Flashback: आधुनिकता और परम्परा का अद्भुत मिश्रण मेरी अम्मा

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मेरी अम्मा का जन्म 19 जनवरी, 1922 को लखनऊ के एक संपन्न और हिंदी साहित्य के मूर्धन्य समालोचक मिश्र बंधु परिवार में हुआ था।उनका नाम कमला रखा गया।एक छात्रा के रूप में वे मेधावी थी और दिल्ली के क्वींस मेरीज़ हाई स्कूल से प्रथम श्रेणी में हाई स्कूल पास किया था। दिल्ली में वे अपने ताऊ के पास रहती थीं जो DCM कंपनी में जनरल मैनेजर थे। इसके उपरांत दिल्ली के तत्कालीन प्रसिद्ध इंद्रप्रस्थ कॉलेज में उन्होंने केवल दो वर्ष और पढ़ाई की। 25 मई, 1940 को उनका विवाह मेरे पिता श्री विष्णु नारायण त्रिपाठी से हुआ जो न्यायिक सेवा में थे। मेरी अम्मा सुन्दर रूप रंग की आकर्षक महिला थीं।

यद्यपि मैं कानपुर में पैदा हुआ था परन्तु मेरा शैशवकाल दो वर्ष से पाँच वर्ष की अवस्था तक उन्नाव में व्यतीत हुआ।मेरी प्रारंभिक स्मृतियाँ इसी स्थान की हैं। एक बहन और चार भाइयों में सबसे छोटा होने के कारण मेरे ऊपर अम्मा का विशेष ध्यान रहता था। मैं बाहर खेल कर वापस आते ही अपनी अम्मा से चिपक जाता था। हमारे पड़ोसी और मकान मालिक शिव मंगल मिश्रा उन्नाव के बड़े वक़ील थे। उनकी पत्नी को बबुआइन कहा जाता था। उनके कोई संतान नहीं थी। वे हम बच्चों को बहुत प्यार करती थीं। हम सब उनके घर जाकर ऊधम करते थे और उनके सोफ़ों पर कूदते थे। पता चलने पर अम्मा ने उनके घर जाना प्रतिबंधित कर दिया।बबुआइन ने हमारे घर आकर अम्मा से कहा बच्चे ऊधम हमारे यहाँ करते हैं आपको क्या परेशानी है। हम फिर जाने लगे। सभी भाइयों के स्कूल जाने पर मैं उनकी पूजा में जाकर उनके साथ बैठता था। अम्मा ने मुझे प्रसाद के अतिरिक्त कुछ भी खाने को मना किया था इसलिए वे बिस्किट को प्रसाद कह कर खिलाती थीं। चार वर्ष की अवस्था में नए खुले मांटेसरी स्कूल में मैं उत्साह से जाता था।स्कूल पास में ही रेलवे पटरी के दूसरी तरफ़ था। एक दिन पैदल लौटते समय मैंने खड़ी मालगाड़ी के नीचे से निकल कर रेलवे पटरी पार की। पता चलने पर अम्मा ने विशेष पूजा की और अनाज वितरित किया। मेरे बहुत ज़िद करने पर अम्मा ने पैडल वाली मोटर बुलाई जिसे मेरे बाद भतीजे और भतीजियों ने भी चलाया।अम्मा ने मेरा कर्ण-छेदन ( कान छेदना) जैसा छोटा कार्यक्रम सभी रिश्तेदारों और मित्रों को दूर- दूर से बुलाकर धूमधाम से किया।

Flashback: आधुनिकता और परम्परा का अद्भुत मिश्रण मेरी अम्मा

अम्मा आधुनिकता और परम्परा का अद्भुत मिश्रण थीं। वे नियमित पूजा करती थी। वे सारे तीज त्योहार विधि विधान से मनाती थी। गोवर्धन पूजा में उनकी मिटटी की बनाई गायों से पूजा के बाद मैं खेलता था। जन्माष्टमी पर हम सभी भाई बहन खिलौनों से सुन्दर झाँकी बनाते थे। जन्माष्टमी को व्रत रखा जाता था तथा फलाहार पकवान बनते थे।अम्मा बताती थीं कि एक बार मैंने धोखे से कुछ खा लिया तो बड़े भाइयों ने बहुत चिढ़ाया। मैंने कहा कि व्रत नहीं टूटेगा क्योंकि मैं गोंद की बर्फ़ी खाकर जोड़ लूँगा। अम्मा हम लोगों की पढ़ाई पर भी बहुत ध्यान देती थी। छठवीं और सातवीं कक्षा में वे कभी-कभी मुझे अंग्रेज़ी पढ़ा देती थी।

अम्मा का घर की सभी गतिविधियों पर पूर्ण नियंत्रण था। मेरे पापा हम लोगों से बहुत कम बात करते थे और अपने कमरे में लगभग अलग से रहते थे।उनसे बात अम्मा के माध्यम से होती थी। वे अपना वेतन अम्मा को दे देते है जो घर की समस्त आवश्यकताओं के अनुसार व्यवस्था सँभालती थीं। वे पूरे घर की एक सशक्त धुरी थी। एक बार अम्मा को ग़ाज़ीपुर से किसी कारण लखनऊ जाना पड़ा।उनकी अनुपस्थिति में हम सभी भाईयों और बहन को कोई पिक्चर देखने की इच्छा हुई लेकिन इसके लिए पापा से सीधे बात करने का साहस नहीं था। सब लोगों ने यह निर्णय लिया कि एक काग़ज़ पर लिखकर अपनी माँग रखी जाए।वह कागज़ सबसे छोटा होने के कारण मुझे ले जाने के लिए कहा गया। काग़ज़ देख कर पापा ने हल्का सा मुस्कुरा कर पिक्चर की पूरी व्यवस्था कर दी।मेरे सबसे बड़े भाई के हाई स्कूल पास करने के बाद उनकी अग्रिम शिक्षा लखनऊ से कराने का निर्णय अम्मा ने लिया। इसके पश्चात बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में माइनिंग इंजीनियरिंग में उनका एडमिशन कराने में भी सक्रिय रहीं।उनसे छोटे भाई माइनिंग इंजीनियरिंग पढ़ाई करने के लिए धनबाद गए।बनारस में मेरी बहन के 1962 में विवाह का पूरा प्रबंध उनके ही द्वारा किया गया। मेरठ से इंटरमीडिएट पास करने के बाद मुझे सिविल सर्विस में देखने की इच्छा से अम्मा और पापा ने मुझे इलाहाबाद यूनिवर्सिटी भेजा। अम्मा प्रतिदिन हम लोगों को पहनने के लिए सुबह स्वयं कपड़े निकाल कर देती थीं। इलाहाबाद जाने के लिए मेरी संदूक उन्होंने लगायी।जब मैंने उनसे ऐसे ही पूछा कि मैं अगले दिन कौन से कपड़े पहनूँगा तो अम्मा की आँखों में आँसू आ गए और उन्होंने कहा कि अब ये सब तुम्हीं को करना है। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से विज्ञान की पढ़ाई छोड़ कर जब मैंने लखनऊ यूनिवर्सिटी में आर्ट्स विषयों से पढ़ाई प्रारंभ की तो इसमें अम्मा का पूरा समर्थन था। उन्हें मेरी योग्यता पर कोई संदेह नहीं था।

Flashback: आधुनिकता और परम्परा का अद्भुत मिश्रण मेरी अम्मा

IPS की सेवा में मध्य प्रदेश आने के उपरांत मैं परिवार से दूर हो गया था। मुझसे बड़े भाई लखनऊ में अम्मा और पापा के साथ रह कर वकालत प्रारंभ कर चुके थे। मेरे विवाह के पश्चात अम्मा लक्ष्मी के साथ खंडवा आयी थीं। उन्होंने छोटे से मकान को व्यवस्थित कर ठीक किया। मेरे प्रारंभिक सेवाकाल में वे इंदौर भी आयी थी। सेवानिवृत्त के बाद पापा और अम्मा दमोह , भोपाल, इंदौर और ग्वालियर में मेरे पास आकर कुछ दिन रहे थे।इंदौर का डीआईजी बंगला देख कर अम्मा बहुत प्रसन्न थीं। मैं और लक्ष्मी लखनऊ जाते रहते थे परन्तु पुलिस सेवा के कारण लंबी छुट्टी नहीं मिल पाती थी।अम्मा हमको और लक्ष्मी को यदाकदा कुछ सलाह भी दिया करती थीं। उन्होंने मेरी दो बेटियों के बाद एक लड़का होने के लिए कुछ पूजा उपासना करने की सलाह दी। मैं और लक्ष्मी दो बच्चियों से ही पूर्ण प्रसन्न थे। वैसे मैं कोई पूजा नहीं करता था। अम्मा अक्सर कहती थीं कि कम से कम स्नान करने के बाद एक अगरबत्ती भगवान के सामने जला दिया करो। मैं इसका भी पालन नहीं कर सका।

बढ़ती अवस्था के साथ अम्मा बहुत भावुक होती गईं। मेरी बहन और जीजा, सभी भाई और उनकी पत्नियां अम्मा का बहुत सम्मान करते थे। जब मैं लखनऊ उनके पास जाता था तो वो सबके सामने मेरे बचपन के क़िस्से सुनाया करती थीं, जिन्हें मैं अनेक बार सुन चुका था। 2008 में मेरे दूसरे भाई के ग्रेटर नोयडा में दुखद निधन ने अम्मा और पापा को गंभीर धक्का पहुंचाया। उसके कुछ ही दिनों बाद ग्वालियर में मेरी छोटी बच्ची कीर्तिका का विवाह था। भाई के निधन से हुई शारीरिक एवं मानसिक दुर्बलता के कारण वे आना नहीं चाहते थे। मेरे प्रबल आग्रह पर वे दुखी अवस्था में विवाह में सम्मिलित होने आये।पापा का देहावसान 2 मई, 2010 में होने के बाद अम्मा का स्वास्थ्य तेज़ी से गिरता गया। मृत्यु के पहले ही उन्होंने अपनी तेरहवीं तीसरे दिन कर देने के लिए कहा था जिससे लोगों के व्यस्त जीवन में कठिनाई न हो। जब मैं नई दिल्ली NCRB में डायरेक्टर था, उस समय 7 मई, 2011 को अम्मा की आत्मा परमात्मा में विलीन हो गयी। मैं उनकी अंत्येष्टि में लखनऊ में सम्मिलित हुआ। उनसे अत्यधिक लगाव होने के कारण उस अवसर पर मुझे बहुत कष्ट हुआ। अम्मा की अन्तिम समय की दूरदर्शिता के कारण मैं सात दिन बाद अमेरिका की शासकीय यात्रा पर रवाना हो सका।मृत्यु के बाद भी अम्मा ने मेरा ध्यान रखा।

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n k tripathi
एन. के. त्रिपाठी

एन के त्रिपाठी आई पी एस सेवा के मप्र काडर के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। उन्होंने प्रदेश मे फ़ील्ड और मुख्यालय दोनों स्थानों मे महत्वपूर्ण पदों पर सफलतापूर्वक कार्य किया। प्रदेश मे उनकी अन्तिम पदस्थापना परिवहन आयुक्त के रूप मे थी और उसके पश्चात वे प्रतिनियुक्ति पर केंद्र मे गये। वहाँ पर वे स्पेशल डीजी, सी आर पी एफ और डीजीपी, एन सी आर बी के पद पर रहे।

वर्तमान मे वे मालवांचल विश्वविद्यालय, इंदौर के कुलपति हैं। वे अभी अनेक गतिविधियों से जुड़े हुए है जिनमें खेल, साहित्यएवं एन जी ओ आदि है। पठन पाठन और देशा टन में उनकी विशेष रुचि है।