युद्ध पुनः शुरू हुआ तो आतंकवाद की कमर टूटेगी!

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युद्ध पुनः शुरू हुआ तो आतंकवाद की कमर टूटेगी!

डॉ. सुशीम पगारे

अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान में हुई सन्धि वार्ता बेनतीजा रहने से खाड़ी देशों में युद्ध पुनः प्रारम्भ होने की स्थिति बन गई है।युद्ध सदैव से मानवता के लिए अभिशाप रहा है किंतु किसी भी युद्ध के कुछ ऐसे अप्रत्यक्ष पहलू होते हैं जो मानवता को बचाने के का काम भी आ सकते हैं। इस्राइल-अमेरिका-ईरान के संघर्ष के एक महत्वपूर्ण पहलू पर लोगों का ध्यान कम ही गया है।वह है ‘आतंकवाद’। जब से यह जंग शुरू हुई है तब से इस्लामिक आतंकवादियों और उनके संगठनों को रोजी-रोटी के लाले पड़ गए हैं।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मानवता को किसी एक चीज ने सबसे ज्यादा परेशान किया है तो वह इस्लामिक आतंकवाद है।गत लगभग 60 वर्षों से ये समस्या क्रूर से क्रूरतम होती चली गई है।

इस्लामिक आतंकवाद के आज के स्वरूप को समझना है तो इतिहास में जाना पड़ेगा।सऊदी अरब जो इस्लाम की पवित्र भूमि भी है में अठारहवीं सदी में दिरीया के शासक मोहम्मद-बिन-सऊद और कट्टर धार्मिक विचारक मोहम्मद-इब्न -अल-अद-वहाब के बीच समझौता हुआ जो सऊदी राज्य की नींव बना।राजनीतिक सत्ता सऊद के हाथ आई जो आज भी उनके वंशजों के पास है और धार्मिक सत्ता वहाबवाद के हाथ आई जो इस्लाम की कट्टरता में विश्वास करता है।यह सुन्नी इस्लाम की बेहद कठोर उप शाखा है जो वहाबी आंदोलन के रूप में भी जानी जाती है।इसका उद्देश्य इस्लाम से अंधविश्वास खत्म कर इस्लाम के मूल सिद्धांतों (सलाफीवाद)की स्थापना करना है। मक्का-मदीना में वहाबियों के हाथ ही अठाहरवीं सदी के मध्य से लेकर आज तक धार्मिक वर्चस्व है।

पश्चिमी देशों से महत्वपूर्ण राजनयिक और व्यापारिक सम्बन्ध होने के बावजूद सऊदी अरब विश्वभर में कट्टर वहाबी विचारधारा को प्रचारित करने के लिए अरबों डॉलर खर्च करता है।यही वहाबी विचारधारा अनेक आतंकवादियों का क ,ख, ग है,यानी आधार है। 2013 में यूरोपियन पार्लियामेंट ने अपनी रिपोर्ट में खुले आम कहा था की सऊदी अरब का वहाबी आंदोलन वैश्विक आतंकवाद की जड़ है।

सऊदी सरकार की आर्थिक सहायता (लगभग 1000 करोड़ डॉलर प्रतिवर्ष)से जो मस्जिद और मदरसे बनते हैं वहां मौलवी, वहाबी विचारधारा को आगे बढाने के लिए खुलेआम आतंकवादी गतिविधियों का सहारा लेने की बात कहते हैं।अमेरिका में 11 सितम्बर 2001 को हुए आतंकी हमले में 19 में से 15 हाई जेकर्स सऊदी अरब के थे।इस हमले का मास्टर माइंड और विश्व का सबसे खूंखार आतंकवादी ओसामा -बिन-लादेन सऊदी नागरिक था।सुन्नी टेररिस्ट की अधिकांश फंडिंग सऊदी अरब से होती है। आज युद्ध के कारण खुद के भारी आर्थिक नुकसान के चलते ये आर्थिक मदद बन्द सी हो गई है।

क़तर की बात करें जो इस युद्ध में ईरान से हमले झेल रहा है से भी इस्लामी आतंकवादी संगठनों को खूब आर्थिक मदद मिलती रही है।जिस हमास को इस्रायल ने ठिकाने लगाया है ने ग़जा पट्टी में अपने आतंकवादियों को छुपाने के लिए जितनी भी सुरंगें बनाई थी वे 2007 के बाद क़तर की आर्थिक सहायता से बनी थीं।मुस्लिम ब्रदरहुड की मदद भी क़तर खूब करता आया है जिसे मिस्र,रूस और अमेरिका आतंकवादी संगठन मानते हैं। इराक और सीरिया के आतंकियों को भी क़तर द्वारा पर्याप्त फंडिंग की जाती रही है।आतंकवादियों को आपने यहां शरण देना और उनके बचाव में मध्यस्थ की भूमिका में रहना क़तर को खूब आता है।आज युद्ध से भारी नुकसान और प्राकृतिक गैस निर्यात बन्द होने परेशान क़तर ने टेरर फंडिंग से हाथ खींच लिए हैं।

संयुक्त अरब अमीरात के भी यही हाल हैं।ईरानी हमलों ने उसके यहां निवेश पर रोक लगा दी है वहीं विश्वभर से जिन निवेशकों ने वहां पैसा लगा रखा था उन्होंने हाथ खींचना शरू कर दिए हैं। यह यू.ए.ई. ही है जहां से तालिबान और हक्कानी नेटवर्क को खूब टेरर फंडिंग हुई है। 9/11के अमेरिका में हुए आतंकी हमले में 19 में से 17 आतंकी यहीं से अमेरिका पहुंचे थे।उनको वित्तीय मदद भी यहीं के बैंकिंग सिस्टम से हुई थी।2008 में भारत के मुंबई में हुए आतंकी हमले में भी लश्कर-ए -तोइबा को वित्तीय सहायता सन्युक्त अरब अमीरात से हुई थी।भारत का मोस्ट वांटेड आतंकी दाऊद इब्राहिम कई वर्षों तक दुबई में रहा।इस अरब देश को 2022 में आतंकी फंडिंग के खिलाफ कार्य करने वाली संस्था एफएटीएफ ने अपनी ग्रे सूची में डाल दिया था।यही यू ए ई आज स्वयं अपने आर्थिक साम्राज्य को डगमगाते देख रहा है और पिछले डेढ़ महीने से सूडान के आतंकियों और यमन में हुतियों के विरुद्ध लड़ने के लिए आतंकी संगठन अल कायदा को मदद नहीं कर पा रहा।

युद्ध रत ईरान तो खुले आम हिजबुल्ला,यमन के हूती और हमास जैसे आतंकी संगठनों को अपने सरकारी बजट में बकायदा प्रावधान कर आर्थिक और सैन्य सहायता प्रदान करता रहा है।उसकी भी इस युद्ध ने आर्थिक हालात कंगाली जैसे कर दिए हैं और वह अपने द्वारा पोषित किसी भी आतंकी संगठन को मदद करने की स्थिति में नहीं है।इसके अलावा जो बड़े-बड़े अरब शेख मानवीय सहायता की आड़ में भी टेरर फंडिंग करते थे,वे युद्ध के कारण अपने प्रायवेट जेट विमानों में देश छोड़ कर यूरोप और अमेरिका के सुरक्षित ठिकानों में पनाह ले चुके हैं।

अब पड़ोसी पाकिस्तान जो आतंक की फैक्ट्री है, कि भी बात कर लें। इस युद्ध,भारत से पिछले साल भिड़ने और अफगानिस्तान से चल रहे युद्ध ने उसकी भी आर्थिक तौर पर कमर तोड़ डाली है।लश्कर-ए-तोइबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों ने पाकिस्तान सरकार को साफ कह दिया है कि हमें फंड जारी करो नहीं तो हम भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियां नहीं जारी रख पाएंगे।

अतः यदि इस्रायल-अमेरिका और ईरान युद्ध फिर भड़का तो मान कर चलिए खाड़ी के देशों की आर्थिक सहायता से चलने वाले आतंकी संगठनों की दुकानों पर ताले लग जाएंगे।

(लेखक इतिहास के प्रोफेसर हो कर सम- सामयिक मामलों के जानकार हैं।)