Film Review: कहानी और एक्टिंग के दम पर टिकी वध 2 

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Film Review: कहानी और एक्टिंग के दम पर टिकी वध 2 

डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी

वध 2 एक ऐसी फिल्म है जो अपनी शुरुआत से लेकर अंत तक आपको बांधे रखती है, लेकिन यह बंधन चुपचाप, बिना जोर-शोर के बनता है। यह कोई हाई-वॉल्टेज एक्शन थ्रिलर नहीं है, बल्कि एक स्लो-बर्न क्राइम ड्रामा है जो जेल की चारदीवारी के भीतर नैतिकता, न्याय, बदला और इंसानी रिश्तों की गहराई को लेकर बना गया है।

निर्देशक जसपाल सिंह संधु ने मूल वध (2022) की तुलना में ज्यादा नियंत्रित और परिपक्व तरीके से कहानी पेश की है—यह स्पिरिचुअल सीक्वल है, लेकिन पूरी तरह नई, अलग और ज्यादा प्रभावशाली।

फिल्म शिवपुरी जेल में सेट है, जहां रिटायरमेंट के करीब एक बुजुर्ग वार्डन शंभूनाथ मिश्रा (संजय मिश्रा) और डबल मर्डर केस में उम्रकैद काट रही महिला कैदी मंजू सिंह (नीना गुप्ता) के बीच एक अनोखा, प्लेटोनिक बॉन्ड बनता है। यह रिश्ता रोमांस नहीं, बल्कि दो अकेले, टूटे हुए इंसानों की साझा मजबूरी और समझ है—एक दीवार के इस पार और उस पार।

जब जेल में एक क्रूर, प्रभावशाली कैदी (जो राजनीतिक कनेक्शन वाला है) गायब हो जाता है, तो जांच शुरू होती है। इंस्पेक्टर प्रकाश सिंह (कुमुद मिश्रा) की तहकीकात इन दोनों की जिंदगी में घुस जाती है। कहानी का असली रोचक हिस्सा यह है कि ‘यह किसने  किया’  से ज्यादा ‘क्यों किया’ और ‘क्या यह सही था’  पर फोकस करती है।

फिल्म नैतिक ग्रे ज़ोन में रहती है—कोई साफ अच्छा-बुरा नहीं, बस इंसान और उनकी मजबूरियां। क्लाइमैक्स में ट्विस्ट आता है जो उम्मीद से ज्यादा गहरा और विचारोत्तेजक है, लेकिन यह इतना अनप्रेडिक्टेबल नहीं कि हैरान कर दे—बल्कि यह सोचने पर मजबूर करता है कि न्याय क्या होता है, और क्या बदला कभी न्याय बन सकता है?

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष अभिनय  है।  संजय मिश्रा एक बार फिर कमाल हैं। उनकी आंखों में वो दर्द, वो शांति और वो छिपा गुस्सा—सब कुछ बिना बोले कह जाता है। वे आम इंसान लगते हैं, न कि एक्टर।  नीना गुप्ता की परफॉर्मेंस में वो कड़वाहट, वो धैर्य और वो अंतिम क्षणों में आने वाली कमजोरी—सब कुछ इतना रियल है कि दिल छू जाता है। दोनों का साथ एक-दूसरे को सपोर्ट करता है, बिना ओवर-ड्रामा के।

कुमुद मिश्रा इंस्पेक्टर के रोल में सबसे प्रभावशाली हैं। उनका कैरेक्टर जातिवादी, अहंकारी लेकिन इंसानी है। वे इसे कार्टून नहीं बनाते, बल्कि खतरनाक और विश्वसनीय बनाते हैं।

निर्देशक जसपाल सिंह संधु ने फिल्म को बहुत रिस्ट्रेंटेड रखा है—कोई बैकग्राउंड म्यूजिक का जोर नहीं, कोई अनावश्यक ड्रामा नहीं। जेल का माहौल, कैमरा वर्क और एडिटिंग सब इतने टाइट हैं कि आपको लगता है आप भी उस जेल में फंसे हैं। कुछ जगहों पर पेसिंग थोड़ी स्लो हो जाती है, और कुछ सीन (जैसे कुछ कैरेक्टर्स के फ्लैशबैक) थोड़े लंबे लग सकते हैं, लेकिन कुल मिलाकर यह एक क्लास फिल्म है जो स्टोरी और एक्टिंग पर भरोसा करती है, न कि स्टंट्स, वीएफएक्स  या ग्लैमर पर।

कुछ ट्विस्ट्स थोड़े प्रेडिक्टेबल हैं, खासकर अगर आप क्राइम थ्रिलर ज्यादा देखते हैं। विलेन का कैरेक्टर थोड़ा कमजोर पड़ता है—उसकी क्रूरता दिखाई जाती है, लेकिन गहराई कम है।

फिल्म कभी-कभी  इमोशनल पीक थोड़ा फीका लगता है।

एक गंभीर, विचारोत्तेजक और इमोशनली रेजोनेंट थ्रिलर है जो आपको हंसाती नहीं, रुलाती नहीं—बल्कि सोचने पर मजबूर करती है। यह साबित करती है कि अच्छी कहानी, मजबूत एक्टिंग और सच्चाई से बनी फिल्में आज भी काम करती हैं। अगर आपको दृश्यम, कहानी या ब्लैक फ्राइडे जैसी फिल्में पसंद हैं, तो यह जरूर देखें।