
Indore News: क्रिश्चियन कॉलेज ज़मीन विवाद में प्रशासन की बड़ी जीत : हाई कोर्ट ने याचिका नामंजूर की
INDORE : इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज की भूमि को लेकर सालों से चल रहा विवाद प्रशासन और कॉलेज प्रबंधन के बीच तूल पकड़ चुका था। यह विवाद अब एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गया है जहां प्रशासन की चुनौती को उच्च न्यायालय ने फिलहाल राहत दिए बिना उसे खुद निपटाने का निर्देश दिया है।
▪️मामला क्या है
▫️क्रिश्चियन कॉलेज के पास करीब 1.702 हेक्टेयर (लगभग 400-500 करोड़ रुपए मूल्य की अनुमानित) जमीन है जिस पर वह व्यावसायिक उपयोग हेतु नक्शा (टीएनपीसी-Town & Country Planning) पास कराने का प्रयास कर रहा था। कॉलेज प्रशासन का तर्क रहा कि यह जमीन उनका स्वामित्व है और वे इसे शैक्षिक तथा व्यावसायिक परियोजनाओं के लिए उपयोग करना चाहते हैं।
प्रशासन ने अपनी जांच में पाया कि यह भूमि मूल रूप से महाराजा होलकर काल में शर्तों के साथ बिना किराए के धार्मिक/शैक्षिक और महिला अस्पताल के प्रयोजन के लिए दी गई थी। शर्तों के अनुसार अगर यह उपयोग समाप्त हो जाता है या शर्तों का उल्लंघन होता है तो यह जमीन वापस महारानी या उनके उत्तराधिकारियों को लौट जाती है। चूंकि अस्पताल नहीं है और कॉलेज का मूल उद्देश्य विवादों के बीच कमजोर पड़ रहा है, प्रशासन ने भूमि को शासकीय घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की और किसी भी व्यावसायिक नक्शे को रोक दिया।
▪️कॉलेज की चुनौती और हाईकोर्ट का निर्णय
▫️कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. अमित डेविड ने कलेक्टर के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की। यह याचिका हाईकोर्ट के सिंगल बेंच तथा अपीलीय खंडपीठ दोनों स्तर पर चली। हाईकोर्ट ने कॉलेज की याचिका को नामंजूर कर दिया और यह स्पष्ट किया कि संसदीय प्रक्रिया के तहत जारी किया गया शो-कॉज नोटिस (notice) वैध है तथा कॉलेज को स्वयं कलेक्टर को जवाब देना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि जब तक कॉलेज अपना जवाब सक्षम प्राधिकारी के सामने नहीं देता और उचित प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी। इसके अनुसार कॉलेज पक्ष को सात दिन में जवाब देने का निर्देश दिया गया है और प्राधिकारी को जवाब के आधार पर स्पष्ट कारण बताओ आदेश जारी करना है।
▪️एफ़आईआर एवं आरोप
▫️मामले में कॉलेज प्रशासन के खिलाफ कुछ आरोप भी सामने आए थे जिसमें चर्च की संपत्ति में हेरफेर तथा अन्य आपराधिक प्रावधानों के तहत एफआईआर दर्ज होने की बातें कही जा रही हैं। इस तरह के आरोप जमीन विवाद की गंभीरता को दर्शाते हैं, हालांकि न्यायिक प्रक्रिया इन आरोपों को अलग से परखी जाएगी। (सूचना स्थानीय सूत्र/प्रशासनिक बयानों पर आधारित)
▪️क्या अब जमीन सरकारी हो जाएगी?
▫️हाल के आदेशों के अनुसार हाईकोर्ट ने कॉलेज की याचिका को फिलहाल खारिज कर शासन-प्राधिकरण के निर्णय का सम्मान किया है और भूमि सम्बन्धी निर्णय प्रशासन के पास ही छोड़ दिया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि कॉलेज को जमीन पर कब्ज़ा जारी रखने या उसे वापस लेने के मुद्दे पर प्रशासन अपने अधिकार के अनुसार अगला कदम उठाएगा। फिलहाल कलेक्टर की जांच जारी है और कॉलेज को एक औपचारिक सुनवाई का मौका दिया गया है।
▪️स्थिति का विश्लेषण
▫️इस विवाद के कई पहलू हैं – तकनीकी भूमि स्वामित्व, चैरिटेबल ग्रांट की शर्तें, प्रशासन की भूमि-सुधार नीतियां, तथा संबंधित शैक्षिक संस्थान की नीतिगत भूमिका। उच्च न्यायालय का रुख यह संकेत देता है कि जब तक भूमि के वास्तविक स्वामित्व और उपयोग शर्तों का विधिक विश्लेषण पूरा नहीं होता, अदालत मामले में सीधे हस्तक्षेप नहीं करेगी। प्रशासन इस प्रक्रिया में आगे बढ़ रहा है और कॉलेज को जवाब देने का अवसर प्रदान कर रहा है।





