
कालिदास का रघुवंश और रामकथा
रामकथा के कई रूप मिलते हैं। कुछ तो ऐसे हैं, जो आपस में टकराते रहते हैं। रामकथा को लेकर कवियों ने इतनी छूट ले ली है, कि अब मूल कथानक का पता ही नहीं चलता। संस्कृत साहित्य में भास और भवभूति ने इस क्षेत्र में सर्वाधिक प्रयोग किये। कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत के अकेले कवि हैं, जिन्होंने रघुवंश लिखा, लेकिन राम को लेकर वाल्मीकि का अनुशासन टूटने नहीं दिया। कालिदास परम्परा के पोषक हैं। वे यह जानते हैं कि राम के चरित्र में ऊँच-नीच हो ही नहीं सकती। ‘रामायण’ एक ऋषि का देखा हुआ सत्य है, उसमें घट-बढ़ करना पाप को निमंत्रित करना है।
रघुवंश महाकवि कालिदास का अप्रतिम महाकाव्य है। संस्कृत के महाकाव्यों की वृहत्रयी में रघुवंश नहीं है, लेकिन वे तीनों अर्थात् किरातार्जुनीय, शिशुपालवध और नैषधीयचरित मिलकर भी रघुवंश के बराबर नहीं बैठते। रघुवंश भारतीय साहित्य और संस्कृति का उच्चतम स्वर्ण कलश है। कालिदास ने यह महाकाव्य बहुत श्रद्धापूर्वक लिखा है। संस्कृत में वाल्मीकि रामायण के होते हुए भी कालिदास को रघुवंश लिखने की आवश्यकता क्यों पड़ी, इस बारे में वे शुरू में ही स्पष्ट कर देते हैं कि लोक में रघुवंश के प्रतापी राजाओं के गुणों की चर्चा इतनी व्यापक है, कि वे इस ओर सहज ही प्रवृत्त हो गये। कालिदास विनम्र कवि हैं, और वाल्मीकि के प्रति अत्यंत कृतज्ञ हैं। वे रघुवंश न लिखते, तो राम के पूर्वज राजा दिलीप, अज और रघु के गुणों के बारे में हमें पता ही नहीं चलता। राम के होते हुए भी वंश तो रघु के नाम से ही चला। रघु चक्रवर्ती सम्राट् थे। रघुवंश से ही ज्ञात होता है कि रघु जैसा महान् योद्धा और उदात्त राजा दूसरा नहीं हुआ।
रघुवंश में जो रामकथा आई है, वह वाल्मीकि का ठीक-ठीक अनुसरण करती है, इसलिये शुद्ध और प्रामाणिक है। कालिदास के हाथ वही रामायण लगी, जो उत्तरकालीन प्रक्षेपकों और विवादों से मुक्त थी। इसलिये बाद के कवि-मनीषियों ने रामकथा में प्रवेश के लिये कालिदास रचित रघुवंश की ही अनुशंसा की है। एक बार रघुवंश पढ़ लेने के बाद रघुकुल के गौरवशाली इतिहास की सम्पूर्ण जानकारी मिल जाती है। इक्ष्वाकुवंश के राजाओं ने आचरण की सभ्यता की जो नींव रखी, वह हमारी अपनी संस्कृति की पहचान है।
कालिदास के राम धीर-वीर-गम्भीर हैं। वे अपने पिता और पितामह के पदचिह्नों पर चलते हैं। रघुकुल की नीतियाँ और कुलगुरु के परामर्श ही उनके लिये सर्वोपरि हैं। पिता की आज्ञा से बढ़कर उनके लिये कुछ है भी नहीं। विश्वामित्र के साथ चल देने में वे पल भर भी विचार नहीं करते। जीवन में पहली बार किसी पर शस्त्र उठाना पड़ा, तो वह एक स्त्री थी। गुरु का आदेश माना। ताड़का को मारते हुए कोई पश्चात्ताप नहीं, न कोई अहंकार। मिथिला में शिव का धनुष भंग करने के बाद भी राम ऐसे बने रहे, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। क्रुद्ध परशुराम का मन जीत लेना केवल राम के बूते की बात थी। कालिदास राम की भंगिमाओं को बहुत कोमलता के साथ चित्रित करते हैं। रघुवंश को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि कालिदास किसी यज्ञ के अनुष्ठान में बैठे हैं। उनकी एक-एक आहुति ठीक अग्नि में ही पड़ रही है।
कालिदास कहते हैं कि रामकथा राम के दारुण दुःख से उपजी हुई है। ऐसा दुःख, जो राम बताते नहीं, चुपचाप सह जाते हैं। रघुवंश में राम मनुष्य हैं, हर पल मनुष्य ही बने रहना चाहते हैं। दुःख आते हैं, तो उठकर उनका स्वागत करते हैं। वे जितना जानते हैं, उससे अधिक यह जानना चाहते हैं कि आखिर मनुष्य के जीवन में दुःख की पराकाष्ठा क्या है? भोग की एक सीमा है, लेकिन दुःख ऐसा रोग है, जो असीम है। राम के राज्याभिषेक से ठीक पहले कैकेयी ने दो वरदान ऐसे मांग लिये हैं, जैसे वर्षा से भींगी हुई पृथ्वी के छेदों में से दो साँप निकल पड़े हों। दशरथ लाचार हैं, और राम चौदह वर्ष के वनवास के लिये मानो तैयार ही खड़े हैं। राम की मुखमुद्रा के भाव जैसे राज्याभिषेक के रेशमी वस्त्र पहनते समय थे, ठीक वैसे ही वनगमन के लिये वृक्ष की छाल के वस्त्र पहनते समय भी थे। राम चले जा रहे हैं इस जंगल से उस जंगल। बहुत पीछे छूटती चली गई है अयोध्या। कोई नहीं जानता, कहाँ बसे हैं राम-जानकी और लक्ष्मण। बेचैन भरत की आँखें भरी हुईं हैं। वे ढूँढ रहे हैं पग-पग अपने बड़े भाई को। चित्रकूट में भरत मिलाप तो होता है, लेकिन दशरथ की मृत्यु का समाचार पीछे लग जाता है।
राम ने चौदह वर्ष के वनवास का दुःख नहीं मनाया, अपितु जी भर कर उसका लाभ ही उठाया। राम के जीवन से ये चौदह वर्ष निकाल लिये जाएँ, तो बहुत कुछ बचता ही नहीं। कालिदास के राम कभी अत्रि ऋषि के आश्रम में मिलते हैं, कभी अगस्त्य ऋषि के आश्रम में। राम और लक्ष्मण कभी भी राजकुमार नहीं, ऋषिकुमार ही लगते हैं। वे जहाँ-जहाँ जाते हैं, शस्त्र और शास्त्र दोनों उनके साथ चलते हैं। वे तेजस्वी क्षत्रिय भी हैं, तपोनिष्ठ ब्राह्मण भी। जहाँ-जहाँ राम पहुँचते हैं, हव्यगंध से पर्यावरण सुगंधित हो उठता है।
जानकी का हरण और जटायु का मरण, ये दो ऐसी घटनाएँ हैं, जिन्होंने राम के वनवास को झकझोर दिया था। राम आँखों में आँसू लिये हुए जंगल-जंगल ढूँढते फिरे सीता को। जनकनंदिनी राक्षस कुल में रहने को विवश हुई। साथ ही साथ लिखा जाने लगा भीषण युद्ध का इतिहास। अपराजेय समर में अंततः मारा गया रावण। कालिदास कहीं एक बार भी विभीषण के चरित्र को लांछित नहीं होने देते, जैसा बाद के साहित्य में दिखाया गया। विभीषण राम का उत्कृष्ट चयन है, जैसे हनुमान हैं, सुग्रीव हैं। कालिदास के राम अपने पुरुषार्थ से रावण का वध करते हैं, न कि विभीषण के नाभि-संकेत पर।
चौदह वर्ष का वनवास पूरा होते ही राम अयोध्या लौट आते हैं। उनका राज्याभिषेक होता है। मंगलगीत गाये जाते हैं। सुग्रीव, हनुमान और विभीषण समेत लंकायुद्ध के सभी सहभागियों के सम्मान में ऐसा उत्सव अयोध्या ने पहले नहीं देखा था। लेकिन यह कैसा दुर्भाग्य? सीता के त्याग की यह कैसी विवशता? न राम ने दया देखी? न लक्ष्मण ने। लोकनिन्दा का यह कैसा भय? उधर वन में अकेली छोड़ दी गई सीता और इधर रोते-बिलखते राम। अपराधी कौन? राजा राम या राम की प्रजा? दुर्भाग्य! यह निर्णय कभी नहीं होगा।
बेटी दुःख में हो, तो क्या बीतती है पिता पर, यह कोई जनक से पूछे। कालिदास के राम अपनी मर्यादा नहीं तोड़ते, तो सीता कैसे? लक्ष्मण गर्भवती सीता को जंगल में अकेली छोड़कर आ रहे हैं, और सीता उन्हें आशीर्वाद दे रही है। पति के विरुद्ध एक शब्द तक नहीं। भारतीय नारी के आचरण की यह विशालता अन्यत्र कहाँ ?
कालिदास शृंगार के कवि हैं, लेकिन रामकथा कहते समय वे बहुत सावधान हैं। रावणवध के बाद एक बार भी उनकी यह गर्वोक्ति सुनाई नहीं देती कि वे अपनी सीता को जीत कर ले आये हैं। लम्बे वियोग के बाद राम और सीता का मिलन दिखाने में कालिदास राम की मर्यादा के साथ होते हैं। रामकथा आद्यन्त करुणा से भरी हुई है। कालिदास के पास आकर भी वह कथा अपना व्रत नहीं तोड़ सकी।
कालिदास राम कथा को अपने लालित्य से ढँकने का प्रयत्न कभी नहीं करते। वह जैसी है, बहुत पवित्र है। यह बात कालिदास जानते हैं, इसलिये रामकथा में न कोई अलंकार है, न कवि का अहंकार। सच तो यह है कि वह राम के होने से ही पावन है, पूज्य है।





