामला एफआईआर तक पहुंचा और खेड़ा के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई की नौबत भी आ गई.

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के हालिया बयान भी इसी गिरावट की मिसाल हैं. असम में चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने बीजेपी और आरएसएस की तुलना जहरीले सांप से कर दी. इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई सांप सामने आ जाए तो नमाज छोड़कर भी पहले उसे मार देना चाहिए. स्वाभाविक है कि इस बयान ने तीखी प्रतिक्रिया पैदा की और भाजपा ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी. इससे पहले केरल में चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने गुजरात के लोगों को अशिक्षित बता दिया था, जिस पर बाद में उन्हें खेद प्रकट करना पड़ा.

यह पहली बार नहीं है जब खड़गे इस तरह के विवादों में घिरे हों. अप्रैल 2023 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान भी उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना जहरीले सांप से की थी.

कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि भाषा की चूक ने उसे अतीत में भारी राजनीतिक नुकसान पहुंचाया है. सोनिया गांधी द्वारा प्रधानमंत्री के लिए “मौत का सौदागर” जैसे शब्दों का इस्तेमाल और मणिशंकर अय्यर द्वारा नरेंद्र मोदी को “नीच” कहा जाना, भाजपा के लिए राजनीतिक अवसर साबित हुआ और कांग्रेस की छवि को नुकसान पहुंचा. इसी तरह पिछले वर्ष प्रयागराज में कुंभ मेले के दौरान खड़गे की यह टिप्पणी कि “क्या गंगा में स्नान करने से गरीबी मिट जाएगी”, व्यापक जनभावना को आहत करने वाली मानी गई थी.

लेकिन समस्या केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं है. सत्ता पक्ष भी इस मामले में किसी प्रकार से निर्दोष नहीं कहा जा सकता. स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान “मुस्लिम”, “मटन”, “मुजरा” और “मंगलसूत्र” जैसे शब्दों के प्रयोग को लेकर विपक्ष के निशाने पर रहे.

हाल ही में संसद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा बहस के दौरान ऐसे शब्द का प्रयोग किया गया, जिसे असंसदीय मानते हुए कार्यवाही से हटाना पड़ा. यह घटना बताती है कि भाषा का यह अवमूल्यन अब केवल चुनावी मंचों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संसद जैसे सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थान तक पहुंच चुका है.

राहुल गांधी का 2023 का वह बयान भी इसी प्रवृत्ति का हिस्सा लगता है, जिसमें उन्होंने कहा था, “ऐसा क्यों है कि सभी चोरों का सरनेम मोदी है”. इस बयान पर दायर मानहानि मामले में सूरत की अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया और कुछ समय के लिए उनकी संसदीय सदस्यता भी चली गई.

दरअसल, नेताओं को लगता है कि तीखे और विवादास्पद बयान मीडिया की सुर्खियां दिलाते हैं, सोशल मीडिया पर ट्रेंड बनाते हैं और समर्थकों को तुरंत भावनात्मक रूप से सक्रिय कर देते हैं पर यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक स्थिति है.

अब जबकि भाजपा 2029 के लोकसभा चुनावों की तैयारी में जुटी है और लगातार चौथी बार सत्ता में बने रहने की कोशिश कर रही है, वहीं कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक के कई दल लगातार तीसरे कार्यकाल से विपक्ष में हैं. ऐसे में यह साफ है कि सत्ता और अस्तित्व की यह लड़ाई आने वाले समय में और अधिक आक्रामक होगी. दुर्भाग्य से फिलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं दिखता कि कोई भी प्रमुख राजनीतिक दल भाषायी मर्यादा, वैचारिक गंभीरता और लोकतांत्रिक गरिमा की वापसी के लिए सचमुच प्रतिबद्ध है.

चुनाव जीतना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि लोकतंत्र किस भाषा, किस संस्कृति और किस नैतिक आधार पर आगे बढ़ेगा.