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इंदौर लेखिका संघ एवं पंडित दीनानाथ व्यास स्मृति प्रतिष्ठा समिति का संयुक्त आयोजन कहानी संवाद ‘दो कहानी चार समीक्षक’

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इंदौर लेखिका संघ एवं पंडित दीनानाथ व्यास स्मृति प्रतिष्ठा समिति का संयुक्त आयोजन कहानी संवाद ‘दो कहानी चार समीक्षक’

इंदौर:पंडित दीनानाथ व्यास स्मृति प्रतिष्ठा समिति एवं इंदौर लेखिका संघ द्वारा कहानी संवाद को लेकर  नियमित मासिक आयोजन ‘दो कहानी चार समीक्षक’ के  तहत कहानी पाठ का आयोजन किया गया .गूगल मीट पर आयिजित इस कहानी पाठ में सुप्रसिद्ध  कहानीकार सुमन ओबेरॉय ने अपनी कहानी “अपने हुए पराये” का बड़ा सधा हुआ पाठ किया .

1.मैं कहानी के अंत से बहुत ज्यादा प्रभावित हुई  कहानी का अंत बेहद सशक्त और प्रतीकात्मक है-विनीता राहुरिकर

कहानी की विस्तृत समीक्षा करते हुए  सुप्रसिद्ध कहानीकार विनीता राहुरिकर ने कहा कहानी के पात्र हमारे आस-पास के समाज से ही उठाए गए प्रतीत होते हैं:शीर्षक ‘अपने हुए पराए’ की सार्थकता
कहानी का शीर्षक इसके कथ्य पर शत-प्रतिशत खरा उतरता है। जिस भाई-बहन के लिए कमल ने अपनी शादी और खुशियों की परवाह नहीं की, वे उसकी मृत्यु पर उदासी का मुखौटा ओढ़े खड़े हैं, उनकी आँखों में एक आँसू तक नहीं है। दस साल से अलग रह रहे भाई-बहनों का यह व्यवहार सिद्ध करता है कि खून के रिश्ते केवल नाम के ‘अपने’ रह गए थे, जो असल में ‘पराए’ हो चुके थे।विनीता  राहुरिकर ने कहा कि मैं कहानी के अंत से बहुत ज्यादा प्रभावित हुई  कहानी का अंत बेहद सशक्त और प्रतीकात्मक है। जब कमल का भाई सूरज उसे मुखाग्नि देने के लिए हाथ बढ़ाता है, तो उसकी सहेली कांता जी हिकारत से उसके हाथ से जलती लकड़ी छीन लेती हैं और कहती हैं:”कमल स्वयं को समस्त ऋणों से मुक्त करके जा रही है, उसपर नया ऋण न चढ़ाओ, वह वास्तव में कमल थी – यानि कीचड़ से ऊपर – उसे ऊपर ही रहने दो।” यहाँ ‘कीचड़’ उस स्वार्थी, शोषक और संवेदनहीन परिवार व समाज का प्रतीक है, जिससे मुक्त होकर कमल की पवित्र आत्मा (कमल के फूल की तरह) पंचतत्व में विलीन हो जाती है सुमन ओबेरॉय जी की भाषा सरल, प्रवाहमयी और बोलचाल की हिंदी है, जिसमें उर्दू शब्दों (इतिश्री, तल्खी, निर्मोही) का सटीक प्रयोग किया गया है.

2.घटनाओं का चित्रण इतना सजीव है कि पाठक स्वयं को कथा से जुड़ा हुआ महसूस करता है-डॉ. प्रतीक्षा शर्मा

कहानी की समीक्षा करते  हुए एक और समीक्षक लेखिका डॉ. प्रतीक्षा शर्मा ने कहा सुमन ओबेरॉय जी द्वारा लिखित “अपने हुए पराये” एक अत्यंत मार्मिक और संवेदनशील कहानी है, जो आधुनिक समाज में रिश्तों के बदलते स्वरूप और वृद्धावस्था की उपेक्षा को हृदयस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत करती है। कहानी की नायिका के माध्यम से लेखिका ने दिखाया है कि जिन अपनों के लिए व्यक्ति जीवन भर समर्पित रहता है, वही समय आने पर उसे अकेला छोड़ देते हैं।
कहानी की भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और भावपूर्ण है। घटनाओं का चित्रण इतना सजीव है कि पाठक स्वयं को कथा से जुड़ा हुआ महसूस करता है। लेखिका ने करुणा, संवेदना और मानवीय मूल्यों का प्रभावी चित्रण करते हुए समाज को आत्ममंथन का संदेश दिया है कि अपने संबंधों को केवल स्वार्थ का माध्यम न बनने दें।यह कहानी केवल एक वृद्धा की व्यथा नहीं, बल्कि आज के समाज का यथार्थ चित्र है। इसका शीर्षक “अपने हुए पराये” कथा के मूल भाव को पूरी तरह सार्थक करता है।यह एक प्रभावशाली, विचारोत्तेजक और हृदयस्पर्शी कहानी है, जो पाठकों को रिश्तों की गरिमा, संवेदनशीलता और मानवीय कर्तव्यों का स्मरण कराती है।

कथापाठ द्वितीय  सत्र

कथापाठ के द्वितीय  सत्र में सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ.स्वाति तिवारी ने अपनी कहानी स्त्री मुक्ति का यूटोपिया का पाठ किया .

3. इस तरह की कहानी तो आधुनिकता की अंधी दौड़ वाली युवा पीढी को पढाई जाने चाहिए .-प्रो.अनिता नाईक

इस कहानी  की समीक्षा करते हुए प्रो.अनिता नाईक ने कहा कि कहानी को पढ़ कर मुझे लगा इस तरह की कहानी तो आधुनिकता की अंधी दौड़ वाली युवा पीढी को पढाई जाने चाहिए .

स्त्री मुक्ति का यूटोपिया ”समकालीन हिंदी कहानी के महत्वपूर्ण विषयों में से एक—स्त्रीस्वतंत्रता, आधुनिक जीवन शैली और पारिवारिक मूल्यों के बदलते स्वरूप—को केंद्र में रखकर लिखी गई एक विचारात्मक  कहानी है। कहानी में लेखिका ने आधुनिक स्त्री की स्वतंत्रता के प्रश्न को केवल अधिकारों के संदर्भ में नहीं, बल्कि भावनात्मक संबंधों, सामाजिक जिम्मेदारियों और मानवीय संवेदनाओं के संदर्भ में भी देखा है। ‘यूटोपिया’ का अर्थ है—एक ऐसा आदर्श संसार जिसकी कल्पना आकर्षक लगती है, लेकिन वास्तविक जीवन में उसके भीतर कई जटिलताएँ और विरोधाभास छिपे होते हैं। कहानी का शीर्षक इसी विचार को स्पष्ट करता है कि क्या आधुनिक स्त्री जिस मुक्ति की कल्पना कर रही है, वह वास्तव में पूर्ण स्वतंत्रता है या केवल एक आकर्षक भ्रम। या कहे एक ऐसा आदर्श समाज जो इतना उत्तम है कि असल दुनिया में उसका अस्तित्व लगभग असंभव है।

कहानी की नायिका सुमी और शीरीन दो अलग-अलग जीवन दृष्टियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। सुमी भारतीय मध्यमवर्गीय पारिवारिक व्यवस्था से आती है, जहाँ परिवार प्रेम, त्याग और जिम्मेदारियों के आधार पर चलता है। वह घर के प्रत्येक सदस्य की आवश्यकताओं का ध्यान रखती है—बच्चे, ससुर और पति की जिम्मेदारियाँ निभाती है। यह जीवन उसे थकाता अवश्य है, लेकिन रिश्तों से जुड़ी भावनात्मक संतुष्टि भी देता है।

इसके विपरीत शीरीन महानगरदिल्ली केआधुनिक जीवन का प्रतीक है। उसका भव्य घर सुविधाओं, तकनीक और स्वतंत्रतपूर्ण प्रबंधन से भरा है। साटन के परदे, शानदार साज-सज्जा, फ्रिज पर लगी व्यवस्थाएँ, माइक्रोवेव और कार्ड स्वाइप सिस्टम आधुनिक जीवन की सुविधा को दर्शाते हैं। वहाँ न पितृसत्ता है न मातृसत्ता, बल्कि “व्यक्तिवादीसत्ता”है, जहाँ हर व्यक्ति अपनी स्वतंत्र दुनिया में जी रहा है।

सुविधाओं के पीछे छिपा अकेलापन दर्शाती यह कहानी बहुत गहरे तक प्रभावित करती है.लेखिका यहाँ प्रश्न उठाती हैं कि क्या ऐसी स्वतंत्रता, जिसमें संबंधों की ऊष्मा समाप्त हो जाए, वास्तव में मुक्ति कहलाएगी?कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष स्त्री की देह, इच्छा और निजी स्वतंत्रता का प्रश्न है। शेरीन मानती है कि स्त्री को अपनी इच्छाओं और जीवन के निर्णय लेने का पूरा अधिकार है। वह पारंपरिक नैतिकताओं और सामाजिक बंधनों को पुरानी सोच मानती है।वहीं सुमी के लिए प्रेम, विश्वास, निष्ठा और पारिवारिक संबंध जीवन के महत्वपूर्ण आधार हैं। वह स्वतंत्रता का विरोध नहीं करती, लेकिन उसके लिए स्वतंत्रता के साथ संवेदना और जिम्मेदारी भी आवश्यक है।

यहाँ लेखिका किसी एक पक्ष को पूर्ण रूप से सही या गलत नहीं ठहराती, बल्कि पाठक के सामने विचार का प्रश्न रखती है।कहानी का सबसे प्रभावशाली पक्ष यह है कि लेखिका ने आधुनिक जीवन की चमक और उसके भीतर छिपे खालीपन को बहुत सूक्ष्मता से दिखाया है।

4.पात्रों का चयन, उनके  आंतरिक अंतर्द्वंद  एवं विषय की गंभीरता तो बड़े खूबसूरत ढंग से संजोया है-डॉ.रंजना शर्मा 

कहानी की समीक्षा करते हुए लेखिका डॉ.रंजना शर्मा ने कहा मनोवैज्ञानिक  दृष्टि से कहानी का विषय और गठन बहुत ही सुंदर है। पात्रों का चयन, उनके  आंतरिक अंतर्द्वंद  एवं विषय की गंभीरता तो बड़े खूबसूरत ढंग से संजोया है। कहानी में रोचकता, संजीदगी एवं सौम्यता परिलक्षित होती है । कहानी की बनावट ,पाठक को पढने के लिए मजबूर करती है। जिज्ञासा की ललक पाठक को कहानी से जोड़े रखती है।स्वाति जी ने अपनी इस कहानी में आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में आधुनिकता का पहनावा ओढ़े महिलाओं की मन:स्थिति को बड़ी ही खूबसूरती से संजोया है। जहाँ पुरूष आज भी अपना वर्चस्व बनाए हुए है और नारी मूल रूप से उन्हीं बंदिशों में जकड़ी हुई है। आपकी भाषा बहुत ही सरल, सटीक और मर्मस्पर्शी है संवाद में गांभीर्य एवं सादगी की छवि स्पष्ट झलकती है। लेखिका ने कई स्थानों पर व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग भी किया है जिससे कहानी में एक अलग ही तरह का कसाव उत्पन्न होता है।

कार्यक्रम का शुभारम्भ माँ सरस्वती के स्मरण से शुरू हुआ और लेखिका प्रभा तिवारी ने कहानीकारों और समीक्षकों का स्वागत करते हुए कहा कि कहानी को सुनाने और सुनने का आनंद अलग होता है .और कहानी पाठ अपने आप में एक कला है .कार्यक्रम का सफल संचालन प्रो. रानू तुवानी ने किया .कहानीपाठ पर डॉ.रश्मि जोशी ,शीला मिश्रा ,डॉ.दविंद्र कौर होरा ,निर्मला मूंदड़ा ,चन्दा जैन ,सुषमा व्यास ,डॉ.सुमन ओबेरॉय ,सपना उपाध्याय इत्यादि ने भी प्रतिक्रिया दी .आभार प्रभा तिवारी ने व्यक्त किया ,कार्यक्रम में हम होंगे कामयाब गीत के सामूहिक गान से समाप्त हुआ .