गृह विभाग में मेरे चौथे बॉस- विजय सिंह

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विजय सिंह
विजय सिंह

विजय सिंह दिसंबर, 1993 के अंत में गृह सचिव पदस्थ किये गये।वे मेरे गृह विभाग में अतिरिक्त सचिव रहते चौथे बॉस थे।

एक वर्ष के राष्ट्रपति शासन समाप्त होने के बाद हुए चुनाव में विजयी दिग्विजय सिंह 7 दिसंबर, 1993 को मुख्यमंत्री बने। उनके द्वारा विजय सिंह की गृह सचिव की पदस्थापना की जाना चौंकाने वाली बात थी।

विजय सिंह गृह विभाग के पूर्ण प्रभारी पद के लिए उस समय काफ़ी जूनियर थे क्योंकि उनके ऊपर कोई प्रमुख सचिव भी नहीं बनाया गया था। विजय सिंह कभी सचिवालय में पदस्थ भी नहीं रहे थे। सेंट स्टीफ़न्स से पढ़े हुए, उनकी एक पक्के सख़्त IAS साहब की छवि थी। उनकी पदस्थापना से वल्लभ भवन में उनसे वरिष्ठ IAS अधिकारियों में आश्चर्य, कौतुहल और कदाचित ईर्ष्या का भाव आ गया था। फ़ील्ड पोस्टिंग में असाधारण कार्य करने के कारण कुछ लोग उन्हें सचिवालय में व्यंग से फ़ील्ड मार्शल कह रहे थे। कुछ लोगों का सीधा कहना था कि वे सचिवालय में नहीं चल पाएंगे।

पहले ही दिन संयोगवश वे मुझे 10 बजे के पहले लिफ़्ट में अकेले मिल गये और मैंने उनको अपना परिचय दिया।उन्होंने कहा मैं आपको जानता हूँ। मैं उनके विशाल व्यक्तित्व को केवल जिज्ञासा और भय मिश्रित भाव से देखता रह गया। मुझे सचिवालय में दो वर्ष का अच्छा अनुभव हो चुका था। विजय सिंह के आते ही सब लोग बहुत बारीकी से उनके काम की जानकारी ले रहे थे। मुझे सचिवालय में दो वर्ष का अच्छा अनुभव हो चुका था। शुरुआती दिनों में मैंने उनकी भरसक सहायता करने का प्रयास किया। उनके आने के बाद हुई प्रथम कैबिनेट में गृह विभाग के विषय की तैयारी मैंने बहुत सतर्कता पूर्वक की।

विजय सिंह में ग़ज़ब का आत्मविश्वास था और वह कैबिनेट में उसी आत्मविश्वास से गए। कैबिनेट में विजय सिंह का परफॉर्मेंस बहुत अच्छा रहा जिससे कुछ वरिष्ठ निराश भी हो गये।

प्रारंभ में एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि वे ट्रैश ( कचरा) मैग्जीन नहीं पढ़ना चाहते हैं और उन्होंने टाइम तथा द इकोनॉमिस्ट मैग्जीन बुलवाने को कहा। ख़ाली समय में वे इन मैगज़ीन को बहुत ध्यान से पढ़ते थे।वे वल्लभ भवन शुरू होने के शासकीय समय से काफ़ी पहले आ जाते थे और सारी फ़ाइलें सुबह- सुबह ही निपटा देते थे। इसके पश्चात वे दिन भर लोगों को गंभीरता से सुनने और विभाग की समस्याओं पर विचार करने आदि पर ध्यान देते थे।वे मीटिंग के स्थान पर अधिकारियों से व्यक्तिगत संक्षिप्त चर्चा करना अधिक पसंद करते थे।

विजय सिंह
विजय सिंह

मैं अपनी फ़ाइलें पूरी पढ़ने के बाद इंग्लिश में स्पष्ट मत के साथ उनके पास भेजता था और वे तत्काल सामान्यतया मेरी फ़ाइलें अनुमोदन के साथ वापस कर देते थे। शीघ्र ही उन्हें मुझ पर पूरा विश्वास हो गया हो गया था। पुलिस के राजपत्रित अधिकारियों के स्थानांतरण व अन्य विषयों से संबंधित प्रस्ताव मैं अपने विवेक से बनाता था और वे बिना अपवाद उनको स्वीकृति दे देते थे अथवा अनुमोदन के लिए मुख्यमंत्री को भेज देते थे।

उन्होंने मुझसे स्पष्ट कहा कि आप अतिरिक्त सचिव के पहले पुलिस अधिकारी भी रहे हैं और आप पुलिस अधिकारियों की उपयोगिता अच्छी तरह जानते हैं, उनके बारे में मैं क्यों निर्णय करूँ। मैंने इस महत्वपूर्ण अधिकार का बहुत निष्पक्षता और ईमानदारी से प्रयोग किया। कहा जाता था कि उनकी लोगों के प्रति बहुत गहरी पसंदगी या नापसंदगी रहती थी। वे एक सीधी भर्ती की IAS उप सचिव के लगभग सभी कार्यों से असंतुष्ट रहते थे जिसे लेकर वे परेशान रहती थी।

वे महत्वपूर्ण अनुमोदन की फाइलों को गृह राज्य मंत्री सत्यदेव कटारे को न भेजकर सीधे मुख्यमंत्री को भेज देते थे। कई महीनों के बाद मुख्यमंत्री के इशारा करने पर कार्य वितरण के अनुसार कुछ फाइलें वे राज्य मंत्री को भेजने लगे। कटारे जी किसी भी चर्चा के लिए सीधे मुझे बुलाते थे और मुझे उनके तथा विजय सिंह जी के बीच में सामंजस्य रखते हुए कुछ करना पड़ता था।फ़रवरी में बजट सत्र प्रारंभ होने पर विधानसभा की कटारे जी की ब्रीफ़िंग के लिए गृह विभाग की तरफ़ से कई दिनों तक केवल मैं जाता था।

पुलिस मुख्यालय के वरिष्ठ अधिकारी तो आते ही थे। कुछ दिनों के बाद कटारे जी के गृह सचिव और DGP को लिखित निर्देश प्राप्त हुए कि वे भी विधानसभा ब्रीफ़िंग में उपस्थित रहें। इसके उपरांत विजय सिंह ब्रीफ़िंग में जाते तो थे परंतु कुछ बोलते नहीं थे। शासन का पक्ष मुझे ही रखना पड़ता था। ऐसा प्रतिदिन होता था क्योंकि गृह विभाग से संबंधित कुछ न कुछ विषय विधानसभा में अवश्य रहते थे।

कटारे जी का घर चार इमली में मेरे घर के पीछे था और कभी-कभी कठिनाई अनुभव करने पर वे व्यक्तिगत ब्रीफ़िंग या चर्चा के लिए मुझे अकेले बुला लेते थे।

प्रारंभ में आइपीएस अधिकारियों में विजय सिंह के प्रति कुछ असहज भाव थे और वे उनसे मिलने में कतराते थे।उनमें से कुछ अधिकारियों की व्यक्तिगत समस्याएं थी। ऐसे अधिकारियों ने मुझसे पूछताछ करनी शुरू की।मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि वे निसंकोच अपनी समस्या विजय सिंह के समक्ष प्रस्तुत करें।मेरा कक्ष वरिष्ठ IPS अधिकारियों के लिए अतिथि कक्ष का भी काम करता था।समस्या लेकर आने वाले IPS अधिकारियों को तब हर्ष मिश्रित आश्चर्य हुआ जब उनकी समस्याएँ सरकारी ढर्रे से हट कर बहुत तेज गति से निपटा दी गई।

गृह सचिव के रूप में उन्हें अब पुलिस मुख्यालय का पूरा सहयोग प्राप्त हो गया। सचिवालय के वरिष्ठ अधिकारियों के उनके प्रति विचार भी सामान्य हो गये। उनकी पहले की फ़ील्ड पोस्टिंग की ख्याति के अनुरूप सचिवालय में भी उनकी योग्यता का सिक्का चमक गया। उनकी प्रतिष्ठा बढ़ने के साथ-साथ सम्भवतः मेरे सम्मान में भी वृद्धि हो गई।

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एन. के. त्रिपाठी

एन के त्रिपाठी आई पी एस सेवा के मप्र काडर के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। उन्होंने प्रदेश मे फ़ील्ड और मुख्यालय दोनों स्थानों मे महत्वपूर्ण पदों पर सफलतापूर्वक कार्य किया। प्रदेश मे उनकी अन्तिम पदस्थापना परिवहन आयुक्त के रूप मे थी और उसके पश्चात वे प्रतिनियुक्ति पर केंद्र मे गये। वहाँ पर वे स्पेशल डीजी, सी आर पी एफ और डीजीपी, एन सी आर बी के पद पर रहे।

वर्तमान मे वे मालवांचल विश्वविद्यालय, इंदौर के कुलपति हैं। वे अभी अनेक गतिविधियों से जुड़े हुए है जिनमें खेल, साहित्यएवं एन जी ओ आदि है। पठन पाठन और देशा टन में उनकी विशेष रुचि है।