डैनों पर ढूंढते, जीवन विस्तार

डैनों पर ढूंढते, जीवन विस्तार

मीडियावाला.इन।

मैं रोम रोम 
निर्बन्ध परिंदा,
मन मेरा 
विस्तृत आकाश,
आकाश खोजता 
व्योम विहंगम,
साथ सूर्य,
हम कौन 
कहाँ  के वंशज,
कहाँ आदि है
कहाँ अंत हमारा,
समय के
डैनों पर,
ढूंढते,
जीवन विस्तार
किनारा,
हर कण -
हर क्षण
साक्षी,
साँसों की तान
प्राणों का
सुने गान,
समाधी पर्वतों की,
कल कल नदियों का,
गहन नीरव के अनुनाद ,
तलाशता 
अनन्त का प्रस्फुटन,
मौन मुखर,
उठते परदे,
नैपथ्य खोलता 
अजाने तिलस्म,
ज्ञान-कुबेर, अनुभव
अखिल विस्तार,  
व्यक्त, जब तक
स्वांस-प्रवाह,
सर्वस्व फिर स्वाह
न  फिर वक्ता 
और न श्रोता
न दृश्य कोई 
न कोई दृष्टा
होता शेष……..
अनन्त शून्य शून्य शून्य…..
न घटित न घटना,
न शब्द न लेख,
न अनुभव, न अनुभूति 
न स्म्रति न विस्म्रति,
बस शून्य शून्य और शून्य
विलुप्त शब्द
दृश्य सब
कैसे ? कहाँ ??
अनुत्तरित बचे 
शेष प्रश्न…..???????

अजय साकल्ले

शिक्षा: रसायन शास्त्र में एम. एस. सी.

संप्रति: सेवानिवृत्त वरिष्ठ बैंक प्रबंधक,

जन्म व शिक्षा: खंडवा,

वर्तमान  निवास -इंदौर 

लेखन: कहानी व कविता,

जो मैं व्यक्त हूँ, वही मैं हूँ। कभी कभी जिज्ञासा प्रश्नों का जंजाल बुनती है, और मैं बस उनके उत्तरों की तलाश में जुट जाता हूँ। कुछ के उत्तर मिल जाते हैं तो बाँट लेता हूँ। जब नहीं मिलते, तो उन्हें साफ शब्दों में सबके बीच रख देता हूँ। यही मेरी पहचान हैं। जैसे खोजने पर जाना जीवन भ्रम है, माया है। और वह ऐसे व्यक्त हुआ।

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