Film Review: ‘धुरन्धर 3 : शांतिदूत’ की समीक्षा

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Film Review: ‘धुरन्धर 3 : शांतिदूत’ की समीक्षा

डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी

(बैठे बैठे क्या करें, करना है कुछ काम,
शुरू करो फिल्म रिव्यू, लेके धर का नाम )

Dhurandhar 3 Peacekeeper फिल्म ईरान की अमेरिका -इजराइल लड़ाई और विश्वशांति में भारत की कामयाबी पर केन्द्रित है।

पिछली दोनों धुरंधरों की तरह ‘धुरंधर 3 : शांतिदूत’ भी सच्ची घटनाओं से प्रेरित एक काल्पनिक, रोचक और देश प्रेम की भावना से भरपूर स्पाई थ्रिलर फिल्म है, जो 30 फरवरी 2027 को रिलीज हुई। पिछली फिल्में जहां भारत-पाकिस्तान के मुद्दों पर केन्द्रित थी, वहीं यह फिल्म ग्लोबल लेवल पर निर्मित है। हॉलीवुड ईश्टाइल!

फिल्म की शुरुआत भव्य एक्शन सीन से होती है, जिसमें तेहरान के आसमान में ईरानी ड्रोन्स और इजरायली फाइटर जेट्स के बीच डॉगफाइट हो रही है। अमेरिकी नौसेना का एक कैरियर स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ में फंसा हुआ है। विश्व युद्ध कगार पर है और मिडिल ईस्ट आग से खेल रहा है।

इस फिल्म में पिछली दोनों धुरंधरों के कलाकारों को फिर से लिया गया है। जसकीरत सिंह रंगी (रणवीर सिंह) अब ब्रिगेडियर बन गया है। जिसने हम्ज़ा अली माजरी का रोल किया था, वह एक लीजेंडरी अंडर कवरेज एजेंट है और रॉ का सबसे अनुभवी ‘शैडो ऑपरेटर’ भी। वह चतुर, शांत और घातक है. अब उसने फारसी, अरबी और हिब्रू भी सीख ली है और फ्लूएंटली बोलता है। अब उसका मिशन पाकिस्तान जाकर उसे तबाह करना नहीं, बल्कि विश्व युद्ध को रोकना है, क्योंकि भारत को तेल संकट और क्षेत्रीय अस्तित्व से भारी नुकसान हो रहा है। इंडियन पीएम का सख़्त निर्देश है कि विश्वयुद्ध नहीं होने देना है, तो नहीं होने देना है। वसुधैव कुटुम्बकम हमारा ध्येय है।

जसकीरत की पार्टनर एजेंट नेहा शर्मा है, जिसकी भूमिका सारा अर्जुन ही कर रही है। वह एक ऐसी शख्सियत है जो साइबर एक्सपर्ट है, टेक्नोलॉजी में वाकिफ है, हाईटेक गैजेट से लैस नेहा होलोग्राफिक डिसगाइज्ड मास्क, एआई ड्रोन, ब्रेन वेव स्कैनर जैसी तकनीक में एक्सपर्ट है। वह असंभव को संभव बना सकती है। इसके साथ ही वह इमोशनल डेप्थ भी रखती है और उसका सेंस ऑफ ह्यूमर भी गजब है। जवान और खूबसूरत तो वह है ही !

धुरंधर 2 में संजय दत्त मर गया था, लेकिन वह फिर अब रॉ का चीफ विक्रम सिंह के नाम से आ गया है। वह सख्त है, दूरदर्शी है, बहुत खूंखार भी। अब वह पाकिस्तान में नहीं, दिल्ली में बैठकर ऑपरेशन चलाता है। इसका ही नारा है – भारत न तो युद्ध चाहता है, ना शांति की भीख ! हम विश्व शांति चाहते हैं क्योंकि हम विश्व गुरु हैं। हैं तो हैं।

आर माधवन ने अजीत डोभाल का रोल कर कर के बोर कर दिया है, इसलिए उनको अब डॉक्टर आर्यन खान का रोल दिया गया है। वह एक भारतीय -ईरानी वैज्ञानिक है जो ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम में होते हुए भी रॉ के साथ है और रॉ का काम कर रहे हैं।

अर्जुन रामपाल क्रूर, हैंडसम और अच्छे विलन साबित हुए थे, इसलिए उनको जनरल रेजा कबीर बना दिया गया है। उन्हें ईरान की रिवॉल्यूशनरी गार्ड का क्रूरतम कमांडर बनाया गया है, जो युद्ध को बढ़ावा देता है ताकि खुद पावर में आ सके।

मोसाद की एजेंट है रेबेका कोहेन, जो इंटरनेशनल कैरेक्टर है, इजरायली एजेंट है. वह शुरू में जसकीरत को अपना दुश्मन मानती है, लेकिन बाद में उसके साथ काम करती है। इसके कारण फिल्म में थोड़ा ग्लैमर भी आ गया है। यह रोल एक विदेशी अभिनेत्री फलां ने किया है।

सीआईए के एजेंट जॉन मैक्लॉरेन की भूमिका एक ऐसे कलाकार ने निभाई है जो हिन्दी फिल्मों में उपेक्षित रहा है, लेकिन उसने अमेरिकी एजेंट की भूमिका जिस तरह निभाई है वह चमत्कार है। उसे शुरू में घमंडी दिखाया जाता है लेकिन भारतीय जासूसों की चालाकी देखकर वह हैरान रह जाता है।

ब्रिगेडियर जसकीरत अब तेहरान के एक ईरानी जनरल का बॉडीगार्ड बनकर घुस गया है। वह अपनी नकली दाढ़ी-मूंछ और हाईटेक मास्क लगाकर मीटिंग अटेंड कर रहा है। जनरल के साथ नमाज में भी शामिल है और इसी दौरान वह तेहरान से न्यूक्लियर कोड का रहस्य चुपचाप चुरा लेता है।

जसकीरत की गर्लफ्रेंड नेहा दिल्ली से ही ईरान के मिसाइल सिस्टम को हैक करती है। वह उसमें एक वायरस डाल देती है, जिसके कारण ईरानी ड्रोन्स को गलत टारगेट पर हमला करने के लिए मजबूर होना पड़ता है और वह इजरायल के बजाय खुद ईरानी बेस पर ही हमला कर देते हैं। स्क्रीन पर हाइटेक एनीमेशन और टेंशन भरे हॉट सीन दिखाना जरूरी था, वह इस फिल्म में हैं !

इस फिल्म में डिप्लोमेटिक मैनिपुलेशन बेहद चतुराई से पिरोये गए हैं। रॉ की टीम इस्तांबुल में एक सीक्रेट समिट आयोजित करती है, जिसमें जसकीरत ईरान, इजरायल और अमेरिका के डेलीगेट्स के बीच घूमता है और वहां से फेक इंटेलिजेंस की बातें लीक करता है जैसे ईरान के पास न्यूक्लियर बम तैयार है या ईरान इजरायल पर हमले की तैयारी कर रहा है। इससे तीनों पक्ष थोड़ा पीछे हट जाते हैं।

फिल्म में बहुत सारे हाई ऑक्टेन चेज़ सीन भरे हैं। दुबई की गगनचुंबी इमारतों के बीच कार चेंज़िंग के सीन हैं, स्पीडबोट से स्ट्रेट आफ होर्मुज़ पार करते हुए दिखाया गया। तेल से लदे विशालतम जलपोतों को बर्बादी से बचाने के लिए जसकीरत एक ईरानी स्पीडबोट को हाईजैक करता है और अमेरिकी नौसेना को सिग्नल भेजता है। बैकग्राउंड में विस्फोट और पानी के फव्वारे ! अगर यह जलपोत डूबता तो अक्खा समंदर प्रदूषित हो जाता।

डॉ आर्यन खान को लगता है कि वह धोखा खा गया है। फिल्म में एक ट्विस्ट फिर आता है कि जनरल रेजा क़ादिर खुद रॉ का पुराना एजेंट है। पिछली धुरंधरों में अजीत डोभाल यही सब तो कर गए हैं कि पूरी दुनिया में उनके एजेंट बिखरे पड़े हैं, जो कई देशों में बड़े-बड़े खुफिया पदों पर पहुंच गए हैं! वह कहता है कि शांति के लिए कभी-कभी दुश्मन से हाथ भी मिलना पड़ता है।

फिल्म का क्लाइमेक्स तेल अवीव, तेहरान और वाशिंगटन के बीच है जहां सिमल्टेनियस ऑपरेशन करते हुए दिखाया गया है। दुनिया जासूसों और जासूसी है, इसलिए यहाँ कोई भी, कुछ भी, कभी भी, कहीं भी कर सकता है।

अंत में जसकीरत तेहरान के बंकर में घुसकर जनरल को किडनैप कर लेता है. नेहा सेटेलाइट से रियल टाइम सपोर्ट देती है। आखिर में तीनों देश के काल्पनिक नेता वीडियो कॉल पर आते हैं और भारत की मध्यस्थता में दो हफ्ते का सीज़फायर मान लेते हैं। फिल्म का अंत दिल्ली में प्राइवेट सेलिब्रेशन से होता है। हमने युद्ध नहीं रोका, सिर्फ समय खरीदा है। असली शांति तो लोगों की समझदारी से ही आएगी।

इस फिल्म में गालियां भी इंग्लिशवाली हैं जैसे बास्टर्ड, डिक, एस होल , शिट, प्रिक, बकर, ब्लडी। … जब हिन्दी की गालियों को लोगों से सुना और सराहा तो इसमें भी सराहेंगे ही। फिल्म की लंबाई 4 घंटे 20 मिनट है जो पिछली दोनों फिल्मों से ज्यादा है.

भरपूर एक्शन, ट्विस्ट और टर्न्स, इमोशन, रियलिस्टिक जिओ पॉलिटिक्स का मिक्स है फिल्म में. स्वदेशी टेक जैसे डीआरडीओ के ड्रोन्स, इसरो के सैटेलाइट और भारतीय साइबर कमांड को दिखाया गया है। दर्शकों को गर्व का एहसास होता है इसमें। यह फिल्म न केवल मनोरंजक है, बल्कि यह मैसेज भी दे रही है कि दुनिया के बड़े देशों की लड़ाई को रोकने में भारत किस तरह काम कर रहा है। सन्देश होगा – विश्व गुरु बनने के लायक यही देश है ! फिल्म दर्शकों को बताया जाएगा कि ईरान तथा अमेरिका -इजराइल का युद्ध रोकने के लिए असली पहल भारत में की थी, जबकि पाकिस्तान, तुर्किये और इजिप्ट केवल दिखावे के लिए थे।

यह पूरी फिल्म काल्पनिक है लेकिन सच्ची घटनाओं से प्रेरित है. पंक्तियों के लेखक ने लेखकीय आजादी का भरपूर उपयोग किया है.

भारत माता की जय!
जय हिन्द!!

©डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी
30 फरवरी 2027

(हेडर फोटो- AI से निर्मित)

(प्रकाश हिन्दुस्तानी के अनुसार यह फिल्म रिव्यू एक तरह से व्यंग्य और काल्पनिक है)