सीमा व्यास  की  चुनिन्दा  लघुकथाएँ

सीमा व्यास की चुनिन्दा लघुकथाएँ

मीडियावाला.इन।

 लघुकथाएँ

1. परमानंद 

 

एयरपोर्ट पर खड़े विमान ने कुछ दूर खड़ी बस से कहा,' मैं तो यहाँ खड़े - खड़े बोर हो गई। तुम कैसे रह लेती हो एक ही जगह ? '

'जहाँ मन रमता हो वहाँ बोरियत कैसी ? मुझे तो जड़ यानी जमीन से जुड़े रहने का एहसास सदा खुशी देता है।' बड़ी तसल्ली से बस बोली।

' एक बार मेरी तरह बाहर की दुनिया देखो। उसकी चकाचौंध, रंगीनियाँ और बहारें तुम्हें भी खींच लेगी।'

' कभी नहीं। क्योंकि  मेरी दुनिया में शांति है, प्रेम है , खुशियाँ है , सुकून है।'

' अरे, एक बार उड़ो तो। दुनिया बदल ही जाएगी। तुम्हारे पैर .. मेरा मतलब है पहिए जमीन पर नहीं टिकेंगे।' 

' कितने दिन ? तमाम उम्र  भागदौड़ के बाद अंत में तो तुम भी यहीं आओगी। मेरे पास । जमीन से जुड़कर अंतिम दिन बिताने।'

' हाँ, वह तो मेरी मजबूरी होगी।'

' बस यही, मैं मजबूर होकर नहीं मजबूत बनकर जीवन बिताना चाहती हूँ। इसलिए जहाँ हूँ, खुश हूँ..बहुत खुश।'

पास ही खड़ा प्रौढ़ सफाईकर्मी मुस्कुरा उठा। उसे लगा वह अपने युवा बेटे से वार्तालाप कर रहा हो।

 

2. 

सुपर ओवर

 

कंपनी में मैनेजर का पद एक रिक्त था और दावेदार थीं दो। दोनों अपने कार्य में कुशल। कार्य समय पर और गुणवत्तापूर्ण करने में माहिर। पर दोनों के तरीके में बहुत भिन्नता थी। अलका जहाँ दोस्तों की मदद और गूगल से कॉपी पेस्ट करके प्रोजेक्ट पूरा करती ,वहीं वसुधा नई फाइल का कोरा पेज खोलकर शुरूआत करती। निश्चित रूप से वसुधा को अपने कार्य को अधिक समय देना होता था और मेहनत भी अधिक लगती। जबकि अलका सबकी मदद से कार्य समयपूर्व कर लेती और बचे समय में सबको मदद का नज़राना यानी पार्टी भी दे देती। 

डायरेक्टर योग्य को ही पद देना चाहते थे और पदोन्नति में पूरी पारदर्शिता भी रखना चाहते थे। उन्होंने सबके सामने दोनों को एक -एक प्रोजेक्ट दिया। और कहा कि,'आप दोनों को एक हफ्ते में यह प्रोजेक्ट पूरा करके प्रस्तुत करना है। जो सफल होगा, मैनेजर का पद उसी को मिलेगा।'

डायरेक्टर ने कानोंकान खबर न होने दी कि दोनों को समान प्रोजेक्ट दिया गया है। दोनों दावेदार अपने - अपने तरीके से काम पर लग गई। वसुधा ने समय और मेहनत बढ़ाई तो अलका ने मदद करने पर दोस्तों को फाइव स्टार होटल में पार्टी का वादा किया।

आश्चर्यजनक रूप से दोनों ने तय समय में प्रोजेक्ट पूर्ण कर लिया। गुणवत्ता भी समान। सबके मन में एक सवाल,'अब मैनेजर का पद किसे मिलेगा ?'

डायरेक्टर ने लंच के बाद बैठक में सभी कर्मचारियों को बुलाया। कहा,'अब मैनेजर के पदाधिकारी का चयन आप सभी करेंगे। दोनों काबिल इंजीनियर अपने प्रोजेक्ट बनाने की प्रक्रिया से संबंधित पाँच -पाँच प्रश्न एक -दूसरे से पूछें। जिसके उत्तरों से सभी संतुष्ट हों,  उसे ही सबकी सहमति से मैनेजर पद पर नियुक्त किया जाएगा।'

दूध का दूध और पानी का पानी होते देर नहीं लगी।  शाम को वसुधा के हाथ में पदोन्नति का आदेश लहरा रहा था।

 

3. पापा के लिए 

 

'पापा … आज माँ बन जाओ न !'

'अरे बेटा,  जबसे माँ भगवान के पास गई हैं  मैं रोज ही तो माँ बनता हूँ तुम्हारे लिए।'

'जानता हूँ पापा , सुबह माँ और शाम को पापा। '

और रात में फिर माँ , है न ?'

'हाँ पापा , पर आज तो संडे है।  प्लीज़ आज  दिन में भी माँ बन जाओ न !'

'ओके,  बन गया माँ।  बताओ तो क्या काम है माँ से ?'

' माँ , आज फादर्स डे है न , पापा को सरप्राइज गिफ्ट देना है। मेरी गुल्लक के पैसे कम पड़े  रहे है तो प्लीज़------और जरा देर मेरे साथ बाजार चलोगी ?'

 

4. आदमी का बीज 

 

' और कब तक पड़े रहोगे ? अब इन बूढ़ी हड्डियों में इतना दम नहीं कि तुम्हारे साथ तीन और का पेट पाल सकूँ। कसर थी तो पीना सीख गया गलत संगत में। सूरज चढ़ आएगा पर इनकी चढ़ी नहीं उतरेगी। लानत है ऐसी जिंदगी पर।'  बाबा गुस्से से तमतमाते हुए बाड़े की ओर चले गए।

 बेबस खड़ी बहू चुपचाप चाय बनाने चली गई। पोती को चाय थमाकर बाबा को देनेवाला के लिए कहा। पोती बाबा का मन ठीक करने के लिए बातें करने लगी। 

'आप क्या कर रहे हो बाबा ?'

' गेहूँ छान रहा हूँ। बीज के लिए।'

'छानने से क्या होगा ?'

' इससे अच्छे, स्वस्थ बीज ऊपर आ जाएँगे। काने, सुले नीचे गिर जाएँगे। इन अच्छे बीजों को बोएँगे तो फसल बढ़िया होगी।'

' तब सड़े पौधे नहीं उगेंगे ?'

'नहीं तो । कैसे उगेंगे ? बीज बढ़िया होगा तो।'

' बाबा, आदमी के बीज का छन्ना नहीं होता क्या ?'

 

5. शांति 

 

बंद दुकान में पड़े पड़े  झंडे कुनमुना रहे थे। एक रंग का झंडा बोला,' भोत हो गई भिया। तड़प रिये हैं जोशीले युवाओं के हाथों में जाने को। हम यूँ पड़े रहेंगे तो अपनेवाले जोश और ताकत दिखाएँगे कैसे ? अपने नेताओं को मुद्दा कैसे मिलेगा ?'

दूसरे रंगवाला कसमसाते हुए बोला,' हमें कम मत समझो। हम भी बैचेन हो रहे हैं। रैली, नारों के बिना क्या जीना ? हमारे युवा तुमसे ज्यादा हैं और मुद्दे देना हम भी जानते हैं।'

बड़े बंडल में बंधा तीन रंगोंवाला झंडा बोला,' हरदम क्यों लड़ते रहते हो ? मैं अभी तो  विवश हूँ, वरना मुझे हाथ में लेते ही जो उत्साह ,उमंग उठती है न, उससे युवा तो क्या बच्चे बूढ़े सब खुशी से नाच उठते हैं। मुझे थामने तुमसे चारगुना हाथ आगे आते हैं। वो भी नफरत के नहीं प्रेम के भाव लेकर।'

कोने से चुपचाप सुन रहा सफेद थान तेजी से आगे आते हुए बोला,' पितामह भीष्म की तरह विवशता दिखाओगे तो परिणाम विनाश ही होगा। मुझे ही बीच में बराबरी से फँसकर इनका रूप बदलना होगा। जब सब तुम्हारी तरह होंगे तो कोई विवाद ही नहीं।' 

सफेद थान उचककर दोनों के बीच में ठँस गया।

 

6. नजरिया

 

'कोई पेट से दुख लेकर थोड़े ही आता है।' गहरी होती रात में दीवार की ओर करवट से लेटी बुढ़िया ने बल्ब की हल्की पीली रोशनी में बीते समय को पढ़ते हुए कहा। 

दूसरी करवट लेटे खिड़की से आधा चाँद निहारते बूढ़े ने कहा,'सुख लेकर भी तो नहीं आता।'

'पहले पहल की लड़की इसी घर में हुई।'

'हाँ, शादी के बाद पाँच साल से लटका बाँझ का बोझ हटा दिया तेरे सिर से।'

'फिर छोरा भी तो आया पीठ लगे।'

'तो कुलदीपक भी तू ही तो माँगती थी।'

'छोरी तो होती ही है पराया धन। पर अपना  छोरा भी ..'

'अरे, तू ही व्रत रखती थी खाने कमाने लग जाए। अब बाहर तो जाएगा ही।'

' हाँ, बहू पोते से भी आस न रखूं क्या ?'

' आस ही तो दुख का मूल है। बच्चों की खुशी से तो हम खुश हैं। काहे का दुख ? '

'तुम्हें कोई दुख नहीं ?'

' नहीं। सुख और दुख में तो बस अनुभव करने का भेद है।कोई न दुख लेकर आता है न सुख लेकर जाता है।'

बूढ़े की बात पर विचार करती बुढ़िया ने धीरे से करवट चाँद की ओर कर ली।

 

सीमा व्यास 

 

0 comments      

Add Comment