इंदौर दूषित जल कांड और हावी अफसरशाही: जवाबदेही के संकट में जन प्रतिनिधि

471

इंदौर दूषित जल कांड और हावी अफसरशाही: जवाबदेही के संकट में जन प्रतिनिधि

राजेश जयंत

INDORE : इंदौर के भागीरथपुरा की त्रासदी ने एक बार फिर उस कड़वी सच्चाई को उजागर कर दिया है, जिस पर अक्सर परदा डाल दिया जाता है। व्यवस्था में जन प्रतिनिधियों की भूमिका कमजोर होती जा रही है और अफसरशाही का वर्चस्व लगातार बढ़ता जा रहा है। सवाल केवल एक हादसे का नहीं है, बल्कि उस प्रशासनिक सोच और राजनीतिक चुप्पी का है, जिसने ऐसी घटनाओं की जमीन तैयार की। यह लेख उसी व्यवस्था पर तीखे सवाल खड़े करता है।

आज हालात यह हैं कि जन प्रतिनिधियों से अधिक प्रभावशाली अफसरशाही हो चुकी है। इतिहास गवाह है कि जब-जब प्रशासनिक तंत्र जन जवाबदेही से ऊपर बैठता है, तब-तब भागीरथपुरा जैसे हादसे जन्म लेते हैं।

आज बरबस 1994 की वह घटना याद आती है, जब कैलाश विजयवर्गीय पानी की समस्या को लेकर सड़क पर उतरे थे। उस समय धरना समाप्त करवाने पहुंचे आईपीएस अधिकारी प्रमोद फलणीकर को विरोध का सामना करना पड़ा और उसी दबाव का परिणाम था कि समस्या का तत्काल समाधान हुआ। तब जन प्रतिनिधि व्यवस्था पर हावी नहीं, बल्कि व्यवस्था को जवाबदेह बनाने की भूमिका में थे।

लेकिन आज स्थिति उलट है। काफी समय से इंदौर सहित प्रदेश में अफसरशाही हावी है। इस पीड़ा को जन प्रतिनिधि समय-समय पर सार्वजनिक रूप से व्यक्त भी करते रहे हैं। भागीरथपुरा की घटना ने तो इस सच्चाई पर मुहर लगा दी है कि प्रशासनिक लापरवाही किस हद तक संवेदनहीन हो चुकी है।

सबसे बड़ा और बुनियादी सवाल यह है कि जब छह माह पहले नर्मदा लाइन से जुड़े टेंडर पूरे हो चुके थे, तो फिर वह काम जमीन पर क्यों नहीं उतरा। किस स्तर पर निर्णय अटके रहे। किन अधिकारियों की निष्क्रियता या उदासीनता ने इस त्रासदी की पृष्ठभूमि तैयार की। यदि समय रहते जिम्मेदारी तय होती और निगरानी तंत्र सक्रिय रहता, तो शायद यह हादसा टल सकता था।

भागीरथपुरा कांड के बाद सामने आए हालिया घटनाक्रम ने अफसरशाही के वर्चस्व की तस्वीर को और साफ कर दिया है। इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने अपर मुख्य सचिव की बैठक में बेहद पीड़ा के साथ यह स्वीकार किया कि कई बार अधिकारी न तो जनप्रतिनिधियों की बात सुनते हैं और न ही फोन उठाने की जरूरत समझते हैं। यही बात उन्होंने मुख्यमंत्री के समक्ष हुई बैठक में भी स्पष्ट शब्दों में रखी। यह कोई भावनात्मक वक्तव्य नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की स्वीकारोक्ति है जिसमें चुने हुए जनप्रतिनिधि भी खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से सुना और भोपाल पहुंचते ही तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए। यह घटनाक्रम इस बात को रेखांकित करता है कि समस्या संज्ञान के अभाव की नहीं, बल्कि प्रशासनिक जड़ता और जवाबदेही के कमजोर ढांचे की है, जो बिना दबाव के सक्रिय नहीं होता।

इसी पूरे घटनाक्रम का सार यही है कि अब यह सवाल केवल भागीरथपुरा की एक घटना तक सीमित नहीं रहा। यह उस प्रणाली की परीक्षा है, जिसमें जिम्मेदारी तय करने के बजाय बयान दिए जाते हैं और संवेदनशीलता के बजाय राजनीतिक गणनाएं हावी रहती हैं। यह समय घटना पर राजनीति करने का नहीं, बल्कि यह समझने का है कि भागीरथपुरा में चूक कहां हुई, कैसे हुई और आगे उसे कैसे रोका जाए। शब्दों और बयानों की राजनीति में दक्ष माने जाने वाले कैलाश विजयवर्गीय यदि आज शब्दों में लड़खड़ा रहे हैं, तो सवाल यह भी है कि इस हादसे का दर्द और पीड़ा उन्होंने भीतर तक कितनी महसूस की।

क्योंकि जब दर्द सच्चा होता है, तो शब्द खुद रास्ता ढूंढ लेते हैं।