
इंदौर में दूषित जल से मौतों पर हाईकोर्ट सख्त: ‘असंवेदनशील’ रवैये पर राज्य सरकार को फटकार, 15 जनवरी को मुख्य सचिव तलब
के के झा की रिपोर्ट
इंदौर/जबलपुर। इंदौर में दूषित पेयजल आपूर्ति से हुई मौतों और सैकड़ों लोगों के बीमार पड़ने की गंभीर घटनाओं पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की कथित “असंवेदनशील और सतही” प्रतिक्रिया पर कड़ी नाराज़गी जताई है।
अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्य सचिव को 15 जनवरी को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के आदेश दिए हैं।
मुख्य न्यायाधीश विजय कुमार शुक्ला एवं न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ इंदौर के भागीरथपुरा और आसपास के क्षेत्रों में संदिग्ध रूप से दूषित जल के सेवन से कई लोगों की मौत और बड़े पैमाने पर बीमारी फैलने को लेकर दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
*स्टेटस रिपोर्ट पर असंतोष, पीड़ितों की पीड़ा की अनदेखी का आरोप*
सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार और प्रशासन द्वारा प्रस्तुत स्टेटस रिपोर्ट को अधूरी, अस्पष्ट और पीड़ितों की पीड़ा के प्रति असंवेदनशील बताते हुए उस पर कड़ी आपत्ति दर्ज की। खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि रिपोर्ट में न तो मौतों का सही आंकड़ा सामने आया है और न ही यह बताया गया है कि प्रभावित परिवारों को अब तक क्या राहत या मुआवज़ा दिया गया है।
*स्वच्छता रैंकिंग बनाम जमीनी हकीकत*
अदालत ने यह टिप्पणी भी की कि लगातार स्वच्छता रैंकिंग में देश में अव्वल रहने वाले इंदौर में इस तरह की जल जनित त्रासदी न केवल शासन और नगर प्रशासन की गंभीर विफलता को उजागर करती है, बल्कि शहर की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय साख पर भी सीधा आघात करती है।
*मौतों के आंकड़ों पर सवाल, आपराधिक जवाबदेही के संकेत*
हाईकोर्ट ने इस बात पर भी गंभीर चिंता जताई कि सरकारी रिकॉर्ड में मृतकों की संख्या अपेक्षाकृत कम दिखाई जा रही है, जबकि स्थानीय स्तर पर कहीं अधिक मौतों के दावे सामने आ रहे हैं। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए कि मामले में केवल प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित न रहकर जिम्मेदार अधिकारियों की आपराधिक जवाबदेही की भी जांच की जा सकती है।
*स्पष्ट जवाब और ठोस कार्ययोजना की मांग*
खंडपीठ ने राज्य सरकार से अगली सुनवाई तक यह स्पष्ट करने को कहा है कि— दूषित जल से हुई मौतों और बीमारियों का वास्तविक आंकड़ा क्या है पीड़ित परिवारों को दी गई राहत और मुआवज़े की स्थिति क्या है
भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कौन-सी ठोस और समयबद्ध कार्ययोजना बनाई गई है अदालत ने संकेत दिया कि इस मामले को महज “दुर्घटना” मानकर नहीं टाला जा सकता और जनस्वास्थ्य से जुड़े ऐसे गंभीर मामलों में जवाबदेही तय करना अनिवार्य है।




