वाघा बार्डर से आंखों देखी: वीरता, सम्मान और राष्ट्र गौरव की अमिट अभिव्यक्ति

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वाघा बार्डर से आंखों देखी:
वीरता, सम्मान और राष्ट्र गौरव की अमिट अभिव्यक्ति

संजीव शर्मा की विशेष रिपोर्ट

ठंड की शामें उत्तर भारत में एक अनोखी रंगत भरी होती हैं। सूरज ढलते-ढलते आकाश में गुलाबी केसरिया आभा बिखेरता है, ठंडी हवाएँ हल्की सी कंपकंपी पैदा करती हैं और दूर से आती धुंध की चादर वातावरण को अपने आगोश में समेट लेती है। ऐसे में पाकिस्तान के लाहौर से महज 20 किमी और पंजाब के अमृतसर से 30 किलोमीटर दूर अटारी-वाघा बॉर्डर पर बीटिंग रिट्रीट समारोह देखना ठंड में भी गर्माहट ला देता है क्योंकि यहां प्रकृति की सर्दी देशभक्ति की गर्मी से टकराती है।
शाम के करीब साढ़े चार बज रहे हैं। ठंड से बचने के लिए हम भी सपरिवार शॉल, स्वेटर और जैकेट जैसे सुरक्षा कवच के साथ स्टेडियम में सबसे सामने वीआईपी सीट पर अपनी जगह ले लेते हैं। वैसे, यहां लोगों के आने का सिलसिला करीब तीन बजे से शुरू हो गया था और दर्शक दीर्घा धीरे धीरे भरने लगी है। स्टेडियम के बाहर तिरंगा ध्वज से लेकर तिरंगा कैप बेचने एवं चेहरे पर राष्ट्रीय ध्वज की छाप छोड़ने वाले कलाकार मौजूद हैं। उनके लिए भी क्रिकेट मैच की तरह यही कमाई का अवसर है।
उधर, दर्शकों की भीड़ में बच्चे, बुजुर्ग, देशी विदेशी पर्यटक…सभी हैं और सबके चेहरे पर ग़ज़ब का जोश है । झुंड के झुंड आ रहे हैं और ‘कोई सिख, कोई जाट-मराठा, कोई गुरखा, कोई मद्रासी..’ गीत की तर्ज़ पर स्टेडियम की रौनक का हिस्सा बन रहे हैं। हवा में जरूर ठंडक है, लेकिन जोश इतना कि किसी को कोई शिकायत नहीं है। अटारी बाघा बॉर्डर पर भारत की साइड राष्ट्रभक्ति से भरपूर गाने लोगों के उत्साह को दोगुना कर रहे हैं जबकि पाकिस्तान साइड टीवी पर आतिफ असलम गुनगुना रहे हैं। भारतीय पवेलियन खचाखच भर गए हैं जबकि पाकिस्तान साइड में अब तक भारत की तुलना में मुट्ठी भर दर्शक ही हैं जबकि बाघा बार्डर अमृतसर की तुलना में लाहौर से ज्यादा पास है।
हमारी गैलरी में तैनात सुरक्षा कर्मी की सलाह पर हमने कार्यक्रम शुरू होने से पहले भारत-पाकिस्तान के मेन गेट, सीमा निर्धारित करने वाले पिलर,स्टेडियम सहित भीड़ के साथ भी फोटोग्राफी का अपना कोटा पूरा कर लिया। इसी बीच, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की अनुमति से महिलाओं की एक बड़ी टोली ने तिरंगा लेकर राष्ट्रभक्ति से सराबोर गीतों पर करीब पौन घंटे के धूमधड़ाके भरे नृत्य से माहौल में देशप्रेम घोल दिया है।
स्टेडियम में भारतीय साइड महात्मा गांधी की आकर्षक विशाल तस्वीर है जबकि पाकिस्तान में स्क्रीन पर केवल कार्यक्रम के दौरान ही जिन्ना की फोटो दिखाई दी। स्टेडियम में रह रहकर वंदे मातरम और हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे गूंजने लगे हैं। अब शुरू हो रहा है मुख्य समारोह। भारत के ऊंचे पूरे स्मार्ट बीएसएफ जवान अपनी आकर्षक लाल पगड़ी और खाकी वर्दी में बेहतरीन मार्च पास्ट का प्रदर्शन कर रहे हैं। उनके पैर इतने ऊँचे जाते हैं कि लगता है आसमान छू लेंगे और हर कदम पर दर्शकों की ज़ोरदार तालियाँ उनके उत्साह को और बढ़ा रही हैं।
जवानों के साथ सरप्राइज़ पैकेज के तौर पर बीएसएफ की महिला वॉरियर्स भी राइफलों को अंगुलियों पर नचाती हुई उपस्थित दर्शकों को हैरान कर देती हैं। महिला वॉरियर्स के करतब इस परेड में चार चांद लगा देते हैं। भारत की ओर से बीएसएस के जवान जैसे ही कदम बढ़ाते हैं, मैदान में एक नई ऊर्जा और उत्तेजना फैल जाती है। इसके फलस्वरूप जवानों की चाल, तेज़ एवं लयबद्धता और दमदार दिखाई देने लगती है। जवानों की ऊँची उठती टाँगें, एड़ी की कड़क आवाज और हवा में लहराते मजबूत हाथ, हमें हर क्षण आश्वस्त करते हैं कि देश सुरक्षित हाथों में है।
दूसरी ओर पाकिस्तानी रेंजर्स भी उसी तीव्र, आक्रामक और नाटकीय अंदाज़ में प्रदर्शन कर रहे हैं। दोनों ओर की मुद्राएं पूरे माहौल को चुनौती और जोश से भर देती हैं। इस परेड की खासियत यह है भारत और पाकिस्तानी दोनों ही साइड मिनट टू मिनट एक सी गतिविधियां होती हैं बिल्कुल ‘मिरर इमेज़’ की तरह…इसलिए पाकिस्तानी रेंजर्स भी अपनी काली वर्दी में वैसा ही जोश भरा प्रदर्शन कर रहे हैं। दोनों तरफ़ से प्रतिद्वंद्विता के साथ अनुशासन और समन्वय का अद्भुत नजारा देखने को मिल रहा है। पहले दोनों देश अपने अपने गेट भी खोलते थे लेकिन आजकल द्वार बंद रहते हैं और दोनों पक्ष गेट के आरपार ही अपना जोश एवं जलवा बिखेरते हैं।
अब बारी है सबसे प्रतीक्षित पल की…जब दोनों ओर के जवान गेट के ठीक सामने एक साथ पहुँचते हैं। हल्की ठंड में जोशीली सांसें भाप बनकर ऊपर उठती हैं और हवा में घुल मिलकर इंसानियत और परस्पर भाईचारे का संदेश देती हैं। अब दोनों देशों के झंडे बिल्कुल तालमेल के साथ नीचे उतर रहे हैं…न बहुत तेज़, न बहुत धीमे—बस,नियंत्रित गति से परस्पर दूरी एवं परंपरा का सम्मान करते हुए। यह दृश्य ऐसे लगता है जैसे दोनों देशों के राष्ट्रीय ध्वज हाथ में हाथ डालकर शांति की पहल करते हुए अपने अपने अवाम का सिर गर्व से ऊंचा कर रहे हैं। जैसे ही झंडे समारोहिक अंदाज में मोड़कर रखे जाते हैं, उनके सम्मान में दर्शकों की तालियाँ गूँज उठती हैं। रोशनी, संगीत, नारे सब मिलकर इसे जोश और राष्ट्रीय गर्व से भरा अनुभव बना देते हैं।
यह समारोह सिर्फ़ एक सैन्य परेड नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गौरव और पड़ोसी के साथ जटिल रिश्ते की अनूठी अभिव्यक्ति है। वाघा बॉर्डर का यह नजारा देखकर मन जोश से भर जाता है। यहाँ आकर लगता है कि सीमाएँ भले विभाजित करें, लेकिन राष्ट्र के प्रति प्रेम, जोश और अनुशासन दोनों देशों को जोड़ते हैं। अगर आप अमृतसर जाएँ, तो इस समारोह को ज़रूर देखें, यह अनुभव जीवन भर याद रहेगा। वाघा बॉर्डर का यह दृश्य न सिर्फ दिल-ओ-दिमाग़ पर अमिट छाप छोड़कर स्थायी यादगार बन जाता है बल्कि ऐसा लगता है जैसे सीमा खुद जीवंत होकर एक कहानी सुना रही है—वीरता, सम्मान और राष्ट्रगौरव की।