ईरान : यह बगावत क्या इस्लाम से विमुख होने की है !

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ईरान : यह बगावत क्या इस्लाम से विमुख होने की है !

डॉ.सुशीम पगारे

लगभग 6 हज़ार साल का इतिहास और सँस्कृति अपने में समेटे ईरान इन दिनों विद्रोह की अग्नि में बुरी तरह जल रहा है।यह आग जहां 1979 की इस्लामिक क्रांति के द्वारा स्थापित शासन की तानाशाही से विमुक्त होने की है वहीं यह एक ऐसी लड़ाई के रूप में सामने आ रही है जहां लोग इस्लाम से ही विमुख हो पुनः अपनी जड़ों की ओर लौटने को आतुर नज़र आ रहे हैं। ईरान के विद्रोही जो खुद मुस्लिम हैं,मस्जिदें जला रहे हैं…विद्रोह रत जनता प्राचीन प्रतीक चिन्ह ‘सिंह और सूरज’ के झंडे का इस्तेमाल कर रही है।ईरान में ऐसा क्यों हो रहा है?वहां अमेरिका के संभावित हमले के क्या कारण हैं?

 

किसी भी मुसलमान के लिए मस्जिद अल्लाह का घर है।ऐसे में ईरान की मुस्लिम जनता क्यों कर अपने अल्लाह का घर जलाने लगी ? इस बात का उत्तर प्राप्त करने में हमें ईरान के जनमानस में व्याप्त उन प्रचीन संस्कारों में झांकना पड़ेगा जो वहां की जनता इस्लाम कबूल करने के बाद भी न अरब,न तुर्क,न इराक और न ही मिस्र की जनता की तरह भूली। ईरान पर जब अरब में इस्लाम के उत्कर्ष के बाद, मुसलमानों ने 633 ईस्वी से आक्रमण प्रारम्भ किया तो 651 में अंतिम सेसानियन राजा यज़देगर्द तृतीय की हार से देश से प्राचीन पारसी धर्म की विदाई होती चली गई। इस धर्म की स्थापना ज़ोरोस्टर या ज़रथुष्ट्र ने छटी शताब्दी ईसा पूर्व की थी।इस धर्म के मूल में तीन बातें मुख्य थी- अच्छे विचार,अच्छे शब्द और अच्छे कार्य।बस इसने ईरान जो उस समय फारस था,के जनमानस में ऐसा प्रभाव डाला कि आज ढाई हज़ार साल बाद और इस्लामिक शासन के लगभग डेढ हज़ार वर्ष बाद भी ईरान की जनता पीढ़ी दर पीढ़ी भूल नहीं पाई है।… और यही किसी सँस्कृति या संस्कार की अंतर्निहित शक्ति होती है जो सदियों बाद भी न बदलती है और न ही पुरानी पड़ती है।ईरान इसका बड़ा उदाहरण है जिसने मज़हब अपनाया पर अपनी शिनाख्त नहीं बदली।मुसलमान बना पर अपनी ज़बान अरबी नहीं फ़ारसी ही रखी।

 

यह ईरान की तहजीब ही थी जहां बच्चे या युवक यदि इस्लामिक सिद्धांत पढ़ते रहे तो वे फिरदौसी के महाग्रन्थ शाहनामा को भी पढ़ते रहे हैं जो कहता है-हम थे,हम हैं और हम रहेंगे।यानी भले ही हम मुसलमान हो गए पर हमारी प्रचीन सँस्कृति न भूले न ही भूलेंगे।

ईरानी बच्चा जब बड़ा होता है तो उसके ज़ेहन में केवल इस्लाम नहीं रहता खुसरो,सोहराब,रुस्तम,हाफ़िज़ और रूमी भी रहते हैं।अपनी सँस्कृति के चलते जो रुतबा यूरोप में फ्रांस का है वही रुतबा मिडिल ईस्ट में ईरान का है।ईरान ने इस्लाम की सुन्नी परम्परा जो कट्टर है,को त्याग कर अपेक्षाकृत नर्म परम्परा शिया को अपना कर अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा।

ईरान की जनता ने 1979 में स्थापित कट्टर इस्लामिक शासन के खिलाफ विद्रोह पहली बार नहीं किया है।सन 1999 से लगा कर 2022 तक जनता पांच बार इस्लामिक तानाशाही के विरुद्ध सड़कों पर उतरी।यह पहली बार है जब वह तानाशाही के साथ – साथ इस्लाम के ही खिलाफ बग़ावत कर रही है।अपने प्राचीन ईरान की मांग कर रही है।यह रातों रात भी नहीं हुआ।पिछले लगभग 50 सालों की इस्लामिक कट्टरता से परेशान ईरान की जनता ने कुछ वर्षों से मस्जिदों में ही जाना बंद कर दिया था।कट्टर इस्लामिक देश ईरान में 75 हज़ार मस्जिदें हैं। 50 हज़ार मस्जिदें इस लिए खण्डहर में तब्दील हो रही हैं क्यों कि जनता उनमें नमाज़ पढ़ने ही नहीं जाती।ईरान में हो रहे घटनाक्रम क्या यह इंगित कर रहे हैं कि इतिहास करवट बदल रहा है?कभी इस्लाम के मानने वालों ने अपने मत के प्रचार में दूसरे धर्मों के पूजा स्थलों को लूटा,तोड़ा और आग के हवाले किया था।आज मुस्लिम राष्ट्र ईरान में मस्जिदें तोड़ी और जलाई जा रही हैं।यदि ईरान अपनी जड़ों यानी ज़रथुष्ट्र द्वारा स्थापित पारसी धर्म जो अच्छे विचार,अच्छे शब्द और अच्छे कार्य की वकालत करता है,की और लौट गया तो मान कर चलिए यह बदलाव ईरान तक सीमित रहने

वाला नहीं है।

 

अब ज़रा वर्तमान हालातों के ही मद्देनजर सम्भावित अमेरिकी हमले और शाह रजा पहलवी की ईरान वापसी पर भी बात कर लें।जनता के विद्रोह की आड़ में अमेरिका,ईरान में खोमैनी को निपटा कर ही दम लेगा।जहाँ उसे ईरान का तेल चाहिए वहीं ऐसा कर वह रूस और चीन के गुट को कमजोर करेगा।रजा पहलवी की भावी वापसी को ट्रांजिशनल मानें।उन्ही के पिता को 1979 में हटाने के लिए ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई थी।अतः देश के प्राचीन मूल्यों में अपनी परेशानी का हल ढूंढ रही जनता को वे सन्तुष्ट कर पाएंगे यह सम्भव नहीं नज़र आता।यह तय है कि आने वाले दिनों में ईरान ही सुर्खियां बटोरेगा क्योंकि वह वेनेज़ुएला नहीं है जो कुछ ही घंटों में घुटने टेक दे।

(लेखक इतिहास के प्रोफेसर हो कर सम-सामयिक मामलों के जानकार हैं)