एकला चलो रे:रबींद्रनाथ टैगोर की श्रेष्ठ  कविताएं

एकला चलो रे:रबींद्रनाथ टैगोर की श्रेष्ठ कविताएं

मीडियावाला.इन।  आज  की परिस्थिति में इन कविताओं में जीवन सन्देश बहुत प्रासंगिक है -----------

गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर बंग साहित्य के ही नहीं, विश्व साहित्य की महान विभूति है   उनकी जीवन दृष्टि अद्भुत थी. 26 मई, 1921 को स्टाकहोम में दिए एक व्याख्यान में टैगोर ने कहा था, ‘मैं यह मानता हूं कि हम आज जो कष्ट उठा रहे हैं, वह विस्मृति, एकांतता के संकट के कारण है, क्योंकि हम मानवता का स्वागत करने के अवसर से तथा विश्व के साथ ऐसी सर्वोत्तम वस्तु को बांटने से चूक गए हैं जो हमारे पास उपलब्ध है, भारत की आत्मा ने सदैव एकात्मता के आदर्श का उद्घोष किया है, एकात्मता का यह आदर्श किसी भी वस्तु को, किसी भी जाति को अथवा किसी भी संस्कृति को अस्वीकार नहीं करता.’टैगोर ने अपने इन्हीं विचारों को अपनी कविताओं में समग्रता में पिरोया. वह दुनिया भर में बतौर कवि बेहद प्रतिष्ठित रहे.वरिष्ठ साहित्यकार प्रयाग शुक्ल द्वाराकिया  हिंदी अनुवाद हम यहाँ साभार दे रहे है -

 

1 .चित्त जहाँ भय शून्य हो
शीश जहाँ उठे रहे
ज्ञान जहाँ उन्मुक्त हो
गृह-प्राचीर से जहाँ
खंडित न हो वसुंधरा
जहाँ सत्य की गहराई से
शब्द…हृदय से झरे
जहाँ उत्थान के लिये
अनेक हस्त उठे रहे
चारों दिशा में जहाँ
सुकर्म की धारा बहे
अजस्त्र-सहस्त्र प्रवाह में
यह जीवन चरितार्थ हो;
तुच्छ आचरण जहाँ
प्रकृति ग्रहण करे नहीं
जहाँ सदा आनंद हो
हे परमपिता, परमेश्वर
अपने निर्मम आघात से
उस स्वर्ग के प्रदेश में
मेरे भारत देश को
सतत-स्वतंत्र-मंत्र से
झंकार दो…झंकार दो

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2.  धीरे चलो, धीरे बंधु

धीरे चलो, धीरे बंधु,लिए चलो धीरे ।

मंदिर में, अपने विजन में ।

पास में प्रकाश नहीं, पथ मुझको ज्ञात नहीं ।

छाई है कालिमा घनेरी ।।

चरणों की उठती ध्वनि आती बस तेरी

रात है अँधेरी ।।

हवा सौंप जाती है वसनों की वह सुगंधि,

तेरी, बस तेरी ।।

उसी ओर आऊँ मैं, तनिक से इशारे पर,

करूँ नहीं देरी !!

3.

यह कौन विरहणी आती

यह कौन विरहणी आती !

केशों को कुछ छितराती ।

वह म्लान नयन दर्शाती ।।

लो आती वह निशि-भोर ।

देती है मुझे झिंझोर ।।

वह चौंका मुझको जाती ।

प्रातः सपनों में आती।

वह मदिर मधुर शयनों में,

कैसी मिठास भर जाती ।।

वह यहाँ कुसुम-कानन में,

है सौंप वासना जाती ।।

4.

चीन्हूँ मैं चीन्हूँ तुम्हें ओ, विदेशिनी !

चीन्हूँ मैं चीन्हूँ तुम्हें ओ, विदेशिनी !

ओ, निवासिनी सिंधु पार की-

देखा है मैंने तुम्हें देखा, शरत प्रात में, माधवी रात में,

खींची है हृदय में मैंने रेखा, विदेशिनी !!

सुने हैं, सुने हैं तेरे गान, नभ से लगाए हुए कान,

सौंपे हैं तुम्हें ये प्राण, विदेशिनी !!

घूमा भुवन भर, आया नए देश,

मिला तेरे द्वार का सहारा विदेशिनी !!

अतिथि हूँ अतिथि, मैं तुम्हारा विदेशिनी !!

5

 

तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे
फिर चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे
ओ तू चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे

तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे
फिर चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे

यदि कोई भी ना बोले ओरे ओ रे ओ अभागे कोई भी ना बोले
यदि सभी मुख मोड़ रहे सब डरा करे
तब डरे बिना ओ तू मुक्तकंठ अपनी बात बोल अकेला रे
ओ तू मुक्तकंठ अपनी बात बोल अकेला रे

तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे
 

यदि लौट सब चले ओरे ओ रे ओ अभागे लौट सब चले
यदि रात गहरी चलती कोई गौर ना करे
तब पथ के कांटे ओ तू लहू लोहित चरण तल चल अकेला रे

तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे

यदि दिया ना जले ओरे ओ रे ओ अभागे दिया ना जले
यदि बदरी आंधी रात में द्वार बंद सब करे
तब वज्र शिखा से तू ह्रदय पंजर जला और जल अकेला रे
ओ तू हृदय पंजर चला और जल अकेला रे

तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे
फिर चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे
ओ तू चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे

प्रस्तुति ---------स्वाति तिवारी 

 

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