यादों में ठहरी घटनाएं: hockey में हार का दुख और क्रिकेट में जीत की खुशी!

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यादों में ठहरी घटनाएं: hockey

मेरी स्मृतियों में दर्ज वो एक अविस्मरणीय दिन था।पहली दिसम्बर 1982 को हॉकी (hockey) के चिर-प्रतिद्वंदी भारत पाकिस्तान के बीच 1982 के एशियाई खेलों में हॉकी का फाइनल मुकाबला था। वो मेरी ज़िंदगी में देखा गया हॉकी का ऐसा मुक़ाबला था, जिसने इस देश में हॉकी की दशा और दिशा बदलकर रख दी। उस समय भारत में हॉकी न सिर्फ़ राष्ट्रीय खेल था, वरन सबसे लोकप्रिय भी।
हॉकी (hockey) गली-मोहल्लों में खेली जाती थी और ख़ासकर भोपाल तो हॉकी (hockey )की नर्सरी ही कही जाती थी। इनामुर्रहमान जैसे ओलम्पियन भी भोपाल से खेल चुके थे। पर, उस दिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
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दोपहर की गुनगुनी धूप में हरी एस्ट्रोटर्फ पर खेले गए उस मुकाबले ने मेरा दिल तोड़कर रख दिया था। 1-7 अविश्वसनीय है पर सच है भारत एक के मुकाबले 7 गोल से हारा था। ज़फ़र इक़बाल, मोहम्मद शाहिद और रविंदर पाल सिंह जैसे बड़े सितारों से सजी भारतीय हॉकी टीम पाकिस्तान के सेंटर फॉरवर्ड हसन सरदार, कलीमुल्ला और समीउल्ला की तिकड़ी के आगे जैसे नतमस्तक हो गई।
आज भी मुझे यही लगता है कि हार किसी से भी हो जाए, पर पाकिस्तान से न हो और यहाँ तो ऐसी हार हुई थी कि वो दास्ताँ आजतक न मै भुला हूँ न मेरे दोस्त भूले होंगे। मीररंजन नेगी भारत के गोलकीपर थे और वो भी उस दिन गोल की आंधी रोक नहीं सके।
बाद में नेगी के किरदार पर ‘चक दे इंडिया’ फिल्म भी बनी, जो एक असली कहानी पर आधारित थी। उस टीम के हीरो मुहम्मद शाहिद अब हमारे बीच नहीं हैं, पर उस दिन की टीस दिल में आज भी ताज़ा है! रेतघड़ी की रफ़्तार के आगे ऐसी कई यादें धूमिल हो गई!
अब बात हो जाए एक जीत की। 25 जून 1983 का वो दिन, जब क्रिकेट के मक्का कहे जाने वाले लंदन के लॉर्ड्स के मैदान पर गोरों के खेल में फाइनल मैच में भारत की विश्व विजय हुई। जब क्रिकेट का तीसरा वर्ल्ड कप शुरू हुआ, तो भारत की टीम किसी गिनती में ही नहीं थी। मैच धीरे-धीरे शुरू हुए, क्योंकि उस समय एक मैच 60 ओवर का होता था। भारत किसी तरह सेमीफाइनल में पहुँचा।
कारण कि कप्तान कपिल देव ने जिम्बाब्वे को अकेले दम पर 175 रन बनाकर हरा दिया था। वरना हम तो उसी दिन खेल से बाहर हो जाते। सुनील गावस्कर और के श्रीकांत दोनों उस दिन शून्य पर आउट हुए थे। फिर भारत ने इंग्लैंड को सेमीफाइनल में हराया और फिर आया फ़ाइनल का दिन।
वो एक डार्क हॉर्स का एक डिफेंडिंग चैंपियन के साथ हुआ ऐसा मुक़ाबला था, जो अविस्मरणीय है। भारत ने 183 रन बनाए थे और ग्रीनिज, रिचर्ड्ज़, लॉयड जैसे सितारों से सजी टीम 140 रन बनाकर आउट हो गई। कपिल देव ने किंग रिचर्ड्ज़ का वो कैच पकड़ा था, उसे आज भी देखो तो रूह काँप जाती है।
अगर … वो कैच छूट जाता तो रिचर्ड्ज़ मैच को अगले 10 ओवर में निपटा देता। यशपाल शर्मा जो हमारी विश्वविजयी टीम के सदस्य थे, आज वे नेपथ्य में जा चुके हैं। उस समय का रफ़्तार का खौफनाक जादूगर मैल्कम मार्शल आज काल के पन्नों में गुम गया, पर उसकी गेंदबाजी का ख़ौफ़ वही जान सकता है जिसने उसे देखा हो।
रेतघड़ी अपनी रफ़्तार अपनी गति से जारी है। 1984 में अमेरिका के एथलेटिक जगत में जो तहलका हुआ, वो सारी दुनिया ने देखा। 1936 के बर्लिन ओलंपिक में ‘जेसी ओवेंस’ के बाद फिर कोई खिलाड़ी पैदा हुआ था जिसने एक ओलंपिक खेल में 4 स्वर्ण पदक एथलेटिक्स में जीते हों। मेरी उमर के सारे लोग, मेरी पूरी पीढ़ी ‘कार्ल लेविस’ को कभी नहीं भूल पाएगी।
1984 से लेकर 1996 के 12 सालों में एथलेटिक्स में कार्ल की बादशाहत कायम थी। 100 मीटर, 200 मीटर, 4 गुणा 100 रिले रेस और लम्बी कूद इन चारों विधाओं में स्वर्ण पदक जीतना और उसे रिपीट करना, आसान नहीं! कुल 9 स्वर्ण पदक जीतने वाले कार्ल लेविस मेरे मस्तिष्क पटल पर हमेशा अमर रहेगा।
1986 का सॉकर यानी फुटबॉल मुक़ाबला भी कभी न भूलने वाली याद है। ये वो खेल है, जिसमें भारत का नम्बर विश्व में 150 देशों से भी पीछे था। दुनिया के ऐसे छोटे-छोटे देश जिनकी जनसंख्या भारत के छोटे कस्बों जितनी है, वो भी हमसे आगे थे। पर इस खेल की जितनी तारीफ की जाए वो कम है। पूरा देश जैसे इसने बांध के रख दिया था। उसका नाम था डियेगो मेराडोना। वो जादूगर था इस खेल का।
‘पेले’ द ब्लैक पर्ल के बाद अगर इस खेल ने कोई सितारा देखा था तो वो मेराडोना ही था। उस समय अख़बारों में छपता था कि मेराडोना के पैरों का 50 लाख रुपए का बीमा है। 1986 में 50 लाख रुपए बहुत बड़ी रक़म होती थी।
मैं अपनी पीढ़ी को खुशनसीब मानता हूँ जिसने मेराडोना को खेलते देखा और ‘हैंड ऑफ़ गॉड’ गोल करते देखा। फिर भी, इंग्लिश टीम के विरुद्ध सेमीफाइनल में 6-7 खिलाड़ियों को छकाते हुए मैराडोना ने जो गोल किया था, मै कभी भी नहीं भूल सकूँगा। वो वर्ल्डकप सिर्फ़ मेराडोना और अर्जेंटीना का था। आज मेराडोना भी काल के पन्नों पर नेपथ्य में जा चुका हैं, पर मेराडोना हमारी पूरी पीढ़ी के हीरो थे और हमारे हीरो रहेंगे भी।
रेतघड़ी की रफ़्तार जारी है और यादों का सिलसिला भी। अब बात करते हैं नज़ाकत की, शहद की, शहंशाह ऐ ग़ज़ल मेहंदी हसन की। अगर वाकई में किसी गायक की आवाज को शहद कहा जाए तो वो मेहंदी हसन ही हो सकते हैं।
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दिलफ़रेब शायर अहमद फ़राज़ की ग़ज़ल ‘रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ..’ को करोड़ों ग़ज़ल प्रेमियों तक पहुँचाने वाले अमर ग़ज़ल गायक मेहदी हसन भी नेपथ्य में जा चूके हैं। पर, वे कभी यादों से बेदखल नहीं हो सकते। यह सब मैं यह बताने के लिए नहीं लिख रहा, कि ये दुनिया मृत्युलोक है। वरन इसलिए कि समय का पहिया चलता जाता है और हमारे पास रह जाती हैं सिर्फ यादें!

यादें .. यादें बस यादें ही तो हैं जो हमारे बीते कल को आज से जोड़कर रखती हैं।

पिक्चर अभी बाक़ी है दोस्तों!