In Loving Memory: माँ चली गयी… पर क्या सचमुच चली गयी?

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स्मृति शेष

In Loving Memory: माँ चली गयी… पर क्या सचमुच चली गयी?

नितिन वैद्य 
माँ चली गयी…78 वर्षों तक हमारे बीच रहकर,और अब स्मृतियों में नहीं संस्कारों में बसकर।कुछ विशेष बातें कहना चाहता हूँ माँ के बारे में,क्योंकि कुछ जीवन केवल जीये नहीं जाते,वे पूजे जाते हैं।
क्या सच में कान्हा दूध पीते थे माँ के हाथों से?वर्षों से देखा—माँ प्रतिदिन प्रातः ठीक 6:30 बजे जाग जाती थी।जैसे संसार नहीं,भगवान उनकी प्रतीक्षा कर रहे हों।7:30 से 8:00 के मध्यवह पूजा में बैठतीlऔर लगभग 11 बजे तक माँ पूजा  करती थी।मुझे कई बार लगा वह पूजा नहीं थी,माँ और ईश्वर का संवाद था।
सबसे पहले पूर्णिमा को पानी गरम करने का निर्देश,और फिर अपने सबसे प्रिय लड्डू गोपाल को स्नान करवाती थी,नन्हे हाथों की कल्पना से उनके चरणों पर जल डालती माँ जैसे स्वयं यशोदा उतर आयी हो।स्नान के पश्चात श्रृंगार, वस्त्र,और फिर वह क्षण जो आज भी आँखों को भिगो देता है।एक छोटे से पीतल के ग्लास में मिश्री घुला दूध,और माँ उसे कान्हा के होठों से लगाकर पिलातीऔर कभी कभी वह बोलती थी,
“ए कान्हा…
तूने फिर दूध गिरा दिया न!
ढंग से दूध पी।”
मैं पीछे बैठा ,गीता जी पढ़ता—
पर मन वहाँ नहीं,माँ की उस बात में अटका जाताऔर मन पूछता—
क्या सच में कान्हा दूध पी रहे हैं?
आज समझ आता है,हाँ…जब श्रद्धा इतनी निष्कलंक हो,
तो भगवान कल्पना नहीं रहते,
वे अतिथि बन जाते हैं।
माँ के देवलोकगमन के पश्चातपगड़ी रस्म हुई।उस दिन भी माँ के प्रिय लड्डू गोपाल विराजे।पर अगले ही दिन से वे घर में नहीं मिल रहे हैं।पूजा स्थल पर,सिंहासन खाली था,और उस खालीपन में,माँ की उपस्थिति सबसे अधिक थी।मानो,कान्हा कह रहे हों—“जिसने मुझे बुलाया था,मैं उसी के साथ चला गया।”अब नए लड्डू गोपाल लाया हूँ।प्राण-प्रतिष्ठा शेष है,पर मन जानता है,प्राण तो माँ ने वर्षों पहले ही दे दिए थे।

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श्रावण, कार्तिक… और माँ की सीख ,श्रावण मास में चाँदी के झूले पर कान्हा को झुलाना,यह कोई परंपरा नहीं थी,यह माँ का प्रेम था।मुझे दफ्तर जाते समय याद दिलाती,“कान्हा को झूला दिए बिनाघर से बाहर मत जाना।”
कार्तिक मास में सायं घी का दीपक,और हम सबको सख्त निर्देश,“यह क्रम मत तोड़ना।”क्योंकि माँ जानती थी,दीपक केवल भगवान को नहीं,पीढ़ियों को भी उजाला देता है।

जानिए कार्तिक माह में क्यों जलाते हैं दीपक, क्या है इसका महत्व
अब प्रश्न… जो हृदय को चीर देता है,यह सब लिखते हुए,आँखें नम हैं,और मन एक प्रश्न पर ठहर गया हैlक्या वह श्रद्धा और समर्पण,मैं या आप प्राप्त कर सकते हैं?क्या हमारे बच्चे,भगवान के प्रतिउस निष्कपट विश्वासऔर पवित्रता को पासकेंगे?
और जब हम न रहें,तो क्या वे भी कुछ ऐसा लिखेंगे जो अगली पीढ़ी को ईश्वर से जोड़ सके?
माँ चली गयी,पर उनकी पूजा अभी भी चल रही है।अब हाथ हमारे हैं,पर दीपक उसी श्रद्धा से जले यही चाहता हूँ ।
बहुत भावुकता के साथ अपनी बात को विराम देता हूँ।

श्री कृष्ण शरणम् मम

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