शान्ति की प्रार्थना करने वाला भारत अकेला देश

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शान्ति की प्रार्थना करने वाला भारत अकेला देश

डाॅ. मुरलीधर चाँदनीवाला

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हमारी नई पीढ़ी पहली बार युद्ध के उन्माद में डूबती चली जा रही दुनिया को बहुत नजदीक से देख रही है। वे लोग भी हैं अभी धरती पर, जिन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध नहीं, तो दूसरा विश्वयुद्ध तो देखा है। विश्वयुद्ध का खौफनाक मंजर जब भी आँखों के सामने तैरने लगता है, आम आदमी का दिल दहल जाता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से अब तक बहुत कुछ बदल गया है। कोई देश नहीं बचा, जो हथियारों का जमाखोर कहलाने में राष्ट्रीय गर्व का अनुभव नहीं करता हो। शक्ति का आह्वान करना एक बात है, लेकिन शक्तिशाली होने के लिये बड़ी भारी संख्या में घातक हथियारों के गोदाम खड़े कर लेना मनुष्यता की वृत्ति नहीं, पशुता की ही वृत्ति है।

मनुष्य ने अपने विकसित होने की घोषणा की, सभ्य कहलाने के प्रमाण सबके सामने रखे, पुरानी रूढ़ियों को तोड़ते हुए उसकी आधुनिक होने की तैयारी भी दिखाई दी, लेकिन इन सबके बिल्कुल समांतर उसका हिंसक चेहरा भी सामने आता रहा। इस वक्त दुनिया के जितने भी विकसित कहलाने वाले राष्ट्र हैं, उनके लगभग सभी राष्ट्राध्यक्ष सत्तर पार के हैं। पूरे विश्व में शान्ति की स्थापना कर सकने की समर्थ आयु में वे सौदे, लड़ाई, बदला, जिद, घमंड और मतलबपरस्ती का लट्ठ घुमाते हुए अत्यंत खूंखार हो चुके दानवों की तरह दिखाई दे रहे हैं। आज आत्मरक्षा के लिये भारत भी उच्चतम शक्ति वाले युद्ध-संसाधनों से लैस है, लेकिन समूचा विश्व यह बात जानता है कि भारत युद्ध की तरफ नहीं है। वह बुद्ध की भाषा समझता है, शान्ति का सजग प्रहरी है। अट्ठारह दिनों तक चले महाभारत युद्ध से उसने जो सीखा, वह है-प्रेम, करुणा, क्षमा और शान्ति।

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भारत केवल अपने लिये शान्ति की प्रार्थना नहीं करता। भारत की प्रार्थना-पद्धति ही ऐसी है, कि प्रत्येक प्रार्थना के बाद वह ‘शान्तिर्भवतु विश्वशान्तिर्भवतु’ के घोष के साथ समूची पृथ्वी पर शान्ति को उतार लाना चाहता है। वह जब भी बात करता है, द्युलोक से लेकर पृथ्वीलोक के लिये शान्ति की प्रार्थना करता है। ‘द्यौः शान्तिः अंतरिक्ष शान्तिः पृथिवी शान्तिः वनस्पतयः शान्तिः ओषधयः शान्तिः’ जैसे अनगिनत शान्तिपाठ कुछ शब्दों का जाल नहीं है। इनमें हमारे अनुष्ठानों के साफ-साफ उद्देश्य दिखाई देते हैं। हमारे प्राचीन ऋषियों को इस पृथ्वी पर शान्ति ही अभीष्ट थी,क्योंकि वे जड़ता का अंधकार देख चुके थे। अशान्ति के प्रबलतम कारकों से उनका सामना हो चुका था।

आज की समस्या यह है कि युद्ध लड़ना अब आसान हो गया है। शान्ति की स्थापना करना तो दूर, शान्ति की बात चलाना भी कठिन मालूम होता है। क्षमा को महावीर का आभूषण कहने वाला भारत जानता है, कि युद्ध और शान्ति में कौन ताकतवर है। युद्धों के भरे-पूरे कुटिल इतिहास से बाहर निकलकर यदि मनुष्य अभी तक प्रेम और करुणा की गंध को नहीं सूंघ पाया, तो उसके सभ्य होने पर प्रश्नचिह्न तो खड़ा है। उस पीढ़ी के महारथियों को सोचना चाहिए, जिन्होंने युद्ध की विभीषिकाएँ देखी हैं। उन्हें विचार करना चाहिए, कि वे मनुष्यता के भविष्य की नींव में आखिर क्या रख रहे हैं।

आज अकेला भारत है, जिसकी आवाज दुनिया भर में शान्ति के पदचाप की तरह सुनी जा सकती है। अकेला भारत है, जो दो शत्रु-राष्ट्रों के बीचों-बीच पृथ्वी का मानदंड बनकर खड़ा हो सकता है। अकेला भारत है, जिसकी शान्ति-प्रार्थना दिग्दिगंत तक सुनी जा सकती है। भारत निःसंदेह आत्मावान् राष्ट्र है, तपस्वी राष्ट्र है। इसके पास युद्ध का तेज भी है, शान्ति का तेज भी है। शिव प्रलय भी मचा सकते हैं, लेकिन उन्हें शान्ति ही प्रिय है। राम अहंकार के रावण का संहार करना जानते हैं, लेकिन उन्हें मर्यादा ही प्रिय है। श्रीकृष्ण के पास घातक सुदर्शन चक्र है, लेकिन उन्हें प्रेम की मोहक बाँसुरी बजाने ही प्रिय है। हमारा भारत सर्वप्रभुत्व-सम्पन्न राष्ट्र होते हुए भी शान्ति का पुजारी है,उसकी प्रार्थना में अमित बल-अमित ऊर्जा।

डाॅ. मुरलीधर चाँदनीवाला की दो कवितायेँ