
Indore Contaminated Water Tragedy: 15 लोगों की मौत से राष्ट्रीय आक्रोश, देश-दुनिया में हुई किरकिरी
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की शहरी शासन व्यवस्था पर खड़े हुए सवाल!
वरिष्ठ पत्रकार के. के. झा की विशेष रिपोर्ट
इंदौर:दुनिया भर में भारत के सबसे स्वच्छ शहर के रूप में चर्चित इंदौर आज एक गंभीर जनस्वास्थ्य संकट से जूझ रहा है। दूषित पेयजल के कारण एक घनी और निम्न-आय वर्ग की बस्ती में करीब 15 लोगों की मौत ने न केवल पूरे देश को झकझोर दिया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की शहरी शासन व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वैश्विक मीडिया में इंदौर की बहुचर्चित स्वच्छता रैंकिंग की विश्वसनीयता पर तीखी टिप्पणियाँ की जा रही हैं।
शहरी स्वच्छता और कचरा प्रबंधन के मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जाने वाला मध्यप्रदेश का वाणिज्यिक राजधानी शहर अब एक भयावह जल-संकट का प्रतीक बन गया है। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार दूषित पानी पीने से अब तक कम से कम 15 लोगों की जान जा चुकी है, हालांकि प्रशासन ने आधिकारिक रूप से मृत्यु संख्या की पुष्टि नहीं की है। इस बीच 32 से अधिक मरीज आईसीयू में भर्ती हैं, जो उल्टी, दस्त और तेज बुखार जैसे गंभीर लक्षणों से जूझ रहे हैं।
इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तीव्र प्रतिक्रिया पैदा की है। प्रतिष्ठित विदेशी समाचार पत्रों ने सवाल उठाया है कि जिस शहर को कचरा पृथक्करण और स्वच्छता के लिए सराहा जाता रहा है, वहां पेयजल सुरक्षा में इतनी बड़ी चूक कैसे हो सकती है। यह त्रासदी न केवल स्थानीय पीड़ा का कारण बनी है, बल्कि भारत की शहरी प्रबंधन व्यवस्था के लिए भी वैश्विक स्तर पर शर्मिंदगी का विषय बन गई है।
प्रभावित इलाके के निवासियों का कहना है कि वे कई महीनों से नल के पानी से दुर्गंध आने और उसके दूषित होने की शिकायतें कर रहे थे, लेकिन उनकी आवाज़ें फाइलों और दफ्तरों के बीच कहीं दबकर रह गईं। लोगों का आरोप है कि नौकरशाही की जटिल प्रक्रियाओं और उदासीनता के कारण समय रहते कोई कार्रवाई नहीं हुई।
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि पेयजल पाइपलाइन के ऊपर बनाए गए एक सार्वजनिक शौचालय से सीवेज पानी जलापूर्ति में मिल गया। चौंकाने वाली बात यह है कि यह शौचालय बिना सेप्टिक टैंक के बनाया गया था, जिससे नगर नियोजन, निगरानी और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
चिकित्सा अधिकारियों ने पुष्टि की है कि जल नमूनों में “असामान्य बैक्टीरिया पाए गए हैं, जो सामान्यतः मानव अपशिष्ट वाले सीवर पानी में होते हैं।” इससे दूषित पानी और बीमारी के फैलाव के बीच सीधा संबंध स्थापित हो गया है।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए तीन इंजीनियरों को सस्पेंड कर दिया है। एक आईएएस अधिकारी को हटा दिया गया है और मामले की गंभीरता को देखते हुए अपर आयुक्त के रूप में तीन नए आईएएस अधिकारी नियुक्त किए गए हैं। घर-घर सर्वे कर रही स्वास्थ्य टीमों ने 2,456 ‘संदिग्ध मरीजों’ की पहचान की है, जिन्हें मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। उन्होंने कहा कि सरकार इस मामले को बेहद गंभीरता से ले रही है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया, “ऐसी घटना दोबारा न हो, इसके लिए कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी,” और कहा कि जल संरचना की सुरक्षा के लिए नए नियम बनाए जाएंगे।
इस दर्दनाक आदत से को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ भी बेहद तीखी रही हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भाजपा-शासित राज्य सरकार पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा, “यह पानी नहीं, ज़हर था जो लोगों को सप्लाई किया गया।” उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल कोई एहसान नहीं, बल्कि जीवन के अधिकार से जुड़ा मौलिक अधिकार है।
इंदौर नगर निगम के पार्षद कमल वाघेला ने इस मामले को “कर्तव्य में घोर लापरवाही” करार दिया है। उन्होंने बताया कि जांच पूरी होने तक कई नगर निगम अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है। अब पूरे प्रकरण में जवाबदेही और नियमों के पालन को लेकर सख्त सवाल उठ रहे हैं।
देश के एक प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार के संपादकीय में जल दिशा-निर्देशों और पर्यावरण कानूनों के कड़े पालन की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। संपादकीय में चेतावनी दी गई कि जब जहरीली वायु पहले ही लोगों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचा रही है, तब असुरक्षित पेयजल उतना ही घातक खतरा बन सकता है। इसे भारत की जल प्रबंधन व्यवस्था के लिए एक “वेक-अप कॉल” बताया गया है।
इंदौर की यह घटना देशभर में जल सुरक्षा को लेकर व्यापक चिंताओं को फिर से उजागर करती है। विशेषज्ञों का कहना है कि तेजी से बढ़ती शहरी आबादी, अनियमित जल परीक्षण, पुरानी पाइपलाइनें और बुनियादी ढांचे के पास अनियंत्रित निर्माण यदि रोके नहीं गए, तो भविष्य में ऐसे रोग-प्रकोप और बढ़ सकते हैं।
जब इंदौर इस त्रासदी से उबरने की कोशिश कर रहा है, तब यह घटना एक कठोर सच्चाई की याद दिलाती है—पुरस्कार और रैंकिंग तब तक अर्थहीन हैं, जब तक मजबूत व्यवस्थाएँ, जवाबदेही और निरंतर निगरानी सुनिश्चित न हो। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि यह हादसा कैसे हुआ, बल्कि यह भी है कि यदि तुरंत सुधार नहीं किए गए, तो क्या यह कहीं और भी दोहराया जा सकता है।





