
राज-काज: दूषित जल से मौतों पर किसी ने नहीं दिखाया यह साहस….
* दिनेश निगम ‘त्यागी’
*0 दूषित जल से मौतों पर किसी ने नहीं दिखाया यह साहस….*

– सफाई के लिए देश भर में चर्चित और कई साल से लगातार स्वच्छता अवार्ड लेने वाला इंदौर दूषित जल पीने से हुई मौतों से लगा दाग कैसे धो पाएगा, यह बड़ा सवाल है। लगभग डेढ़ दर्जन मौतों, तीन सौ से ज्यादा के अस्पतालों में भर्ती हाेने और हजारों के चपेट में आने के बाद किसी को तो नैतिकता का परिचय देते हुए जवाबदारी लेने के लिए आगे आना चाहिए था। कम से कम इस्तीफे की पेशकश करने की हिम्मत तो दिखाना थी लेकिन यह साहस न मंत्री, महापौर और क्षेत्र के विधायक ने दिखाया, न ही वार्ड के पार्षद ने। महापौर पुष्यमित्र भार्गव यह कह कर जवाबदारी से पल्ला झाड़ते नजर आए कि अधिकारी उनकी सुन नहीं रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री साध्वी उमा भारती ने इसके लिए सभी को जवाबदार ठहराते हुए महापौर से कहा कि यदि अफसर आपकी नहीं सुन रहे तो आप बैठकों में बिसलेरी से पानी क्यों पीते हैं, पद क्यों नहीं छोड़ देते? इससे पहले प्रदेश के जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट ने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया था कि यह नगर निगम की जिम्मेदारी है। पानी नगर निगम पहुंचाता है, हमारा काम नहीं है। जबकि सिलावट को इंदौर में कैलाश विजयवर्गीय से भी ज्यादा सक्रिय देखा जाता है। साफ है कफ सिरप से मौतों पर जैसा हुआ था, वही हश्र दूषित पानी से हुई मौतों पर होने वाला है। कोई नेता जवाबदारी लेने तैयार नहीं। जबकि मंत्री, महापौर या विधायक में से कोई भी इस्तीफा देकर बाजी मार सकता था।
*0 बंद होना चाहिए नाश्ता, भाेजन और गिफ्ट संस्कृति….*
– बीते सप्ताह लोगों को पत्रकारिता और पत्रकारों के दो चेहरे देखने को मिले। इनमें से पहली घटना ने शर्मसार किया जबकि दूसरी ने पत्रकारों की इज्जत बचाई। पहला वाकया राजधानी का है जहां एक मंत्री की पत्रकार वार्ता में कथित पत्रकार एक बैग हासिल करने के लिए हंगामा, धक्का-मुक्की और छीना-झपटी करते नजर आए। पत्रकारिता और पत्रकारों का यह रूप देख कर कोई भी शर्मसार होगा। कुछ पत्रकार वार्ताओं में भोजन पाने के लिए भी ऐसी ही जद्दोजहद देखने को मिलती है। हालांकि इनमें उन कथित पत्रकारों की तादाद ज्यादा थी, जिनका खबरे लिखने-पढ़ने से कोई वास्ता नहीं है, लेकिन कहलाते पत्रकार हैं। दूसरी घटना इंदौर में हुई जब एक पत्रकार अनुराग द्वारी के सवाल पर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने गलत भाषा का उपयोग किया। यहां अनुराग ने जो भूमिका अदा की, इसे देख कर वे तो चर्चित हुए ही, लगभग हर पत्रकार का सीना गर्व से फूला। विजयवर्गीय को बिना देर किए अपनी भाषा के लिए खेद व्यक्त करना पड़ा। सवाल यह है कि पत्रकार वार्ताओं में होने वाली छीछालेदर से कैसे बचा जा सकता है। इसके लिए सबसे पहले नाश्ता, भोजन और गिफ्ट की संस्कृति को बंद कर देना चाहिए। ऐसा हाेने पर पत्रकार वार्ताओं में वे ही पत्रकार जाएंगे, जिन्हें लिखना पढ़ना है, जिनकी नाश्ता, भोजन औ गिफ्ट में कोई रुचि नहीं।
*0 कांग्रेस से ज्यादा भाजपा के शिकार हो गए दिग्विजय….*

– कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह प्रदेश के एक मात्र ऐसे बड़े नेता बचे थे, जिनकी कांग्रेस के प्रति निष्ठा पर कोई उंगली नहीं उठा सकता था, लेकिन भाजपा और आरएसएस की तारीफ के बाद बने हालात से वे भी संदिग्ध की श्रेणी में आ गए। भाजपा में अब उनसे भी ज्यादा कुशल रणनीतिकार हैं, यही कारण है कि दिग्विजय कांग्रेस से अधिक भाजपा के शिकार हो गए। इसीलिए जैसे ही दिग्विजय का बयान आया और कांग्रेस में उनकी आलोचना शुरू हुई, भाजपा ने मोर्चा संभालने में देर नहीं की। सबसे पहले मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने दिग्विजय को भाजपा में शामिल होने का न्यौता दे डाला। कैलाश विजयवर्गीय ने दिग्विजय की पीठ थपथपाते हुए कह दिया कि उन्होंने सरदार पटेल की तरह कांग्रेस में रह कर सच बोलने की हिम्मत दिखाई है। प्रदेश के उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा ने कहा कि दिग्विजय यदि भाजपा में आते हैं तो हम उनका स्वागत करेंगे। इन बयानों के बाद दिग्विजय को कांग्रेस में शंका की दृष्टि से देखा जाने लगा। कमलनाथ पहले ही भाजपा की ऐसी रणनीति के शिकार हो चुके हैं। लोकसभा चुनाव से पहले उनके भाजपा में जाने की चर्चा ने जोर पकड़ा था। भाजपा ने उन्हें लिया तो नहीं लेकिन कांग्रेस में उनकी निष्ठा संदिग्ध हो गई। नतीजा, कांग्रेस ने उन्हें अब तक कोई दायित्व नहीं सौंपा। जबकि वे कई बार सोनिया गांधी और राहुल गांधी से मुलाकात कर चुके हैं।
*0 कांग्रेस से आए नेता का शिकार हो गए एक और विधायक….*

– कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में आए गोविंद सिंह राजपूत की जैसी तकरार पूर्व मंत्री भूपेंद्र सिंह के साथ शुरू हुई थी, ऐसे ही हालात श्याेपुर में राम निवास रावत और विधायक सीतारात आदिवासी के बीच बनने लगे हैं। सीताराम ने आरोप लगाया है कि उन्हें बैठकों में नहीं बुलाया जाता। कांग्रेस से आए राम निवास कलेक्टर के बगल में बैठते हैं और मुख्यमंत्री भी उन्हें ही तवज्जो देते हैं। रावत लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में आए थे। प्रदेश सरकार में उन्हें वन मंत्री बनाया गया लेकिन विधानसभा के उप चुनाव में वे हार गए थे। सीताराम का कहना है कि विधायक मैं हूं और मंत्री का दर्जा भी मेरे पास है लेकिन चल रावत की रही है। सीताराम चूंकि आदिवासी हैं, इसलिए इस विवाद की गूंज भोपाल से लेकर दिल्ली तक पहुंची। उन्होंने कहा कि भाजपा को लोकसभा चुनाव रावत ने नहीं, मेरे क्षेत्र के आदिवासियों ने जिताया है। विजयपुर, जौरा और बमोरी जैसी 10-15 विधानसभा सीटें आदिवासी वोटों से ही तय होती हैं। जब मेरा टिकट काटा गया था तो समाज नाराज हो गया था और भाजपा सभी सीटें हार गई थी। सीताराम का आरोप है कि रामनिवास की वजह से पूरे क्षेत्र का माहौल खराब हो रहा है। संकेत साफ हैं कि यदि भाजपा नेतृत्व ने इस ओर जल्दी ध्यान न दिया तो चंबल अंचल में यह विवाद बड़ा रूप ले सकता है।
* केबीसी में नागदा पर बोल कर फंस गए महानायक….*
– सोनी टीवी में चलने वाले ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के सफल शो के एक एपीसोड में मप्र के नागदा को लेकर जो जानकारी महानायक अमिताभ बच्चन के जरिए परोसी गई, वह सच नहीं थी। इसके कारण महानायक ट्रोल हो गए। क्षेत्र के लोगों ने कहा कि बिना सच जाने वे ऐसा कैसे बोल सकते हैं? कार्यक्रम में बताया गया कि मप्र के मालवा क्षेत्र में एक छोटा-सा गांव नागदा है। यह गांव पानी की किल्लत से जूझ रहा था। इसे दूर करने चंबल नदी पर आदित्य बिड़ला ग्रुप के ग्रेसिम ने बांध, नए आरओ सिस्टम बनाए। अब 5 हजार हेक्टेयर क्षेत्र के खेतों में सिंचाई हो रही है। यह भी बताया गया कि ग्रेसिम ने जनसेवा ट्रस्ट का हॉस्पिटल बनाया, जिसमें एक लाख 4 हजार मरीजों को प्रतिवर्ष उपचार हो रहा है। जबकि हकीकत यह है कि नागदा एक छोटा गांव नहीं है। इसकी आबादी लगभग एक लाख 30 हजार है। यहां लोगों को कभी पानी की किल्लत से नहीं जूझना पड़ा। बिड़ला कंपनी ने बांध किसानों की सिंचाई के लिए नहीं, बल्कि स्वयं का उद्योग चलाने के लिए बनाए हैं। जहां तक ग्रेसिम जनसेवा चिकित्सालय का सवाल है तो यहां आम लोगों का इलाज पैसे लेकर होता है। यहां उद्योगों के अधिकारियों का इलाज प्राथमिकता पर होता है जबकि जनता कतार में खड़ी रहती है। इस तरह गलत और भ्रामक जानकारी देने के लिए महानायक की आलोचना की जा रही है।
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