
जोगी को 20 साल बाद सजा से सत्ता और न्याय व्यवस्था की कमजोरी के सवाल
आलोक मेहता
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को एनसीपी नेता रामावतार जग्गी की 2003 में हुई हत्या के मामले में दोषी ठहराया है, जिससे 2007 में उन्हें बरी किए जाने का फैसला पलट गया है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद, उच्च न्यायालय ने जोगी को तीन सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है |छत्तीसगढ़ की राजनीति में वर्ष 2003 का रामावतार जग्गी हत्याकांड एक ऐसा मामला है, जिसने न केवल राज्य बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी गहरी छाप छोड़ी। यह मामला केवल एक राजनीतिक हत्या का नहीं, बल्कि सत्ता, प्रभाव, जांच एजेंसियों की भूमिका और न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता का प्रतीक बन गया। लगभग दो दशकों से अधिक समय तक चलने वाली इस कानूनी लड़ाई ने कई सवाल खड़े किए—क्या न्याय में देरी न्याय से इनकार है? क्या प्रभावशाली व्यक्तियों पर कार्रवाई कठिन हो जाती है? और क्या राजनीतिक आरोपों और न्यायिक तथ्यों के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना संभव है? यह मामला लोकतंत्र में जवाबदेही और न्याय के महत्व को रेखांकित करता है। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि सत्ता में बैठे व्यक्ति भी कानून से ऊपर नहीं हैं।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के नेता रामवतार जग्गी की 4 जून, 2003 को रायपुर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, उस समय अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री थे।मृतक तत्कालीन राज्य एनसीपी प्रमुख वीसी शुक्ला के करीबी विश्वासपात्र थे।सतीश जग्गी ने आरोप लगाया था कि अजीत जोगी और अमित जोगी उनके पिता की हत्या के पीछे थे।इस मामले की प्रारंभिक जांच राज्य पुलिस ने की थी और बाद में इसे सीबीआई को सौंप दिया गया था, जिसने अमित जोगी सहित कई आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दायर किया था।31 मई, 2007 को रायपुर की एक निचली अदालत ने फैसला सुनाया कि अभियोजन पक्ष ने 28 आरोपियों के खिलाफ आरोप सफलतापूर्वक साबित कर दिए हैं। हालांकि, अदालत ने पर्याप्त सबूतों के अभाव की दलील पर अमित जोगी को उन पर लगे आरोपों से बरी कर दिया।बाद में सीबीआई ने बरी किए जाने को चुनौती दी, लेकिन उच्च न्यायालय ने 2011 में देरी के आधार पर उसकी याचिका खारिज कर दी। छत्तीसगढ़ सरकार और रामावतार जग्गी के पुत्र सतीश जग्गी की अलग-अलग अपीलें भी खारिज कर दी गईं।
यह फैसला विवादों का कारण बना क्योंकि साजिश सिद्ध होने के बावजूद मुख्य आरोपी को राहत मिल गई।
इसके बाद राजनीतिक आरोपों का दौर शुरू हुआ: सत्ता के दुरुपयोग के आरोप , जांच एजेंसियों पर दबाव और
गवाहों को प्रभावित करने की बातें सामने आई |यह मामला 23 वर्षों तक चला, जिसके प्रमुख कारण थे:
सी बी आई द्वारा अपील में देरी , तकनीकी आधार पर याचिकाओं का खारिज होना और कई स्तरों पर मुकदमेबाजी | समय-समय पर यह आरोप भी लगे कि कांग्रेस नेतृत्व से समर्थन मिला और कुछ विशेष समूहों का प्रभाव रहा |
पिछले साल नवंबर में, सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय से अमित जोगी की बरी होने के खिलाफ अपील दायर करने की अनुमति मांगने वाली सीबीआई की याचिका पर नए सिरे से विचार करने को कहा था।सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सीबीआई के आवेदन पर विचार करते समय उच्च न्यायालय को “अधिक उदार और व्यावहारिक दृष्टिकोण” अपनाना चाहिए था और याचिका की योग्यता के आधार पर उसकी जांच करनी चाहिए थी।
केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की अपील पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद, उच्च न्यायालय ने पिछले महीने 2003 के हत्या मामले में कार्यवाही फिर से शुरु की थी |पिछले साल नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हालांकि सीबीआई ने काफी देरी के बाद आवेदन दायर किया था, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि “प्रतिवादी अमित जोगी के खिलाफ आरोप बहुत गंभीर थे, जिनमें प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल के सदस्य की हत्या की साजिश शामिल थी | ”
रामावतार जग्गी के पुत्र सतीश जग्गी ने अब उच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत करते हुए कहा, “सत्य की जीत हुई है। न्यायपालिका में मेरा विश्वास सही साबित हुआ है। सत्य की विजय हुई है और मेरे पिता को अंततः न्याय मिला है |मुख्य आरोपी अमित जोगी अब जेल जाएगा। हालांकि हमारे परिवार को अपने पिता को खोने का दुख है और हम पूरी तरह से खुश नहीं हो सकते, लेकिन न्याय मिल गया है। मैं न्यायपालिका और सीबीआई का आभार व्यक्त करता हूं। आज सत्य की जीत हुई है |” बहरहाल , अमित जोगी अब भी पिता की बनाई पार्टी के नेता के रुप में सक्रिय है और सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की बात कही है |
असल में कांग्रेस के मुख़्यमंत्रियों में अजित जोगी सर्वाधिक विवादास्पद रहे | सरकारी अधिकारी से रातोंरात कांग्रेस के नेता , सांसद और मुख्यमंत्री बनवाने में पार्टी प्रमुख श्रीमती सोनिया गांधी की पसंद और भूमिका रही | उनके जाति प्रमाण पत्र पर विवाद अदालत तक गए और आदिवासी इलाके के नेता कहलाने के बावजूद उनकी पार्टी के नेता उनके ईसाई होने का फायदा मिलने की बातें कहते रहे | सन 2000 में मध्य प्रदेश का विभाजन होने पर छतीसगढ़ के दिग्गज नेताओं श्यामा चरण शुक्ल , विद्याचरण शुक्ल , मोतीलाल वोरा , आदिवासी नेता अरविन्द नेताम के बजाय सोनिया गांधी के आदेश पर अजित जोगी को मुख़्यमंत्रीं बनाया गया | यह शुक्ल – दिग्विजय सिंह आदि गुटों के टकराव का भी आधार बना | लेकिन जोगी और उनके बेटे पर सत्ता के भयानक दुरुपयोग , भ्रष्टाचार ही नहीं हत्याओं के गंभीर आरोप लगते रहे | जग्गी हत्या काण्ड में तो अमित जोगी को ही सबसे बड़ा आरोपी बताया गया था | इसी तरहबस्तर क्षेत्र, जो लंबे समय से नक्सल प्रभावित रहा है, वहां की राजनीति हमेशा संवेदनशील रही है। जोगी परिवार पर समय-समय पर नक्सलियों के साथ अप्रत्यक्ष संबंधों के आरोप भी लगे | इसी संदर्भ में 2013 के स्तर की झीरम घाटी के नक्सली माओवादी आतंकी हमले में जोगी के कट्टर विरोधी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल और महेंद्र कर्मा सहित कई नेताओं की हत्या की चर्चा भी होतीं थी। यह हमला नक्सल माओवादी हिंसा का एक बड़ा उदाहरण था, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। लेकिन ऐसे आतंकी हमलों में पर्दे के पीछे रहने वालों के प्रमाण मुश्किल से मिलते हैं |
दूसरी तरफ जोगी के सत्ता काल में मीडिया को दबाने के अनेक प्रकरण आते रहे | स्थानीय प्रादेशिक ही नहीं राष्ट्रीय स्तर के अख़बार , पत्रिका , न्यूज़ चैनल्स पर जोगी के अधिकारी और अमित जोगी क़ानूनी तथा अन्य धमकियां देते थे | दो चार बार तो मुझे भी उसकी धमकियों का सामना करना पड़ा | आउटलुक जैसी पत्रिका के दफ्तर में आकर धमकी देने जैसे अवसर शायद ही किसी अन्य नेता को मिला होगा | यही नहीं बाद में कांग्रेस के ही एक शीर्ष नेता को अमित जोगी द्वारा धमकाए जाने की एक खबर पर पहले उसने क़ानूनी नोटिस दिया , लेकिन फिर अन्य बड़े नेताओं द्वारा गलत हाथ डालने की समझाइश पर खुद खेद व्यक्त कर दिया | ऐसे मामलों को राजनीतिक दृष्टिकोण से हटकर न्यायिक और तथ्यात्मक आधार पर देखा जाना चाहिए । लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि सत्ता में बैठे व्यक्ति भी कानून से ऊपर नहीं हैं।





