जिन्दगी से कुछ सवाल करती दो कविताएं

जिन्दगी से कुछ सवाल करती दो कविताएं

मीडियावाला.इन।

1-

बहुत मुश्किल है सफर,

न जाने मंज़िल कहां।

रात हुई इतनी घनी,

न जाने सवेरा कहां।

हैवानियत सिर चढ़ी है,

न जाने इंसान कहाँ।

खौफ़ ज़दा हर सांस,

न जाने जिंदगी कहाँ।

हर इक परेशां शहर में,

न जाने  सुकूँ है कहाँ।

अहले जिंदगी कैद में है,

ओ मुसाफिर जाता कहाँ।

काट के पर छोड़ दिये,

न जाने परिंदा गया कहाँ।

इस दौर में हवा भी बिकने लगी,

बोलो  ए सुखनबर अब रहोगे कहां।

 

Life And Success Mantra Only You Can Change Your Life- Inext Live

2--ऐ ज़िन्दगी

ज़िन्दगी तुम कहां हो,

तुमको कल रात सपने में देखा था,

तुम दिखाई तो दी थी,

पर तुम रुकी नहीं, पता नहीं क्यों?

सुबह भी जब आँख खुली, तो 

खिड़कियों की दरारों से झाँक 

रही थी, मुझे छुआ तुमने,

तुम फिर नहीं रुकी, 

ज़िन्दगी तुम रूकती क्यों नहीं,

आती हो, चली जाती हो,

कभी हँसा देती हो, तो कभी 

रुला देती हो, 

उस वक़्त तुम्हारी बहुत  ज़रूरत होती है,

जब मैं उदास हो जाता हूँ, 

अपनों में अकेला महसूस करता हूँ,

तुम मुझे भाती हो जब,

तुम मुस्कुराती हो, और तब मेरे बाग़ीचे 

के पेड़ झूमते हैं, तुम हँसती हो, तब नन्ही गौरैया वही फुदकती रहती है,

कूदती है पानी से खेलती है और 

दाना लेके उड़ जाती है, 

तुम उस वक़्त बहुत ख़ुश हो जाती हो,

जब बादल घिर आते है,

मयूर शोर मचाने लगते है और,

छम से नन्हीं बूँदे बड़ी होके चेहरे 

और जिस्म से आलिंगन करती हैं,

पर ठीक उसी वक़्त तुम चली जाती हो,

तड़प के रह जाता है मन और तन,

क्यों जाती हो?

यूँ प्यासे मन को छोड़ कर,

पल में धूप आ जाती है तुम फिर लौट आती हो

ज़िन्दगी, 

ज़िन्दगी तुम क्या क्या रूप बदलती हो,

पर ज़िन्दगी तुम अच्छी हो,

साथ रहती हो, मेरी ख़ुशी में ख़ुश पर दुःख में 

दुखी भी होती है, ज़िन्दगी तुम अच्छी हो,

जब हर शाम बहुत ख़ुशनुमा हो जाती है, 

तब तब  नीले गगन में एक शोर उठता है और 

दरख़्तों की टहनियों पर  एक मेला सा लगता है, परिंदों का, 

ज़िन्दगी फिर लौट आती है, 

थोड़ी सी आहट घर लौटते चौपाये की आती है, तुम वही कही रहती हो, 

हवा सी आती हो, हवा सी चली जाती हो,

पर ए ज़िंदगी तुम ख़ूब हो,

अच्छी लगती हो जब तुम मुस्कुराती हो,

ज़िंदगी तुम बिलकुल मेरे महबूब 

जैसी हो, ज़िन्दगी तुम बहुत सताती हो,

पर जैसी भी हो तुम अच्छी हो, 

तेरी तलाश में तुम्हारा तलबग़ार, 

 

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रितेश शर्मा

   वरिष्ठ साहित्यकार रितेश शर्मा पी डब्ल्यू डी में सेक्शन इंजिनियर है ,इलेक्ट्रिकल इंजिनियर होने के साथ साथ वे साहित्य में भी  शिद्दतसे  दखल रखते है भारतीय मानस की पुनःसृष्टि करना और और जीवन के अनसुलझे सवालों को रेखांकित करती उनकी कवितायेँ अक्सर चर्चा का विषय होती है .जीवन मर्म से भरी कवितायेँ रितेश जैसे कवियों की संवेदन्शीलता की परिचायक है .