अरूणोदय 

अरूणोदय 

मीडियावाला.इन।

यह कहानी है अबूझमाड़ (बस्‍तर ) की एक आश्रम शाला के गुरू जी शिवप्रसाद जी की । पर उनके बादे में जानने के पहले उनकी अबूजा कार्य भूमि के बारे में कुछ जान लेना उचित होगा ।  

दर असल इस लम्‍बी कहानी के दो भाग हैं । प्रथम भाग में बस्‍तर के जनजाति अंचल अबूझमाड़ की कहानी है, जो न जाने कब से शेष दुनियॉ के लिए अबूझ और अनदेखी रही है । द्वितीय भाग में गुरू जी शिवप्रसाद शास्‍त्री की विलक्षण कर्त्‍तव्‍य निष्‍ठा की कहानी को बयान किया गया है । 

सत्‍तर के दशक का बस्‍तर आज के बस्‍तर से बुहत भिन्‍न था । उस समय बस्‍तर प्राकृतिक रूप से अप्रतिम सुन्‍दर एवं शांत क्षेत्र हुआ करता था । मीलों –मील विस्‍तारित वनाच्‍छादित क्षेत्र,  दूर-दूर तक फैली पर्वत श्रंखलायें, सैकड़ो नदी-नाले , झरने एवं प्रपात और इनमें स्‍वच्‍छंद विचरण करते, नृत्‍य करते मदमस्‍त उल्‍लासित वनवासी । जिनकी सुबह सल्‍फी पीने से होती और रात गुजरती मादल के थपों में । दिन भर शिकार करते और शाम को अब मिल- बांटकर खाते । एक आत्‍म निर्भर जिन्‍दगी । 

बाहरी दुनिया के लियेक बस्‍तर एक अजूबा जैसा था । सैलानी  दूर-दूर  से बस्‍तर देखने आते। हाट- बाजार घूमते । सल्‍फी पीने का आनंद लेते । मुर्गों की लड़ाई देखते । लाल चींटों की चटनी का स्‍वाद चखते । आदिवासियों के साथ नृत्‍य करते और बस्‍तर को कैमरों में भरकर ले जाते, फिर उसको नाना प्रकार से भुनाते । 

पर सरकारी मुलाजिमों के लिए तब बस्‍तर कालापानी की सजा के समान था । सरकार में जिस किसी को सजा देनी होती तो उसे बस्‍तर भेज दिया जाता । 

बस्‍तर का ही एक इलाका है ‘अबूझमाड़’ ।  बूझा न जा सके जिसे ऐसा माड़ (पहाड़) । आजादी मिलने के कई वर्षों के बाद भी अबूझमाड़  में प्रवेश करने की, किसी बाहरी व्‍यक्ति को इजाजत नहीं थी । कहा जाता है कि साठ के दशक में पहली बार सरकारी कर्मचारियों का आना-जाना इस क्षेत्र में प्रारंभ हुआ । 

लगभग 4000 वर्ग किलो मीटर में फैला अबूझमा, ऊँची-ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं और सागौन तथा साल के लंबे – ऊँचे वृक्षों से ढंका हुआ है । ये वृक्ष इतने ऊँचे और घने हैं कि सूरज की किरणों को भी धरती पर उतरने के लिए पत्‍तों के आवरण को भेदने में मुश्किल आती । 

इसी अबूझमाड़ में बसा करते हैं - वनवासी  अबूझमाड़िया । पर्वतों को लांघते, घने जंगल में पगडंडियों पर चलते जब बीसों – बीस मील गुजर जाते हैं, तब कही पच्‍चीस-तीस  अबूझमाड़िया परिवारों का छोटा सा गांव – टोला दिखता है । ये गांव भी जब स्‍थाई नहीं होते थे, जहॉ खेती के लिए जमीनतैयार की, व‍हीं गांव बस गया । 

अबूझमाड़ियों के घर, मिट्टी के बने झोपड़े होते हैं । बांस और बल्लियों से ढांचा तैयार कर, चारों ओर से चटाइयॉ लपेटीं और फिर मिट्टी का मोटा लेप लगा दिया । ऊपर से ढकने के लिए घास-फूस और पत्‍तों का छप्‍पर छा दिया । सामग्रियों के नाम पर मिट्टी का बना चूल्‍हा, मिट्टी और एल्यूमीनियम के दो-चार बर्तन । छज्‍जे के दो छोरों से लटकता हुआ एक मोटा बांस, उस पर टंगी गुदड़ी और फटे कम्‍बल । एक तरु अनाज रखने के लिए बनाई हुई अनाज कोठी और बोरी में रखा हुआ डिल्‍लेवाला नमक और केरोसिन की कुप्‍पी । कुल मिलाकर यही होती है उनकी गृहस्‍थी । 

अबूझमाड़ में जब बाहरी लोगों का प्रवेश वर्जित था तब मर्द औरतें कमर के नीचे का हिस्‍सा ढंकने के लिए छोटा सा वस्‍त्र (कोपीन ) लपेटते थे और शेष शरीर निर्वस्‍त्र रहता था ।‘घोटलू ’ उनकी संस्‍कृति का अनवार्य हिस्‍सा था, जहॉ युवा-युवतियॉ, सांझ ढलते पहुँचते, नृत्‍य एवं मनारंजन करते और फिर रात्रि भी वहीं गुजारते । ये एक प्रकार से युवा प्रशिक्षण गृह है । सबके काम बंटे हुए रहते हैं । 

आदिवासी जल, जंगल और जमीन के मालिक भी थे और रखवाले भी । न उन्‍हें दुनिया की फिक्र थी ओर न दुनिया को उनकी । 

उनके शांत जीवन में खलल पड़ने की शुरूयआत हुई नक्सलियों के आने से ।  तब के आंध्रप्रदेश और आज के तेलंगाना से नक्सलियों ने दक्षिण बस्‍तर में प्रवेश किया फिर बीजापुर के रास्‍ते अबूझमाड़ में घुसकर यहॉं सुरक्षित पनाहगार बना ली । सरकारों की जब तक नींद टूटती तब तक काफी विलंब हो चुका था । 

 

अब लम्‍बी कहानी का दूसरा भाग ....................

इसी आपाधापी में अबूझमाड़ में आश्रम शालायें खोलने का निर्णय हुआ । आश्रम शाला मतलब वहीं पढाई और निवास । पहली ऐसी आश्रम शाला अबूझमाड़ क्षेत्र के विकास खण्‍ड मुख्‍यालय ओरछा से बीस किलामीटर जंगल के अंदर ग्राम कोहकामेटा में खोले जाने की घोषणा हुई । तब समरूा आई कि कोई गुरूजी वहॉ जाने को तैयार ही नहीं थे ।

  अधिकारियों ने सोच-समझ कर ऐसे तीन शिक्षकों को ढूँड़ निकाला, जो कई वर्षों से बस्‍तर में अकेले रह रहे थे । 

इनमें से एक थे पं0 शिव प्रसाद शास्‍त्री, जो बलिया (उ0प्र0) के रहने वाले थे, अन्‍हें आनन-फानन में पदोन्‍नत कर कोहकामेटा आश्रम में प्रधानाध्‍यापक बनाया गया । सहयोगी के रूप  में रेवती रमन सिंह तथा बेनी प्रसद वर्मा को विशेष वेतनबृद्धि देकर शास्‍त्री जी के अधीन पदस्‍थ किया गया। संयोग से तीनों ही उत्तर प्रदेश के थे । रेवती रमन बनारस और बेनीप्रसाद मिर्जापुर जिले के रहवासी थे । 

तीनों ने अपने अधिकारियों से बहुत मिन्‍नतें की, हरेक तरह के बहाने बनाये । माता-पिता से लेकर पत्‍नी बच्चों की समस्‍यायें बताईं किन्‍तु अधिकारियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा । अधिकारी सारे तर्क काटकर यही कहते कि – “ आप लोग बस्‍तर मं पिछले आठ- नो सालों से अकेले ही तो रह रहे हो । क्‍या फर्क पड़ता है कि जगदलपुर के पास रहो या अबूझमाड़ में । सरकार तो अब ‘अबूझमाड़ क्षेत्र विशेष भत्‍ता’ भी दे रही है, तो वहॉ तो ड्योड़ा वेतन मिलेगा । आप आश्रम शुरू करा दीजिए, फिर दो-तीन वर्ष में मन चाहे स्‍थान पर भेज देंगे ।” 

विवश होकर तीनों ने आपस में सलाह- मशविरा किया । लाभ-हानि का गुणा- भाग लगाया । वेतन तो ड्योड़ा हो ही रहा है । खर्च वहॉ कुछ होना नहीं । आश्रम के राशन –पानी में अपना भी भोजन बनेगा । जंगल में किसी को देखने तो आना नहीं, तो एक - एक करके चार- चार माह अपने घर बितायेंगे ।  

जंगल में मंगल की बात जमते ही शास्‍त्री जी ने पंचांग निकारलकर शुभ मुहूर्त की गणना की और फिर तीना पहुँच गये अबूझमाड़ के प्रवेश द्वारा ओरछा विकास खण्‍ड मुख्‍यालय । 

ओरछा के बी.डी.ओ. परते साहब सहृदय अधिकारी थे । उन्‍होंने पूरा भरोसा दिलाया कि, उन लोगों की हर तरह की मदद की जायेगी । अपने मंडल संयोजक को बलाकर उन्‍होंने हिदायत दी कि वे गुरू जी के साथ कोहकामेटा और पूरी व्‍यवस्‍था कराकर ही वापस लौटें । 

अगले दिन योजना अनुसार तीनों गुरू जी, मण्‍डल संयोजक भास्‍कर और विकास खण्‍ड का चौकीदार मंडावी, सुबह- सुबह अबूझमाड़ के जंगल में प्रवेश कर गए । मंडावी को स्‍थनीय होने से क्षेत्र की अच्‍छी जानकारी थी और वह अबूझमाड़ियों की बोली भी समझता था और बोल भी लेता था । रास्‍ते भर मंडावी अबूझमाड़ के जंगल की अनेक किस्‍से कहानियॉं सुनात रहा । इससे रास्‍ता भी कटा रहा और सबका मनोरंजन भी हुआ । 

दोपहर उतरते – उतरते सभी  कोहकामेटा पहुँच गये । मंडावी ने गले से विचित्र सी तीखी आवाज निकाली तो गॉव के सभी बच्‍चे – बूढे, मर्द – औरतें वहां आकर इकट्ठे हो गये। 

मंडावी ने उन्‍हीं की बोली में सभी को समझाना शुरू किया कि सरकार यहाँ आश्रम शाला खोल रही है । छह से बारह वर्ष के सभी बच्‍चों को सरकार की ओर से नाश्‍ता, भोजन, पहनने, ओढ़ने – बिछाने के कपड़े, कॉपी- किताबें दी जायेंगी । पढ़ाने के लिए आये ये तीनों गुरू जी भी यहीं रहेंगे । तुम में से चार लोगों को सरकारी नौकरी भी दी जायेगी जो आश्रम के सभी काम करेंगे ।  

इसी समय भास्‍कर ने दस कलदार निकार कर मंडावी केा पकड़ा दिये । 

मंडावी ने वहाँ जुटे लोगों में से एक-एक करके दस लोगों को खड़ा किया और एक-एक कलदार देते हुए उन्‍हें समझाना शुरू किया “ यह आश्रम भवन बनाने का मेहनताना है । कल शाम तक इतना बड़ा घर बनाना है, जिसमें तीस बच्‍चे और ती गुरू जी अच्‍छे से रह सकें । समझ लो यहाँ के घोटुल से दुगने आकार का ।”

दूसरे दिन पूरा गाँव आश्रम बनाने में जुट गया । सांझ ढलते – ढलते आश्रम बनकर तैयार हो चुका था । 

मंडावी बड़ा मददगार साबित हो रहा था । असने तीस बच्‍चों को दूसरे ही दिन आश्रम में भर्ती करा‍ दिया । चार कर्मचारी भी उसने  छाँट लिए और सभी को ताकीद किया कि पूरी पगार तभी मिलेगी जब तीसों बच्‍चे यहीं आश्रम में रहकर पढ़ेगे । 

मंडावी को अबूझमाड़िया बहुत मानते थे । वह बरसात के दिनों में सबको बरसाती बांटता । गर्मियों में डिल्‍ले बाले नमक से भरी बोरियाँ घरों में रखवाता । ये सब सरकार की तरफ से आया करता था, लेकिन अबूझमाड़िया यही समझते कि मंडावी उनके सुख- दुख में सबसे बड़ा  मददगार है । 

भास्‍कर और मंडावी सभी व्‍यवस्‍थायें कराने के बाद दो दिन और रूके, फिर गुरू जी लोगों को आश्‍वस्‍त करते हुए कि वे जल्‍दी ही आवश्‍यकता की और सामग्री लेकर पुन: आयेंगे, वहाँ से रवाना हुए । 

जिस दिन भास्‍कर और मंडावी वापस गए, उस दिन तीनो गुरू जी बहुत उदास थे । बोली की अज्ञानता सबसे बड़ी बाधा थी । न वे बच्‍चों की बात समझ पा रहे थे और न बच्‍चे उनकी । शुरूआत इशारों – इशारों से हुई, तो बच्‍चे थोड़े खुलने लगे । 

शास्‍त्री जी अपना रेडियो – ट्रांजिस्‍टर लेकर आये थे कि जंगल में देश – दुनिया की खबरें जानने और मनोरंजन का वहीं एक मात्र सहारा होगा । पर बड़ी निराशा हुई कि यहाँ तो ध्‍वनि तरंगें आती ही नहीं थीं । 

रेवती रमण सिंह चाय के शौकीन थे । शक्‍कर और चाय पत्‍ती खूब सारी बांध लाये थे । पर यहाँ न तो दूध था और न नीबू ।

बेनी प्रसाद जी तम्‍बाखू खाने के आदी थे, जो लेकरक आये थे वह समाप्‍त हाने वाली थी, तो उनकी बैचेनी बढ़ने लगी । 

दूसरा महीना होने को आ रहा था । जरूरी सामग्री खतम हाने वाली थी, तो शास्‍त्री जी ने बी.डी.ओ. के नाम से चिट्ठी बनाई और आवश्‍यकताओं की सूची लगाते हुए आश्रम के चौकीदार पेमा को दिायत दी कि इसे ओरछा में मंडावी को देना और समान लेकर ही वापस आना । पेमा सिर्फ मंडावी को ही पहचानता था, सो वह रवाना हो गया । 

पेमा द्वारा लाई गई चिट्ठी मंडावी ने बी.डी.ओ. साहब को सौंपी तो उन्‍होंने तुरंत भास्‍कर को बुलाकर सूची सौंपते हुए सामग्रियों की वयवस्‍था कराने के निर्देश दिये । 

अगले दिन मंडावी पेमा और दो आदिवासी मजदूर राशन, लालटेन, केरोसीन, टाट- पट्टी, चादर, स्‍लेट –पट्टी, टीन की तीन कुसियाँ, चाय पत्‍ती बिस्किट, शक्‍कर, तम्‍बाकू, टॉर्च, बाल्‍टी मग आदि लेकर कोहकामेटा पहुँच गये । सामग्रियों के साथ बी.डी.ओ. साहब ने दो महत्‍वपूर्ण चीजें अपनी ओर से भिजवाई थीं । एक किताब जिसमें अबूझमाड़िया बोली के शब्‍दों का हिन्‍दी अर्थ और हिन्‍दी के शब्‍दों का अबूझमाड़िया बोली में अनुवाद तथा दूसरा ‘फर्स्‍ट –एड बॉक्‍स’ जिसमें दवाईयाँ थीं और कौर सी दवा किस बीमारी के लिए है, विवरण था । 

कुछ ही महीनो में तीनों गुरू जी न केबल अबूझमाड़िया बोली समझने लगे, बल्कि काम चलाऊ बोलने भी लगे थे । 

बच्‍चों में गुरू जी से भी अधिक परिवर्तन आ रहा था । वे अब हिन्‍दी अच्‍छी तरह से समझ भी लेते और बोल भी लेते । 

महीनों के साथ वर्ष भी गुजरने लगे । एक गुरू जी चार महीने के लिए घर जाते, वे लौटते तो दूसरे का क्रम आता और उसकी वापसी पर तीसरे का । जो लौटकर आता वह अपने साथ खूब सारा नाश्‍ता भी बाँध लाता । शतरंज, चौपड़, ताश के पत्‍ते मनोरंजन के साधन बनते । कुछ धार्मिक, साहित्यिक पुस्‍तकें पढ़ने और वार्तालाप का आधार रहतीं । 

बरसात के दिनों में कोहकामेटा दुनिया से पूरी तरह कट जाता । यहाँ तक कि पैदल भी ओरछा नहीं पहुँच पाते । नदियाँ-नाले सारे रास्‍ते रोक देते । ये चार महीने ईश्‍वर की मर्जी से गुजरते । चिट्ठी-पत्री तो आने की बात ही नहीं, यदि कुछ सामग्री कम पड़ जाये  तो उसकी पूर्ति भी संभव नहीं । सरकार की तरफ से इसीलिए बरसात के पहले हर घर में एक-एक बोरी नमक की रखवा दी जाती । बस्‍तर में सरसात के दिनों में सबसे ज्‍यादा मौतें होती थी , क्‍योंकि अधिकांश भाग टापू जैसा बन जाता था । 

हर बरसात में शास्‍त्री जी ईश्‍वर से यही प्रार्थना करते कि इनके आश्रम के कोई बच्‍चे बीमार न पड़े । यद्यपि ये बच्‍चे दिखने में भले दुबले-पतले थे, पर प्रतिरोधक शक्ति में मजबूत थे । इनकी सीघने की क्षमता भी अदभुत थी । इनके मस्तिस्‍क कोरी स्‍लेट के समान थे , जो समझा देा, वह मस्तिस्‍क में अंकित हो जाता । भाषा की पु‍स्‍तक हो या गणित के सवाल। सामान्‍य बच्‍चों की तुलना में कहीं जल्‍दी सीख जाते । गुरू जी लोगों को भी इन्‍हें पढ़ाने में आनंद आने लगा था । 

यहाँ रहते पाँचवा वर्ष प्रारंभ हो गया था । शिक्षकों की स्‍थानांतरण सूचियाँ भी किल चुकी थीं, तो तीना गुरू जी उदास हो चले थे कि जिला संयोजक ( डी.ओ.) ने उन्‍हें दिय गए आवश्‍वाशन को पूरा नहीं किया । यह भी पता चलार था कि पुराने डी.ओ. की जगह नए डी. ओ. आ चुके हैं । 

शास्‍त्री जी ने इस बार सोच रखा था कि बलिया लाते समय पहले जगदलपुर जाकर नए डी.ओ. साहब से भेंटकर पुन: प्रार्थना करेंगे कि वादे के मुताबिक जंगल से निकाल कर अब कहीं रोड साइड भेजें, किन्‍तु अपना सोचा हर समय कहाँ पूरा होता है । 

रेवती रमण सिंह के चार माह बाद लोटकर आने का समय निकल चुका था । शास्‍त्री जी रोज ही उनके वापस आने की प्रतीक्षा में दिन गिन रहे थे, कि एक दिन मंडावी अचानक दो टेलीग्राम  लेकर आ पहुँचा । एक टेलीग्राम रेवती रमण सिंह ने भेजा था, जिसमें पुत्र रत्‍न  की खुशी के साथ, माँ- बेटे दोनों को पीलिया होने से उनके वापस लौटने में विलंब होने का उललेख था । 

दूसरे टेलीग्राम बेनी प्रसाद के लिए था । उनके पिता के स्‍वर्गवास होने का दुखद समाचार था । सात दिन पहले हुई मृत्‍यु की सूचना अब प्राप्‍त हो रही थी । यह टेलीग्राम चार दिन नारायणपुर में और दो दिन ओरछा में पड़ा रहा था । 

शास्‍त्री जी ने, सुबक रहे बेनी गुरू जी को ढांढस बंधाया और उसी समय मंडावी के साथ आरक्षा के लिए रवाना कर दिया, ताकि त्रयोदशी के पूर्व वे घर पहुँच जायें । 

शास्‍त्री जी के लिए यह पहला अवसर था, जब वे बिल्‍कुल अकेले कोहकामेटा में रह गये थे । एक समय में दो जने रहते तो आपस में हँसते – बतियाते, पढ़ते – पढ़ाते समय कट ही जाया करता था । रात के अंधेरे में भी एक दूसरे से किस्‍से सुनते-सुनाते नींद आने तक गपशप होती रहती थी । पर अब अकेले रात कोटे नहीं कटती थी । दिन तो बच्‍चों के साथ किसी तरह गुजार लेते, फिर सांझ होते ही अंधेरा छा जाता । थोड़ी देर लालटेन की रोशनी रखते, फिर केरोसीन की किल्‍लत को देखते हुए उसे भी बुझाना पड़ता । घुप्‍प अंधेरे में जंगल से जानवरों और पक्षियों की आती आवाजें सन्‍नाटे को चीरती हुई सीधे कानों में पड़ती । अकर आश्रम में बच्‍चे और चौकीदार न होते तो चे एक रात भी वहाँ  नहीं काट पाते । 

कभी-कभी तो शास्‍त्री जी की पूरी रात जागते-जागते निकल जाती । सोचते रहते कि उनकी पत्‍नी और बच्‍चे कितनी किन्‍ता में होंगे । उन्‍हें अब तक खबर भी नहीं भेजी, कि क्‍यों नहीं पहुँच पा रहा हॅूं । हो सकता है, उधर से कोई पत्र उन्‍होंने भेजा भी हो, तो पड़ा होगा, नारायणपुर या ओरछा में । 

एक रात शास्‍त्री जी को अजीब-अजीब डरावने सपने आये । उन्‍होंने तय कर लिया कि कल घर के लिए प्रस्‍थान करेंगे । पर सुबह उन्‍हें तेज बुखार आ गया । सभी बच्‍चे गुरू जी की सेवा में जुट गए तो वे भावुक हो गए, उनकी आँखों में आँसू आ गए । पाँच साल से इन बच्‍चों को अपने बच्‍चों तरह बड़ा किया है, इन्‍हें ऐसे लावारिस छोड़कर नहीं जाया जा सकता । 

पेमा सुबह से ही कहीं निकल गया था। लौटा तो कोई जड़ी-बूटी और ताजी सल्‍फी लाया था । शास्‍त्री जी ने आज तक कोई नशा नहीं किया था, सुन जरूर रखा कि कि सूर्योदय के पहले की सल्‍फी ऑनिक का काम करती है । पेमा के आग्रह पर उन्‍होंने जड़ी – बूटी के साथ सल्‍फी पी ली । आश्‍चर्य कि शाम होते –होते वे पूरी तरह स्‍वस्‍थ हो गए । अब तो शास्‍त्री जी रोज टॉनिक लेने को शौक लग या । जिस दिन टॉनिक नहीं मिलता वे बैचेन हो जाते ।  यह शौक कब नशे की लत में तब्‍दील हो गया, उन्‍हें पता ही नहीं चला । अब तो दिन ढलते ही वे छककर सल्‍फी पी लेते तो रात कैसी कटी, उन्‍हें पता ही नहीं चलता । पेमा अब साथ में कंपनी देने लगा था । कभी-कभी वह अंडे और चिकिन भी ले आता । देखते –देखते शास्‍त्री जी  शाकाहारी से मांसाहारी बन गए । 

जाडों की ऐसी ही एक अंधेरी रात में शास्‍त्री जी मदहोशी की हालत में बिस्‍तर पर लेटे ही थे कि किसी ने उनके चेहरे पर टॉर्च की रोशनी फेंकी । थोड़ी ही देर में सात – आठ टार्च और चमकने लगीं । उनका नशा काफूर हो गया । वे उठकर बैठ गए । उन्‍हें समझते देर नहीं लगी कि ‘दादा लोग ’ आ गए हैं । ( नक्‍सलियों को तब दादा के ना से जाना जाने लगा था ) उनमें से एक टूटी –फूटी हिन्‍दी बोल रहा था और बाकी तेलगू । सभी पुलिस जैसी वर्दी पहने हुए बंदूकों और तमंचों से लैस थे । 

हिन्‍दी बोलने वाले ने शास्‍त्री जी को शिवप्रसाद के नाम से संबोधित किया और चेतावनी दी कि कभी भी, किसी को यह पता नहीं चलना चाहिए कि हम लोग रात यहाँ रूके थे । उन लोगों ने आश्रम के राशन से खाना पकाया खाया । सुबह होने के पहले वे अदृश्‍य हो गये । 

उस रात से शास्‍त्री जी बेहद डर गये थे । रात-बेरात चौंक कर उठ जाते । दिन में बच्‍चों को पढ़ाते- पढ़ाते गुमसुम हो जाते, कहीं दूसरी दुनिया में खो जाते । घर की याद करके बुदबुदाते र‍हते । कभी रेवती रमन और बेनी प्रसाद के लिए गालियाँ भी बक देते । 

आश्रम के कर्मचारी और बच्‍चे कानाफूसी करते कि “बड़े गुरू जी पगला गए हैं।”

पेमा एक दिन गुनिया – ओझा को ले आया । उसने झाड़-फूक भी की पर कुछ असर नहीं हुआ । 

मार्च महीने की एक दोपहर वे बच्‍चों के साथ भोजन करके उठे ही थे कि तभी एक जिप्‍सी आश्रम के बाहर आकर रूकी । जंगल में बच्‍चों ने पहली बार जिप्‍सी देखी थी, सो सभी दौड़कर बाहर निकल गए । शास्‍त्री जी भी बच्‍चों के पीछे-पीछे पहुँच गए । धूप का चश्‍मा लगाये कोई साहब आगे की सीट से उतरते कि, उसके पहले जिप्‍सी में पीछे बैठे दो-तीन लोग फुर्ती से उतरकर आगे आ गए । उसमें से एक ने आगे की सीट का दरवाजा खोला । शास्‍त्री जी को समझते देर नहीं लगी कि कोई बड़े साहब होंगे । उन्‍होंने आगे बढ़कर दोनो हाथ जोड़ प्रणाम किया, तो सारे बच्‍चों ने एक स्‍वर में उद् घोष किया ‘नमस्‍ते सर’ ! 

आने वालों के साथ मंडावी भी आया था । उसने दौड़कर शास्‍त्री जी के पास आकर कान में कहा – “ भोपाल से आदिवासी विकास विभाग के डायरेक्‍टर आये हैं । ”

शास्‍त्री जी को अपने कानों पर विश्‍वास ही नहीं हुआ कि जिस आश्रम में  पाँच वर्षों से जिले तो क्‍या ब्‍लॉक तक से अधिकारी नहीं आये, वहाँ इतनी दूर से सबसे बड़े अधिकारी आ सकते हैं । 

घने जंगल के बीच बने आश्रम के तीस बच्‍चों को साफ-सुधरे गणवेष में देखकर और समवेत स्‍वर में ‘ नमस्‍ते सर ’ सुनकर डायरेक्‍टर साहब बेहद खुश हुए । उन्‍होंने अपने कैमरे से बच्‍चों की तस्वीरें खीचीं, फिर आश्रम में प्रवेश किया । अंदर की साफ-सफाई से भी वे संतुष्‍ट लगे । उन्‍होंने एक-एक करके सभी बच्‍चों से भाषा की किताब पढ़वाई तथा गणित के प्रश्‍न हल करवाये । सभी बच्‍चों ने जब सही-सही किया तो बच्‍चों शाबाशी देते हुए उन्‍होंने शास्‍त्री जी की पीठ थपथपाई ।

कुर्सी पर आसन ग्रहण करते हुए उन्‍होंने शास्‍त्री जी से पूछा – 

“ कहाँ के रहने वाले हैं शास्‍त्री जी ? ”

“ सर ! मैं उत्‍तर प्रदेश के बलिया जिले का रहने वाला हूँ । ”

“ कब से हैं, यहाँ पर ? ”

“ सर ! पाँचवां वर्ष पूरा हो रहा है । इसके पहले नौ वर्ष तक जगदलपुर के पास  नगरनार में था । ”

“ इस अधिकारियों को जानते हैं ? ” उन्‍होंने दोनों खड़े अधिकारियों की ओर इशारा किया । 

  शास्‍त्री जी ने नकारात्‍मक सिर हिलाया तो डायरेक्‍टर साहब बोले – 

“ ये आपके जिले के डी.ओ. त्रिपाठी जी और ये आपके ओरछा विकास खण्‍ड के बी.डी.ओ. विजयवर्गीय हैं । ” दोनों अधिकारी शर्मिन्‍दा हो बगलें झांकने लगे । 

“ सर ! इनसे पहले वाले डी. ओ. साहब और बी. डी.ओ. साहब को जानता था । उन्‍होंने ही हम लोगों को आश्रम की स्‍थापना करने हेतु यहाँ भेजा था । ”

“ कितने शिक्षक हैं यहाँ ? और शिक्षक कहाँ हैं ?”

शास्‍त्री जी सकपकाये से कुछ देर खड़े रहे तो मंडावी बोल पड़ा- 

“ इन्‍हें मिलाकर तीन गुरू जी हैा यहाँ । ”

“ शास्‍त्री जी, क्‍या दोनों शिक्षक अवकाश पर हैं ? कब तक के लिए अवकाश पर गये है?”

  शास्‍त्री जी बिना उदत्‍तर दिए फिर शांत खड़े रह जाते हैं । तभी डी.ओ. साहब आश्रम के तीन –चार रजिस्‍टर स्‍वयं पलटने लगते हैं , तो उसमें पुरानी तिथि डले दोनों शिक्षकों के आवेदन और दो टेलीग्राम मिल जाते हैं । डायरेक्‍टर साहब इन्‍हें देखते ही सारी स्थिति भाँप लेते हैं । वे मंडावी से कहते हैं कि सभी बच्‍चों केा बाहर से जाकर गाड़ी में रखे केले और बिस्किट बाँट दे । 

बच्‍चों के जाने के बाद वे शास्‍त्री जी से बड़ी आत्‍मीयता से पूछते हैं कि – “आपने अपने दोनों शिक्षकों को तो जाने दिया, पर आप कब से अपने घर नहीं गये ?”

दुखती रग पर जैसे किसी ने हाथ रख दिया हो, हमदर्दी भरे शब्‍दों को सुनते ही शास्‍त्री जी ने बोलना शुरू किया – 

“ सर ! पिछले नौ महीने से मेरा, अपने परिवार से कोई संपर्क नहीं हुआ है । घर से कोई चिट्ठी पत्री आई भी होगी, तो वह या तो नारायणपुर में पड़ी होगी या ओरछा में । पहले वाले बी.डी.ओ. साहब तार या चिट्ठी आने पर मंडावी से तुरंत भिजवा दिया करते थे । मैंने भी दो तीन बार पेमा को ओरछा भेजा था, पर वह खली हाथ लौटा ! दोनों शिक्षकों के लौटने का प्रतिदिन इंतजार करता हॅूं कि दानों में से कोई तो आये, तो मैं घर जा सकूँ ।  आश्रम के इन बच्चों को मैंने अपने बच्चों की तरह बड़ा किया है । इन्‍हें कैसे लावारिस छोड़कर चला जाऊँ ।

आप विभाग के गार्जियन हैं । आपसे कुछ भी क्‍या छिपाना । यहाँ मेरे सब धर्म भ्रष्‍ट हो गये हैं । मैं मास –मछली  खाने लगा हॅूं, मदिरापान करने लागा हॅूं । जबकि मै बलिया के प्रकाण्‍ड ज्‍योतिषाचार्य रमाशंकर शास्‍त्री का पुत्र हॅूं । मेरे परिवार का वहाँ बड़ा सम्‍मान है । 

मैं सच कहता हूँ , यहाँ बिना नशा किए जिंदा नहीं रहा जा सकता । शाम के पाँच बजते-बजते यहाँ अंधेरा छा जाता है । चौदह घंटो की रात होती है यहाँ । केरोसीन मिलता नहीं, तो लालटेन भी जला कर नहीं रख सकते । आस-पास कोई है नहीं, जिससे सुख-दुख की दो बात कर सकें । न यहाँ रेडियो बजता है, न अखबार आता है । दुनिया से कटा हुआ इंसान कितने दिन पागल हुए बिना जिंदा रह सकता है । मैं भी पागल हो ही गया था । बच्‍चे भी कहने लगे थे कि बड़े गुरू जी पगला गए हैं ।”

फिर फुसफुसाते हुए धीमी आवाज में बोले – 

“ यहाँ दादा लोगों की निगाह सब पर रहती है । गलत काम करने वालों को वे बख्‍शते नहीं ।  उनकी दहशत में रात –रात भर नींद नहीं आती । जंगली जानवरों, साँप – बिच्छुओं से उतना भय नहीं लगता, जितना दादा लोगों की बंदूकों से ।”

डायरेक्‍टर साहब काफी देर तक चिंतामग्न रहे, फिर पूरी सहानुभूति दर्शाते हुए बोले- “ शास्‍त्री जी आपका कोई धर्म भ्रष्‍ट नहीं हुआ है । मांस – मछली खाने या मदिरापान करने से किसी का धर्म भ्रष्‍ट नहीं होता । धर्म, भ्रष्‍ट तब होता जब आप अपने कर्त्‍तव्‍यों का सही ढंग से पालन नहीं कर रहे होते । आपने इन बच्‍चों को जो ज्ञान दिया है, वह धर्म पथ पर चलने वाला व्‍यक्ति ही दे सकता है । इन बच्‍चों के लिए आपने जो त्‍याग किया है, वह भी कोई धर्म पुरूष ही  कर सकता है । ”

अब आगे की पढ़ाई के लिए इन बच्‍चों को नारायणपुर में प्रवेश दिलाना होगा । ये काम तभी आसानी से होगा, जब आप भी इनके साथ वहाँ रहेंगे । डी.ओ. साहब जाते ही आपके लिए आदेश भेजेंगे, और अब आप माध्‍यमिक आश्रम शाला नारायणपुर के प्रधानाध्‍यापक होंगे । नारायणपुर बड़ी जगह है । तहसील मुख्‍यालय है । वहाँ रेडियो भी  बजता है और अखबार भी मिलता है । 

इन बच्‍चों के आठवीं उत्‍तीर्ण कर लेने पर आपको तो श्रेय मिलेगा ही, विभाग को अबूझमाड़ में काम करने के लिए तीस शिक्षक मिल जायेंगे । ( बस्‍तर में उस समय आदिवासी समुदाय के आठवीं पास उम्‍मीदवारों को शिक्षक बना दिया जाता था ) 

प्रस्‍थान के लिए उठते हुए डायरेक्‍टर साहब ने जब शास्‍त्री जी के कंधे पर हाथ रखा, तो फिर से उनकी आँखें छलक पड़ी । अबकी वार के आँसू खुशी के आँसू थे । 

अगले दिन प्रात: काल जब शास्‍त्री जी ने आश्रम से निकलकर सूर्य देवता को नमन किया, तो देखा कि अरूणोदय की लालिमा से पूरा वन उल्‍लासित हो रहा है, ऐसा मनोहारी दृश्‍य देख वे रोमांचित हो उठे । 

 

 

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डॉ. आर.एस. खरे

डॉ. आर.एस. खरे

जन्म तिथि- 15.04.1951

जन्म स्थान- टीकमगढ़ (म.प्र.) 

शिक्षा- एम.एस.सी. (वनस्पति विज्ञान)

एम.एड., पी.एच.डी. (शिक्षा)

शासकीय सेवा के प्रारंभिक वर्षों में व्याख्याता पद पर, तत्पश्चात् म.प्र. लोक सेवा आयोग से चयनित होने पर विभिन्न आदिवासी जिलों- सीधी, बैतूल, धार, झाबुआ, बस्तर, सरगुजा, इंदौर में जिला संयोजक, सहायक आयुक्त, उपायुक्त,

अपर आयुक्त आदिवासी विकास भोपाल के पद से अप्रैल 2011 में सेवा निवृत्त

एक वर्ष नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण में अपर संचालक पुनर्वास के पद पर संविदा नियुक्ति

2012 से 2017 पाँच वर्ष संत हिरदाराम कन्या महाविद्यालय बैरागढ़ में शिक्षा संकाय में विभागाध्यक्ष

वर्ष 1971-72 से व्यंग्य लेखन प्रारंभ किया| कुछ रचनाएँ 1972 से 74 के मध्य 'धर्मयुग', 'साप्ताहिक हिंदुस्तान' पत्रिका में प्रकाशित हुईं|

पिछले तीन वर्षों में पुनः लेखन प्रारंभ किया|

कुछ कहानियाँ- 'अक्षरा', 'सरिता', 'शिखर वार्ता' तथा 'स्पुतनिक' में प्रकाशित

कुछ व्यंग्य- 'व्यंग्य यात्रा', 'सरिता', 'अट्टहास' तथा 'स्पुतनिक' में प्रकशित 


डॉ0 आर0 एस0 खरे

11, सियाराम परिसर

सौम्या एनक्लेव, चूना-भट्टी 

भोपाल- 462016

07552420130/9827267006