Jhuth Bole Kauva Kaate: बाप-बेटे को चुनौती दे रहे बाप-बेटे

Jhuth Bole Kauva Kaate: बाप-बेटे को चुनौती दे रहे बाप-बेटे

गोरक्षपीठाधीश्वर और सीएम योगी आदित्यनाथ आज केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह की उपस्थिति में गोरखपुर सदर विधानसभा सीट से नामांकन करेंगे जबकि, कांग्रेस-सपा ने गोरखपुर में अब तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं। वे अंतिम समय तक कोई धमाका करने की कोशिश में हैं। पूर्व सीएम और सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव मैनपुरी की करहल सीट से ताल ठोक चुके हैं। पूर्व सीएम और बसपा मुखिया मायावती मैदान में स्वयं नहीं, बसपा उम्मीदवारों को लड़ाने मे जुटी हैं, जैसे मैदान के बाहर से खेल का मजा ले रही हैं। कांग्रेस के पास खोने जैसा कुछ है नहीं, तो भी पार्टी की प्रदेश प्रभारी प्रियंका गांधी ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ नारे के सहारे जी-जान से जुटी हुई हैं।

Jhuth Bole Kauva Kaate: बाप-बेटे को चुनौती दे रहे बाप-बेटे

गुरुओं की विरासत संभालने की चुनौतीः खूबी यह है कि करहल जहां मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक गुरु नत्थू सिंह का कर्मक्षेत्र रहा है, वहीं गोरखपुर सदर सीट से सीएम योगी के गुरु महंत अवैद्यनाथ विधायक रहे हैं। फिलहाल, बाबा गोरखनाथ की धरती पर सीएम योगी के खिलाफ आजाद समाज पार्टी और भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण ने ताल ठोक दिया है। उनका दावा है कि वे योगी को हराकर गोरखपुर के लोगों द्वारा 1971 में बनाये गये उस इतिहास को दोहरा देंगे, जो जिले की मानीराम सीट पर तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिभुवन नारायण सिंह की शिकस्त से बना था। उनका दावा है कि वे खुद भी 36 छोटे दलों के ‘सामाजिक परिवर्तन मोर्चा’ की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। बिना संगठन, जन-समर्थन और आंकड़ों के उनका मंसूबा कैसे पूरा होगा, यह सवाल जरूर है।

दूसरी तरफ, गोरखपुर सदर की सीट पर अबतक हुए 17 चुनावों में 10 बार जनसंघ, हिंदू महासभा और भाजपा का परचम लहरा चुका है। एक बार जनसंघ के नेता को जनता पार्टी के बैनर तले जीत मिली। अपने अभ्युदय काल और इंदिरा-सहानुभूति लहर को मिलाकर छह बार कांग्रेस को जीत मिली। फिलहाल तीन दशक से कांग्रेस को जमानत बचाने के भी लाले पड़ गए हैं। सपा-बसपा का तो अब तक खाता भी नहीं खुला।

गोरक्षपीठ के नाते जाति, धर्म और मजहब के सारे समीकरण ध्वस्त हो जाते हैं। योगी पांच बार गोरखपुर से सांसद रहे हैं। हर बार शहर क्षेत्र से उन्हें बम्पर वोट मिले। 2009 के संसदीय चुनाव में उन्हें गोरखपुर शहर विधानसभा क्षेत्र से कुल पड़े 122983 मतों में से 77438 वोट मिले जबकि दूसरे स्थान पर रहे बसपा के विनय शंकर तिवारी को सिर्फ 25352 वोट। उस समय यहां सपा को महज 11521 मत हासिल हुए थे। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में योगी को मिले वोटों का ग्राफ और बढ़ गया। 2014 के संसदीय चुनाव में गोरखपुर शहर विधानसभा क्षेत्र से कुल पोल हुए 206155 वोटों में से अकेले योगी को 133892 वोट मिले। दूसरे स्थान पर रहीं सपा की राजमती निषाद को 31055 और बसपा के रामभुआल निषाद को 20479 वोट ही हासिल हो सके।

गोरखपुर सदर सीट पर करीब 4.50 लाख वोटर हैं, जिनमे सबसे अधिक 95 हजार कायस्थ हैं। यहां 55 हजार ब्राह्मण, 50 हजार मुस्लिम, 25 हजार क्षत्रिय, 45 हजार वैश्य, 25 हजार निषाद, 25 हजार यादव और 20 हजार दलित हैं। इसके अतिरिक्त पंजाबी, सिंधी, बंगाली और सैनी कुल मिलाकर करीब 30 हजार वोटर हैं। कायस्थ प्रत्याशी विजय श्रीवास्तव के बूते ‘आप’ ने दांव खेला है। लेकिन यह जीतने का कम योगी को नुकसान पहुंचाने का दांव जरूर लगता है।

सपा के पाले में आई कद्दावर भाजपा नेता स्व. उपेंद्र दत्त शुक्ला की धर्मपत्नी सुभावती शुक्ला टिकट की प्रबल दावेदार हैं लेकिन, अखिलेश यादव संभवतः निवर्तमान विधायक डॉ. राधामोहन दास अग्रवाल को पटाने की कोशिश में अपने पत्ते खोल नहीं रहे। 2002 में हिन्दू महासभा से जीतकर 2007 से लेकर 2017 तक भाजपा से लगातार जीतने वाले डॉ. राधामोहन दास अग्रवाल को योगी आदित्यनाथ ही राजनीति में लाए थे। हालांकि, कहते हैं कि पिछले कुछ समय से डॉ. अग्रवाल और योगी के समीकरण बिगड़ गए थे। अब, उनका टिकट कटने से उत्पन्न हो सकने वाले असंतोष का फायदा उठाने के चक्कर में ही सपा है। ऐसा नहीं हुआ तो संभव है कि सपा चंद्रशेखर आजाद के समर्थन की ही घोषणा कर दे। कांग्रेस सपा प्रत्याशी का समर्थन करेगी या वोट कटवा प्रत्याशी उतारेगी, तय है।

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झूठ बोले कौआ काटे, मुख्‍यमंत्री बनने के बाद भी योगी आदित्‍यनाथ का गोरखपुर से रिश्‍ता नहीं टूटा। लखनऊ से गोरखपुर जाना-आना बना रहा। यहां तक कि राज्य में चौतरफा सक्रिय रहने के बावजूद पूरे पांच साल गोरखनाथ मंदिर में जनता दरबार का सिलसिला भी नहीं टूटा। इसलिए, किसी बड़े उलटफेर की गुंजाइश किसी सूरत में नहीं दिखती।

चर्चा में करहलः आजमगढ़ से सांसद अखिलेश यादव भी योगी आदित्यनाथ की तरह आज तक विधानसभा चुनाव नहीं लड़े हैं। इस बार सपा सुप्रीमो अखिलेश करहल सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। दूसरी ओर, भाजपा ने यहां से केंद्रीय क़ानून राज्य मंत्री और आगरा से सांसद एसपी सिंह बघेल को उम्‍मीदवार घोषित करके मुकाबले को रोमांचक बना दिया है। समाजवादी पार्टी में रह चुके बघेल देश के पूर्व रक्षा मंत्री रहे मुलायम सिंह यादव की सुरक्षा में भी तैनात रह चुके हैं।

बघेल अब तक तीन बार यादव परिवार से चुनाव मैदान में भिड़ चुके हैं। उनका सबसे पहला मुक़ाबला 2009 में अखिलेश यादव से फ़िरोज़ाबाद लोक सभा सीट पर हुआ और वो बसपा के प्रत्याशी बन कर मैदान में उतरे। अखिलेश यादव ने उन्हें 67,000 वोटों से हरा दिया। 2009 में अखिलेश कन्नौज और फ़िरोज़ाबाद दोनों सीटों से चुनाव जीते थे तो उन्होंने फ़िरोज़ाबाद छोड़ दी।

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2009 के लोकसभा उपचुनाव में डिंपल यादव को मैदान में उतारा गया और उनका मुक़ाबला कांग्रेस के राज बब्बर और बसपा के एसपी सिंह बघेल से हुआ। डिंपल राज बब्बर से चुनाव हार गईं और एसपी सिंह बघेल तीसरे नंबर पर रहे। लेकिन, डिंपल यादव से सिर्फ़ 13000 कम वोट मिले थे। 2014 के लोक सभा चुनाव में वो तीसरी बार फ़िरोज़ाबाद से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े। इस बार उनका मुक़ाबला सपा के वरिष्ठ नेता और अखिलेश यादव के चाचा रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव से हुआ। मोदी लहर के बावजूद अक्षय ने 1,14,000 वोटों से एसपी सिंह बघेल को हराया।

कांग्रेस ने करहल और जसवंतनगर सीट पर अपना प्रत्याशी नहीं उतारने का फैसला किया है। करहल से पूर्वघोषित कांग्रेस प्रत्याशी ज्ञानवती यादव को नामांकन करने से मना कर दिया गया है। दरअसल, सपा 2009 से गांधी परिवार के खिलाफ अपना उम्मीदवार नहीं उतार रही है। ऐसे में कांग्रेस ने भी मैनपुरी में मुलायम सिंह यादव और आजमगढ़ में अखिलेश यादव के खिलाफ प्रत्याशी नहीं उतारा था। यही नहीं, कन्नौज सीट पर डिंपल यादव के खिलाफ भी किसी को प्रत्याशी नहीं बनाया था। लोकदल ने भी मुलायम सिंह यादव परिवार के खिलाफ प्रत्याशी न उतारने का फैसला किया है। करहल सीट से उनके प्रत्याशी ने नाम वापस ले लिया है। वहीं बसपा ने कुलदीप नारायण को अपना उम्मीदवार बनाया है।

झूठ बोले कौआ काटे, करहल सीट पर सपा का तीन दशक से कब्जा है। समाजवादी पार्टी के गठन से ही यह उसका गढ़ रही है। इस सीट पर सिर्फ एक बार कांग्रेस और एक बार भाजपा जीती है। अन्यथा यहां सपा ही जीतती आयी है। दरअसल, करहल विधानसभा सीट पर सबसे अधिक 38 प्रतिशत यादव मतदाता हैं, जो निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। ऐसे में बघेल को लाकर भाजपा ने अखिलेश यादव को उनके घर में घेरने की कोशिश जरूर की है, लेकिन पलड़ा अखलेश का ही भारी है।

बाप-बेटे को चुनौती दे रहे बाप-बेटेः समाजवादी पार्टी ने रामपुर के मौजूदा सांसद और करीब दो साल से जेल में बंद आजम खां को रामपुर शहर सीट से उम्मीदवार बनाया है, जबकि उनके बेटे अब्दुल्ला आजम रामपुर जिले की स्वार टांडा सीट से प्रत्याशी हैं। आजम खां को रामपुर में कांग्रेस के टिकट पर नवाब खानदान के वारिस काजिम अली खान उर्फ नवेद मियां चुनौती दे रहे हैं। वहीं, आजम के बेटे अब्दुल्ला के खिलाफ नवेद मियां के बेटे हैदर अली खां ने ताल ठोक दी है। हैदर भाजपा गठबंधन की सहयोगी पार्टी अपना दल (एस) के उम्मीदवार हैं। पिछले चुनाव में अब्दुल्ला आजम ने स्वार सीट पर हैदर के पिता नवेद मियां को हराया था। रामपुर में आजम खां और नवाब खानदान यानी नूर महल के बीच सियासी अदावत लंबे समय से है।

आजम खां रामपुर शहर सीट से 9 बार विधायक और 4 बार कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। फिलहाल रामपुर शहर सीट से उनकी पत्नी तंजीम फातिमा विधायक हैं। पूर्व मंत्री नवेद मियां स्वार सीट से तीन बार और बिलासपुर सीट से एक बार विधायक रह चुके हैं। नवेद मियां के दिवंगत पिता जुल्फिकार अली ख़ां उर्फ मिक्की मियां रामपुर से कांग्रेस के 5 बार सांसद रहे हैं, वहीं नवेद मियां की मां बेगम नूर बानो इस सीट से कांग्रेस की दो बार सांसद रह चुकी हैं।

बोले तो, माना जाता है कि आजम खां बस आकाश सक्सेना को धूल चटाने के लिए यह चुनाव लड़ रहे हैं। दरअसल, भाजपा प्रत्याशी आकाश सक्सेना ने एक के बाद एक करीब 30 मुकदमे आजम खान के ऊपर लाद दिये जिसकी वजह से उन्हें और उनके परिवार को जेल की हवा खानी पड़ी। फिलहाल, आजम खां के खिलाफ 103 मुकदमे दर्ज हैं। बसपा ने इस सीट से सदाकत हुसैन को प्रत्याशी बनाया है, तो आम आदमी पार्टी ने फैसल खां लाला और कांग्रेस ने काजिम अली खां पर दांव लगाया है।

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स्वार टांडा सीट से चुने गए आजम खान के बेटे अब्दुल्ला की विधानसभा सदस्यता उनकी जन्मतिथि में हेराफेरी के आधार पर अदालत ने रद्द कर दी थी। इस बार वह फिर जोर-शोर से मैदान में हैं। उनके समर्थक अब्दुल्ला के साथ सहानुभूति वोट होना बता रहे हैं तो, हमजा मियां भाजपा के वोट बैंक के अलावा नवाब परिवार के वोट बैंक के साथ पहला चुनाव होने की वजह से चर्चा में हैं। विदेश में शिक्षा-दीक्षा के कारण युवाओं में भी उनका क्रेज है। कांग्रेस ने ठाकुर बिरादरी के राजा ठाकुर को मैदान में उतारा है। वहीं बसपा से अध्यापक शंकर सैनी मैदान में हैं।

झूठ बोले कौआ काटे, रामपुर विधानसभा सीट पर आज तक कोई भी गैर मुस्लिम उम्मीदवार नहीं जीता है। वजह ये कि लगभग 3 लाख 18 हजार मतदाताओं वाली इस सीट पर करीब 50 फीसदी मतदाता मुस्लिम ही हैं। मुस्लिम वोटों के बंटवारे के बीच भाजपा की कोशिश है कि आजम विरोधी वोटों का बिखराव नहीं होने पाए। ऐसे में, आजम खां के लिए इस बार मुकाबला आसान नहीं है।

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स्वार से लड़ रहे अब्दुल्ला आजम भी पिछले दो साल से जेल में थे। हाल ही में उन्हें जमानत मिली है। कभी स्वार विधानसभा सीट भाजपा का गढ़ रही थी। इस सीट से भाजपा के शिव बहादुर सक्सेना ने चार बार जीत हासिल की थी। बाद में यह सीट नवाब खानदान का मजबूत किला बनकर उभरी। वक्त के साथ ही इस सीट पर आजम खां के परिवार का दबदबा हो गया। आजम के बेटे अब्दुल्ला आजम ने 2017 में यहां से जीत हासिल की थी। लेकिन इस बार, मुकाबला दिलचस्प है।

और ये भी गजबः कौशांबी की चायल तहसील के छोटे से गांव भगवानपुर में 200 साल पुराने शिव मंदिर में पुजारी बृजेन्द्र नारायण मिश्रा ने 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिमा स्थापित की थी। उन्होंने मंदिर का नाम नमो-नमो शिव मंदिर रख दिया, जिसमें आज भी भाजपा विजय अनुष्ठान जारी है। पुजारी मिश्रा का कहना है कि वह संकल्पित हैं कि अनुष्ठान की पूर्णाहुति मंदिर परिसर में आकर स्वयं पीएम मोदी करेंगे।

मोदी प्रशंसक बृजेन्द्र मिश्रा के अनुसार, उन्होंने उस समय पीएम मोदी की प्रतिमा भगवान शिवालय के गर्भगृह में स्थापित कर उनके लोक कल्याण की भावना को ध्यान में रख शिव आराधना का काम शुरू किया, ताकि पीएम मोदी बिना किसी रूकावट के भगवान शिव से नित ऊर्जा को हासिल करते रहें और जन-कल्याण के कामो में कोई विघ्न बाधा न उत्पन्न हो। आज भी बृजेन्द्र मिश्रा पीएम मोदी की दीर्घायु के लिए महामृत्युंजय का जाप मंदिर परिसर में कर रहे है।

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रामेन्द्र सिन्हा
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