स्मृति शेष•••  स्वर्गीय मोतीलाल जी सालेचा (जैन)

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स्मृति शेष•••  स्वर्गीय मोतीलाल जी सालेचा (जैन)

Ranapur-Jhabua: स्वर्गीय मोतीलाल जी सालेचा का जन्म 19 नवंबर 1942 को एक ऐसे घर में हुआ, जहां राष्ट्रभक्ति कोई औपचारिक नारा नहीं, बल्कि सांसों में घुला हुआ संस्कार थी। उनके पिता स्वर्गीय मानक लाल जी सालेचा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। गुलाम भारत की पीड़ा, संघर्ष और स्वाभिमान की कथाएं उन्होंने बचपन में ही सुनीं और वही कथाएं आगे चलकर उनके जीवन का पथ बन गईं। 23 जनवरी 2026 को उनका देहावसान हुआ, किंतु उनका वैचारिक तेज, उनका संघर्षशील जीवन और उनकी निर्भीक चेतना जनजातीय अंचल की स्मृतियों में सदैव जीवित रहेगी।

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मोतीलाल जी की रग-रग में राष्ट्रभाव आनुवांशिक रूप से प्रवाहित था। बचपन से ही उनमें तीक्ष्ण बुद्धि, समाज के प्रति गहरी संवेदनशीलता और देश के लिए कुछ कर गुजरने की ललक स्पष्ट दिखाई देती थी। महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर वे अहिंसा और शांति के पथ के अनन्य साधक बने। खादी का कुर्ता-पजामा उनका केवल पहनावा नहीं था, बल्कि उनका जीवन-दर्शन, उनका मौन संकल्प और उनकी पहचान था।

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लेखन में उनकी रुचि बचपन से ही थी और पत्रकारिता उनके लिए कभी महज पेशा नहीं रही, बल्कि जीवन का जुनून बनी। शैक्षणिक जीवन के दौरान वे शासकीय सेवा में शिक्षक बने, लेकिन बंधनों में बंधकर रहने की प्रवृत्ति उनके स्वभाव में नहीं थी। सच को सच और गलत को गलत कहने का साहस उनकी आत्मा में रचा-बसा था। यही कारण रहा कि मात्र एक वर्ष में ही उन्होंने सरकारी नौकरी का त्याग कर दिया और अपना संपूर्ण जीवन समाज तथा पत्रकारिता को समर्पित कर दिया।

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इंदौर से प्रकाशित होने वाले पहले साप्ताहिक अखबार इंदौर समाचार के प्रकाशक सुरेश सेठ से उनकी गहरी आत्मीय मित्रता रही। उसी अखबार के माध्यम से उन्होंने जनजातीय बहुल झाबुआ जिले में पत्रकारिता की मजबूत नींव रखी। मामा बालेश्वर दयाल की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए वे जीवन भर आदिवासी समाज के अधिकार, अस्मिता और पीड़ा की निर्भीक आवाज बने रहे।

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वर्ष 1990 में उन्होंने साप्ताहिक गंभीर वाणी समाचार पत्र का संचालन प्रारंभ किया। भारत शासन से पंजीकृत इस अखबार के माध्यम से उन्होंने झाबुआ के साथ-साथ धार, रतलाम, दाहोद, बांसवाड़ा जैसे क्षेत्रों में युवा पत्रकारों की पूरी एक पीढ़ी को गढ़ा। गंभीर वाणी केवल एक समाचार पत्र नहीं, बल्कि पूरे जनजातीय अंचल की समस्याओं, सवालों और संघर्षों का मुखर मंच बन गया।

1970 से 2000 तक वे निरंतर सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता और निर्भीक पत्रकार के रूप में कार्यरत रहे। अलीराजपुर के चर्चित कवठू कांड में उनकी रिपोर्टिंग ने देशभर का ध्यान इस अंचल की सच्चाई, पीड़ा और उपेक्षा की ओर खींचा। लेम्ब्रेटा स्कूटर पर सवार होकर उन्होंने पहाड़, जंगल और दुर्गम रास्तों को नापा और हर उस स्थान तक पहुंचे, जहां पीड़ा थी और जहां आवाज की आवश्यकता थी।

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चौथा संसार अखबार से वे शुरुआती दौर से लेकर जीवन के अंतिम समय तक प्रमुख संवाददाता के रूप में जुड़े रहे। रेड क्रॉस सोसाइटी से उनका आजीवन जुड़ाव रहा। इसके साथ ही अनेक सामाजिक और पत्रकार संगठनों में उन्होंने सक्रिय, मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत की भूमिका निभाई।

स्वर्गीय मोतीलाल जी सालेचा ऐसे पत्रकार थे जिनके लिए खबर सत्ता के दरबार की शोभा नहीं, बल्कि अंतिम पंक्ति में खड़े उस व्यक्ति की आवाज थी, जिसे अक्सर अनसुना कर दिया जाता है। आज जब देश और समाज कई तरह के संक्रमणकाल से गुजर रहा है, उनका जीवन हमें बार-बार यह याद दिलाता है कि पत्रकारिता का मूल धर्म साहस, सत्य और सेवा है।

उनका जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि जनजातीय अंचल की एक सजग, संवेदनशील और निर्भीक चेतना का मौन हो जाना है।
विनम्र श्रद्धांजलि।🙏
(राजेश जयंत)