बाल साहित्य:मूंगफली के दाने

बाल साहित्य:मूंगफली के दाने

मीडियावाला.इन।

  बहुत सारी मूंगफली एक कमरे में पड़ी हुई थीं कुछ बड़ी,कुछ बहुत बड़ी, कुछ छोटी तो कुछ बिल्कुल छोटी,  ....किसी में पाँचदाने, किसी में चार, किसी में तीन ,किसी में दो दाने थे। वे सब दाने आपस में बात करके बहुत मस्ती करते, किंतु एक छोटी सी मूंगफली थी,उसमें केवल एक दाना था, इसलिए उसका नाम इकलौती था। वह चुपचाप बैठी इन लोगों की बातें सुनती रहती। उसे बहुत बुरा लगता कि  उसके साथ बात करने वाला कोई नहीं है।मूँगफली के  दाने जब आपस में कहते कि हम लोग कितने अच्छे से  साथ में रहते हैं , कितना खेलते हैं..,यह  सुनकर इकलौती मूँगफली उदास हो जाती और अपनी बहनों से मिलने को व्याकुल हो उठती। एक दिन सबसे बड़ी मूंगफली ने किसान को बोलते हुए सुना कि 'अब मूंगफली को  शहर जाकर बेच आएंगे।'वह खुशी के मारे सबको चीख-चीखकर बताने लगी कि अब हम सब घूमने जाने वाले हैं।फिर क्या था......सब बेसब्री से इंतजार करने लगीं। दो दिन बाद ही एक बड़ी सी गाड़ी आई ,सभी मूंगफली को बोरी में भरकर गाड़ी में रख दिया गया।  एक मूंगफली ने दूसरी से पूछा "अच्छा बताओ हमलोग कहाँ जा रहे हैं ?" "अरे हम सब पिकनिक पर जा रहे हैं."... मध्यम आकार की मूंगफली ने कुछ जोर से उचकते हुए कहा।तभी सबसे बड़ी मूँगफली ने  अपनी भारी- भरकम आवाज में कहा "तुमलोगों को पता है ...जब हम इस  बड़ी सी गाड़ी में बैठकर शहर के लिए निकलेंगे तो हमें रास्ते भर खूब तरह -तरह की  नयी- नयी  आवाजें  सुनने को मिलेंगी;ट्रक की, कार की ,स्कूटर की चीं -चीं पों- पों सुनाई पड़ेगी ,कितना मज़ा आएगा और शहर पहुँचकर तो हमसबको  खुले में फैला दिया  जाएगा... "एक दुबली- पतली मूँगफली ने दबे स्वर में कहा --"और उसके बाद फिर हम सब बिछड़ जाएंगे" इतना कहते-कहते वह उदास हो गई।

 

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         " अरे...उदास होने की कोई बात नहीं..... तुम्हें पता है ...वहां बहुत सारे लोग आएंगे , उन्हीं में से कोई हमें अपने घर ले जाएगा बहुत संभाल कर हमें रखेगा,फिर एक दिन हमारा ऊपर का छिलका अपने हाथों से उतारेगा, हमारी सुन्दर -सुन्दर गुलाबी रंगत उनको मोह लेगी,फिर हमें प्यार से,हिफाजत से रखा जाएगा। सब लोग कहते हैं कि मूंगफली में प्रोटीन होता है ।तुमलोगों को पता है जो मूंगफली खाता है, उसको बहुत प्रोटीन मिलता है।"यह सब सुनकर इकलौती मूँगफली गहरी सोच में डूब गयी उसे यही दुख सता रहा था  कि वह अभी तक किसी से मिल ही नहीं ,बात भी नहीं कर पाई ।कब वह दिन आएगा जब मुझे छीला जाएगा ....और मैं अपनी बहनों से मिल पाऊँगी ।" वह उस क्षण का इंतजार बेसब्री से करने लगी  और मन ही मन कल्पना करके खुश होने लगी कि तब कितना मजा आएगा...।तभी गाड़ी स्टार्ट हुई और धीरे धीरे चल दी।पक्की सडक़ पर आते ही गाड़ी की रफ्तार तेज हो गई, वे सब बैठे बैठे ही हिल- डुल रही थी, कूद रही थी,हँस रहीं थीं और बातें भी कर रही थी ।
               पूरे सात घंटे बाद वे मंडी पहुंँच गयीं। एक बड़ी सी जगह में उनको फैलाकर  रखा गया। बहुत तेज धूप थी,ठंड में उनकीअच्छी सिकाई हो रही थी। वे गरम-गरम सी हो गई थी ।गर्माहट पाकर उनका सोने का मन कर रहा था ।वे कभी ऊँघती तो कभी हल्ले गुल्ले से उठ बैठतीं। तरह -तरह की आवाजें उनके कानों में पड़ रहीं थीं।तभी वहाँ कुछ लोग उनके समीप  आए , उन्हें छू -छूकर देखने लगे फिर उनमें से कुछ मूँगफलियों को खरीद लिया गया। वे फिर बोरी में आ गई। वह व्यक्ति उनको अपने घर ले गया ।उनके साफ- सुथरे घर में मूँगफलियों को बहुत अच्छा लगने लगा,बहुत से लोगों  की आवाजें सुनाई पड़ती रहतीं। फिर क ई दिन बाद एक पति -पत्नी आये और बची हुई सारी मूंगफली मंडी से खरीद कर अपने घर ले गये और तब वह, छोटी इकलौती मूँगफली भी उनके साथ उनके घर पहुंच गई। उस घर में बहुत सारे बच्चे थे, वे दौड़ -दौड़कर खेलते थे,  चिल्लाते  थे ,तो उनकी आवाज सुनकर इकलौती को बहुत अच्छा लगता ।एक दिन घर में बहुत चहल -पहल थी ,तभी बोरी खोली गई, सारी मूँगफली बिखर गई ,उस घर के सुन्दर चिकने से फर्श में वे फिसली चली  जा रही थीं,  वे एक दूसरे के ऊपर गिरतीं और खिलखिला पड़तीं।उन्हें बहुत मजा आ रहा था।अब एक- एक करके सारी मूंगफलियों को छीला गया।इकलौती मूँगफली की खुशी का ठिकाना नहीं रहा.....उसे अपनी बहुत सारी-बहनें मिल गयीं.... सब उसके जैसी सुन्दर गुलाबी -गुलाबी रंग की थीं।वह उनको छूकर देखती ,फिर उनसे प्यार से लिपट जाती। कुछ देर बाद उन सबको नये चमचमाते कनस्तर में रख दिया गया।  इकलौती अपनी बहनों के साथ  खूब खेलती, कूदती ,बातें करती,इस नये घर में इकलौती अब  बहुत खुश थी।।  

 

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                                                               ‌ एकदिन किसी ने कनस्तर खोला ,थोड़ी मूँगफली निकाल लीं....फिर तीन दिन बाद थोड़ी मूंगफलीऔर निकाल लीं गयीं।इकलौती मूँगफली उदास होकर सोचने लगी कि  बहुत दिनों बाद तो तो मैं अपनी बहनों से मिल पाईं हूं और अब मेरी धीरे-धीरे  मेरी बहनें कम होती जा रही हैं,वह मायूस हो गई ।कुछ देर बाद अपनी पास वाली बहन से मुँह लटकाकर बोली ..." मुझे तुम सबके साथ रहना है।न मुझे कहीं जाना है न तुमलोग कहीं जाओ"।उसको दुःखी देखकर एक समझदार मूँगफली ने कहा.."अच्छा ठीक है, जब कोई लेने आएगा तो हम तुम्हें नीचे कर देंगे।"
            अब जब भी कनस्तर खुलने की आहट होती तो सब मूंगफली मिलकर इकलौती को नीचे की तरफ कर देतीं।धीरे धीरे मूँगफली कम होती गई  और इकलौती सबसे नीचे आ गई।अंततः केवल आठ -दस मूँगफली ही बचीं ।
                मौसम बदल रहा था ,हल्की बारिश होने लगी थी, तो एक दिन किसी ने कनस्तर खोलकर बची हुई वे आठ -दस मूँगफली बगीचे में डाल दीं।किसी दाने को गिलहरी ले गई तो,किसी को चिड़िया परन्तु इकलौती मूँगफली एक कोने में पड़ी रही ,एक दिन अचानक पानी गिरने लगा तो  वह मिट्टी के अंदर धंस गई।कुछ दिनों बाद जब धूप निकली तो वह बीच से फट गई ,उसके अंदर से सफेद सी नाजुक सी एक डंडी निकलकर मिट्टी से बाहर आ गई ,एक-दो दिन बाद उसमें कोमल- कोमल ,हरे- हरे पत्ते निकलने लगे,इकलौती तो खुश थी ही,उस घर के सब बच्चे भी उसको देखकर बहुत खुश हो रहे थे । वे सब ताली बजा -बजाकर हँसते।कुछ समय बाद मिट्टी के अंदर  बहुत- बहुत सारी मूँगफली धीरे -धीरे बढ़ने लगीं। अब इकलौती का बहुत बड़ा परिवार था।अब वह इकलौती नहीं थी।

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शीला मिश्रा

 बाल साहित्यकार