69.In Memory of My Father: Late Babulal Kashiv ‘चायबाबू’ जिन्होंने धार में 40 वर्षों तक लोगों को चाय की चुस्कियों से स्फूर्त किया !

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मेरे मन/मेरी स्मृतियों में मेरे पिता

पिता को लेकर mediawala.in में शुरू की हैं शृंखला-मेरे मन/मेरी स्मृतियों में मेरे पिता। इस श्रृंखला की 69th  किस्त में आज हम प्रस्तुत कर रहे है ,रायपुर के वरिष्ठ पत्रकार डॉ.विनोद काशिव का संस्मरण । याद है मुझे भी धार की सड़कों पर ब्रुक बॉन्ड चाय की वह लाल गाडी जिसके आगे आगे चलते थे ‘चाय बाबू’ , यह स्नेहपूर्ण उपनाम उन्हें उनके रोजगार और चाय के साथ लोगों से सामाजिक रिश्तों की मिठास घोलने  के चलते धार के लोगों ने दे दिया था . वे मेरे  पिताजी के भी अच्छे मित्र थे .विनोद अपने  पिता के साथ लोगों द्वारा दिए गए इस उपनाम और चाय के बहाने लोगों में स्नेहिल सम्बन्धों याद करते हुए अपने पिता और उस समय के समाज की सहजता ,सरलता और समरसता को भी याद करते हुए अपनी भावांजलि दे रहे है. –  स्वाति 

किसी शायर ने कहा है कि-

जो वक़्त के साथ बदल जाए, वो राय होती  है.

 जब ज़िंदगी में कुछ नहीं होता, तब बस चाय होती है ।

69.In Memory of My Father: Late Babulal Kashiv ‘चायबाबू’ जिन्होंने धार में 40 वर्षों तक लोगों को चाय की चुस्कियों से स्फूर्त किया !

शाम की चाय उन के साथ पियूँ
दिल की हसरत बहुत पुरानी है.

अब जब मेरे पास फुर्सत है , बाबूजी के साथ बैठ कर चाय पीने के लिए तो चाय तो है पर चाय बाबू नहीं है अब .और यह मैं ही नहीं कह रहा उनके चाहने वाले भी कहते है चाय का आनंद तो उस जमाने में आता था जब विदेशी चाय हमारे देसी चायवाले बाबूजी से लेते थे .यादें बहुत गहराई से निकल कर आती हैं जब हम अपने पिता को याद करते है .उन पिता को जो संपूर्ण मालवा के  सामाजिक जगत की काल जई विभूति के रूप में जाने जाते हैं और रहेंगे ।मेरी यादों के पुण्य स्मरण में याद आता है कि बताते थे कि वे 16 फरवरी 1916 में हरदा जिले के ग्राम सामर्धा में जन्मे थे.वे उस समय के समाज के स्तंभ माने जाते थे क्योंकि उनमें लोगो को जोड़ने और लोगों से जुड़ने कीअप्रतिमकला थी,और इसीलिए वे विदेशी  चाय को लोगों के बीच चुस्कियों में बदलते चले गए और चाय के साथ साथ चाय बाबू भी लोकप्रिय हो गए ।

दुनिया में सैकड़ों लोग आए और गए पर जो भी उनसे मिला वे आज तक उस व्यक्ति के मानस पटल पर अंकित है क्योंकि उनका सहज ,सरलपन और  स्वभाव की मिठास ,उनकी स्मित मुस्कान उन्हें यादगार व्यक्तित्व बना चुकी थी.चाय बाबू कहते ही वे बरबस सबको  याद आ जाते हैं  ।

कुछ यादें उनके कर्मक्षेत्र धार मध्यप्रदेश से ही जुडी हैं जहां उन्होंने 40 वर्षों तक लोगों को चाय की चुस्कियों से अवगत कराया और लोग उन चुस्कियों से स्फूर्त होते चले गए. लोगो के जेहन में आज भी यह याद ताजा है कि चाय तो बाबूजी ब्रुक बांड की देते थे . धार के लोगों के  दिलो दिमाग  में आज भी छबि अंकित है कि शहर की सड़कों पर नियमित रूप से एक लाल रंग की गाड़ी नुमा वाहन की जिसको एक युवक ठेलता हुआ चलता था और  उसके आगे आगे सफ़ेद कुर्ता  पजामा पहने चायबाबू चलते थे और इस तरह चाय बेची जाती थी( ब्रुक बॉन्ड एक अंग्रेज कंपनी थी भारत में चाय उसी कंपनी द्वारा बेची जाती थी ). धार और उसके आसपास और पूरा मालवांचल उन्हें चाय बाबू के नाम से जानता था ना कि उनके नाम बाबूलालजी काशिव के नाम से.

सामाजिक क्षेत्र में लोगों से उनके रिश्ते अपनत्व भरे रहे , अनजान जगह पर आने वाले लोगों को  उनकी मदद से घर  किराए पर दिलवाने का एक दुर्लभ कार्य भी  आसानी से  यूंही हो जाता था ,लोग उनके इस भरोसे पर आश्चर्य करते थे .        अन्य दीगर समाजों में भी उनकी  पहुंच थी और सरल स्वभाव के कारण काफी पूछ परख भी थी . सभी के लिए एक जैसा बर्ताव, मिलनसार व्यवहार  ,सब की सुख दुख में बढ़ चढ़ मदद करना और  सेवा भाव के कारण ही वे पहचाने जाते थे.

धार में नार्मदीय ब्राह्मण समाज की जमीन से लेकर भवन निर्माण तक धर्मशाला बनाने में बाबूजी का  योगदान अभूतपूर्व रहा। 40 वर्षों तक एक ही जगह पर लोगो के सुख दुख में सहभागी बनना और आगे रहकर दुख के समय साथ रहना लोग आज भी याद करते है. पीढ़ी दर पीढ़ी की चाय वाले बाबूजी दादा थे हमारे ।

ऐसे ही समाज में हम 5+3 भाई बहन बड़े हुए वो स्कूल हो या कॉलेज उनकी पहुंच और व्यक्तित्व की छत्रछाया में अपनी अपनी योग्यता के बल पर शिक्षा दीक्षा और बहनों के और हमारे  विवाह हुए.  जब हम बड़े हुए तब जाकर उनके ही साथ के लोगों से मालूम पड़ा कि पिताजी का इतिहास भी  स्वतंत्रता सेनानियों के साथ का है. हमारे लिए एक आश्चर्य था बड़े भाई स्व अरविंद दादा और छोटे भाई देवेंद्र की पहल पर पुराने रिकॉर्ड निकाले गए जिसमें आपके समय के स्वतंत्रता सेनानियों के साथ कई बार जेल में रहने  के रिकॉर्ड मिले.  लेकिन कभी मेरे पिता ने जीते जी कभी इसका बखान नहीं किया ,और अपने श्रम से अपना परिवार का निर्माण किया. जीते जी उन्हें हम स्वंतत्रता सेनानी का दर्जा नहीं दिला पाए ये कसक है और रहेगी ।

अपनी समझ और पढ़ाई के साथ हम अपने तरीके से भविष्य निर्माण में लगे रहे. मैं  अपनी पढ़ाई के बाद रायपुर आगया था . लोगों को तो वे देते ही थे ,मेरे पास भी उनके दिए श्लोक और मंत्र हैं और वे लोग भी आज तक  उनकी विद्वता का  बखान करते है .

मेरे अनुभव में उनका हमेशा  सार्वाधिक  यादगार पल है ,मेरे परिवार पर जो छत्र छाया सा आज तक बना हुआ है.  उनके द्वारा मेरे घर की नींव का पत्थर रखना और आशीष देना जो मेरी आलीशान थाती है । वैसे पिताजी का देहावसान रायपुर में मेरे पास ही 6 फरवरी 1999 को हुआ ,उनके मृत देह को उनके कर्म क्षेत्र धार ले जाकर सारे क्रिया क्रम किए गए ।

जिंदगी में बहुत सारी बाते आपको बाद में मालूम पड़ती है लेकिन कसक हमेशा रहेगी  कि पिताजी की भावनाओं के अनुरूप हम समाज सेवा और देश सेवा नहीं कर पा रहे हैं.  अपने आपको उनके आचार विचार और विश्वास के अनुरूप ढाल सकें  यही उनके प्रति समर्पण और श्रद्धांजलि होगी ।अंत में मेरे पिता को मेरी पुस्तक “शेष नहीं प्रलाप कोई ” की एक कविता से अपनी भावांजलि प्रकट करता हूँ ।
है !पिता,
चरणों में नतमस्तक
आपका ही बीच वाला बेटा
मानता हूँ ,
गरल पीने से नीलकंठ नहीं मिलते नहीं समय रुकता है
मेरे ही द्वारे मेरे नगर में ही आपने त्यागी देह
हजारों मिल से लाई गई देह कर्म क्षेत्र तक
भूमिति विन्यास उलझे देह के भीतर तर्क विहीन तुष्टि,किंचित समय के अक्स पर ।
भद्रजन तमाम जाने क्यों देख रहे थे हिकारत से कि

सनातनी शास्त्रानुसार बीच वाला बेटा ,

नहीं कर सकता अधिकार से कोई अंतिम संस्कार ,
जिससे किया जा सके अर्पण ,

तर्पण कर चुका सकूं आपका ऋण
अनुभूत सत्य का संधान
कैसे तोडू सारे मिथक
आप ही तो थे गुरु
कैसे करूं विद्रोह
मन ही मन संताप जब भी आते श्राद्ध
कैसे किसे बताई सत्यो के मिथक
आपके ही जीव्यद्रव्य से आंखों में नमी और शिक्षा दीक्षा
भले ही न मिले अर्पण ,

तर्पण का मौका फिर भी बोता हूँ ,

इंद्रनील से स्वप्न अपनी धमनियों से नाती पोती और बच्चों में

वो संस्कार रोपना चाहता हूँ जो तलाशे रोशनी संभावनाओं की ,
जिससे अनगिनत स्वप्न रचेंगे समय की प्रतिध्वनियां आनंदी बितान पर ।

बाबूजी —नही नही चाय बाबूजी हर चाय के घूँट में अदरक के स्वाद सा तीखा और शक्कर सी मधुर आपकी याद आ ही जाती है और मैं फिर चाय मांग बैठता हूँ — .

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विनोद काशिव ,रायपुर

जन्म: 7 फरवरी 1956 (बसंत पंचमी) धार, मध्यप्रदेश |

शिक्षा: एम.एस.सी. (रसायन शास्त्र), एम.बी.ए. |

माँः स्व. गुलाबबाई काशिव ।

पिताः स्व. बाबूलालजी काशिव ‘चायबाबू’ (स्वतंत्रता सेनानी एवं रिटायर्ड एरिया ऑफिसर ब्रुक बॉन्ड टी कंपनी) ।

असरः बड़े भाई वरिष्ठ पत्रकार स्व. अरविंद काशिव से प्रभावित ।

अभिरूचिः छात्र जीवन से ही साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय, महाविद्यालयीन पत्रिका धारा (1975-76) का संपादन |

वृत्तिः 1982 से 2000 तक फार्मास्युटिकल मार्केटिंग से संबद्ध ।

सरोकारः गैर सरकारी संगठन ‘प्रारब्ध’ का संचालन | सामाजिक संस्था रोटरी क्लब इंटरनेशनल से भी संबद्ध |वर्तमान में प्रसिद्ध डिजिटल न्यूज चैनल मीडियावाला के छत्तीसगढ़ प्रमुख,

प्रकाशनः पत्र-पत्रिकाओं में चुनिंदा कविताएँ प्रकाशित। आकाशवाणी और दूरदर्शन से काव्य रचनापाठ | अब तक तीन काव्य संग्रह ‘कष्ट की मुंडेर पर’ (2018) और ‘अनकहा सा कुछ नहीं’ (2019)शेष नहीं प्रलाप कोई 2020में प्रकाशित |

सम्पर्कः ‘पितृछाया’ 34, एनएमडीसी कॉलोनी, न्यू राजेंद्र नगर, रायपुर-492006 (छत्तीसगढ़) |

मोबाईल: +919826160198

ई-मेल: [email protected]