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निमाड़ी लोक में गांधीजी के प्रति अगाध श्रद्धा थी। वे राम और कृष्ण के अवतार पुरुषों के साथ ही गांधीजी को भी अवतार पुरुष मानते थे। उन्हें राम और कृष्ण जैसा ही पूज्य मानते थे। पुरुष वर्ग भी झाँझ मिरथंग पर गांधीजी के यश के गीत गाते थे। एक गीत –
गांधी नी कवोऽ रेऽ ऐखऽ आँधी कवोऽ
गोरा नऽ की बरबादी कवोऽ
गोरा नऽ नऽ घणा जुलुम कर्याऽ
लोगऽ नऽ नऽ दुःख दरदऽ सह्या
गांधी नऽ जीवऽ सबको हळको कर्यो
भारत माता खऽ छुट्टो कर्यो
तेका लेणऽ एखऽ देवता कवोऽ
गाँधी नी कवोऽ खऽ आंधी कवोऽ
भावार्थ: इस महापुरुष को गांधी मत कहो, उसको तो आँधी कहो। गोरे लोगों की, अंग्रेज लोगों की बरबादी कहो। गोरे लोगों ने भारतीय लोगों पर बहुत जु़ल्म किए। भारतवासी उन जुल्मों को सहते रहे; उन दुःखों को सहते रहे; किन्तु गांधीजी ने सबका दुःख दर्द दूर कर दिया। अपना सम्पूर्ण जीवन देश को समर्पित कर दिया। यही कारण है, कि लोग गांधीजी को देवता तुल्य समझते हैं, उनकी पूजा आरती करते हैं।
गांधीजी का विचार था स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश को स्वावलम्बी बनाने का। इसी विषयक हमारी शालायें बुनियादी शिक्षा का पूरी आस्था के साथ पालन कर रही थीं। जिस शिक्षा को आज के युग में कौशल का नाम दिया गया हैं, वही शिक्षा हमने अपनी शाला में ग्रहण की थी। हम अपनी शाला में कढ़ाई, बुनाई, सिलाई के साथ-साथ, कपड़े और मिट्टी के खिलौने, पलाश के पत्तों से दोना-पत्तल और खजूर की पत्तियों से झाड़ू-चटाई, पंखा व टोकनी बनाना सीखते थे। हमने सन से रेशे निकालकर उनसे रस्सी बनाना, उस सन के महीन रेशों से ताना-बाना बुनकर आसन और पट्टी बनाना भी सीखा था। स्कूल में बच्चों द्वारा जिन वस्तुओं का निर्माण किया जाता था, उनकी प्रदर्शनी गाँव में ही लगाई जाती थी। गाँव के गणमान्य लोगों सहित एक बड़ी संख्या में अन्य लोग भी इसे देखने आते थे। वे बच्चों द्वारा निर्मित वस्तुओं की खूब प्रशंसा भी करते थे।
हमारे बड़े गुरुजी इन वस्तुओं की बिक्री की व्यवस्था भी करते थे। वस्तुओं की बिक्री से आई हुई राशि शाला को ही दी जाती थी, ताकि उससे और कच्चा माल ख़रीदा जा सके। शेष राशि छात्र कल्याण में लगा दी जाती थी। लेकिन हम धीरे-धीरे गांधीजी के ‘करके सीखो, करके कमाओ’ वाली शिक्षा को भूलते गए। अगर गांधीजी द्वारा निर्देशित इस बुनियादी शिक्षा को हमारी शिक्षा में व्यवहार रूप में लागू करते, तो आज चीन जैसे ही हमारी भी आर्थिक स्थिति मज़बूत होती। गांधीजी की कुटीर उद्योग नीति को यदि हमने अपनाया होता, तो हमारे देश की बनी वस्तुओं का भी एक बड़ा विश्व बाज़ार होता और लोग हमारा आदर करते।
स्कूल समय से हटकर हमारे गुरुजी हमको सूत कातना सिखाते थे। छोटी कक्षा में, चैथी तक, तो तकली से सूत कातना सिखाते थे। यह काम अनिवार्य था। फिर बड़ी कक्षा में पाँचवीं से आठवीं तक के बच्चों से चरखे पर सूत कातने का अभ्यास कराया जाता था। हम लोग बड़ी कुशलता से कपास से बिनौले निकालते थे और धुनैया से धुनकर रुई को मुलायम कर लेते थे। फिर लोहे के बेलना से लकड़ी के पटे पर रुई की पूनी बनाते थे। पूनी जितनी गसी हुई होती थी, सूत का तार उतना ही बारीक निकलता था।
सूत कातकर हम लकड़ी के लपेटा-पटिये पर तकवे का सूत लपेट कर तार की लच्छी बनाते थे। पहली लट्टी स्कूल में लगी गांधीजी के फ़ोटो पर माला रूप में पहनाते थे। सूत की अगली लट्टियों को गुरुजी की कटोरी नुमा छोटी तराजू में तोलते थे। जिसकी लट्टी का वजन कम होता था, गुरुजी उसे शाबासी देते थे, प्रोत्साहित करते थे। जिस लट्टी का जितना बारीक सूत होता था, उसका उतना ही वजन कम होता था। सूत के तारों की एक निश्चित संख्या लपेटे पर लपेटी जाती थी। ऐसी चालाकी नहीं कर सकते थे, कि कम वजन की लट्टी के लिए तार कम लपेटे जाते थे। गुरुजी हर लट्टी के तार गिनते थे। सूत के साथ कर्म और ईमानदारी का पाठ भी स्कूल में बालकों को सिखाया जाता था। हमारे इस सूत की लट्टियों को इकट्ठा करके गुरुजी महीने में एक बार खण्डवा के खादी भण्डार में दे आते थे। तकली-चरखे के साथ ही सूत कातते समय हम बच्चों की दो पंक्तियाँ आमने सामने बनाई जाती थीं। बीच में दो छोरों पर दो गुरुजी बैठकर गीत गाना भी सिखाते थे। इन गीतों में तकली-चरखे का जीवन उपयोगी महत्त्व बताया जाता था। एक तकली गीत –
तकली चलाने वाले, तकली चलाते रहना
तकली चलाते चलाते, हिम्मत न हार जाना
तकली हाथों की रेखा,
तकली तकदीर का लेखा
तकली ने जीवन देखा
तकली चलाते रहना…।
तकली है पेट पालन वारी
तकली है तन ढाकन हारी
तकली विपदा हटाये सारी
तकली चलाते रहना…।
तकली के बाबा गांधी
तकली ने जीवन जीने की दी आँधी
तकली ने छुड़ाई फंादी
तकली चलाते रहना…।
भारत की आज़ादी के बाद लोगों में एक नई चेतना जाग उठी। गांधीजी के दर्शन और विचारों तथा उनके आदर्शों व समर्पण को लोगों ने अपने जीवन का मूलमंत्र बना लिया था। वे गाँव व ग्रामीण जीवन को हृदय से प्यार करते हैं। इसी भाव से उनकी आस्था उभलाती रहती थी। शालेय छात्र और ग्रामीणजन स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गांधी जयंती और गांधीजी के निर्वाण दिवस के अवसर पर संध्या समय तकली या चरखा चलाते हुए हम ग्रामीणजन गांधीजी के प्रिय भजन गाते थे। गांधीजी के प्रिय भजन –
वैष्णव जन ते तेणे कहिए
जो पीर पराई जाणे रे
पर दुख्खे उपकार करे तोये
मन अभिमान नऽ आणे रे
और दूसरा भजन-
रघुपति राघव राजा राम
सबको सन्मति दे भगवान्
ईश्वर अल्लाह तेरे नाम
सबको सन्मति दे भगवान्
ग्रामीण लोग मात्र इन भजनों को गाते ही नहीं थे अपितु, वे उन्हें गुनते भी थे, आत्ससात् भी करते थे। इन भजनों के बोलों का आशय क्या था? गांधीजी क्यों पसंद करते थे?, वे अपनी सहज बुद्धि से कहते थे, गांधीजी किसी को दुःखी नहीं देख सकते थे। वे कहते थे, गांधीजी ने अपनी ही नहीं, सबकी सन्मति की ईश्वर से याचना की है। वे कहते थे, ‘‘हे ईश्वर सबको उत्तम मति प्रदान कर। जो व्यक्ति दूसरों के दुःख में दुःखी है। वही व्यक्ति उत्तम इंसान कहलाने के लायक है।’’ स्वयं गांधीजी की उत्तम प्रकृति के कारण ही लोगों के मन में उनके प्रति बड़ी आस्था थी। उनका प्रभाव जनता पर इतना गहरा पड़ा, कि लोग खादी ही पहनते थे और स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करते थे। वह समय था, जब बिना गांधी दर्शन के, बिना गांधी विचार के, किसी भी क्षेत्र में चलना, बिना गांधी के स्वतंत्रता प्राप्ति की बात करना, न्याय संगत नहीं लगती थी। तब गांधी दर्शन और विचारों के माध्यम से वे लोगों के मध्य सदैव उपस्थित रहते थे। आज हमारे मध्य से गांधी दर्शन और गांधी विचार लुप्त होते जा रहे हैं। हम और हमारी पीढ़ी के लोगों को गांधी आज भी बहुत याद आते हैं।
देश की इस नन्ही पौध और युवा पीढ़ी को भी हमें गांधी दर्शन के प्रति जागरूक करना है। परमात्मा से प्रार्थना है कि वह इस पीढ़ी को ऐसी सन्मति दे कि वह पर्यावरण के साथ ही गांधी और हमारी स्वतंत्रता को भी याद रखे। गांधी दर्शन का सदा सर्वाधिक सामयिक महत्त्व है। आज गांधी सर्वाधिक प्रासंगिक हैं, आवश्यक हैं, अनिवार्य हैं।

डाॅ. सुमन चौरे
भोपाल – 462039
मो.: 09424440377, 09819549984