गौतम राजऋषी  की तीन कवितायें

गौतम राजऋषी की तीन कवितायें

मीडियावाला.इन।

1 --ये कैसी पेड़ों से है उतरी धूप

चुभती-चुभती सी ये कैसी पेड़ों से है उतरी धूप
आंगन-आंगन धीरे-धीरे फैली इस दोपहरी धूप

गर्मी की छुट्‍टी आयी तो गाँवों में फिर महके आम
चौपालों पर चूसे गुठली चुकमुक बैठी शहरी धूप

ज़िक्र उठा है मंदिर-मस्जिद का फिर से अखबारों में
आज सुब्‍ह से बस्ती में है सहमी-सहमी बिखरी धूप

बड़के ने जब चुपके-चुपके कुछ खेतों की काटी मेंड़
आये-जाये छुटके के संग अब तो रोज़ कचहरी धूप

झुग्गी-झोंपड़ पहुंचे कैसे, जब सारी-की-सारी हो
ऊँचे-ऊँचे महलों में ही छितरी-छितरी पसरी धूप

बाबूजी हैं असमंजस में, छाता लें या रहने दें
जीभ दिखाये लुक-छिप लुक-छिप बादल में चितकबरी धूप

घर आया है फौजी, जब से थमी है गोली सीमा पर
देर तलक अब छत के ऊपर सोती तान मसहरी धूप

2 --न समझो बुझ चुकी है आग

 

न समझो बुझ चुकी है आग, गर शोला न दिखता है
दबी होती है चिंगारी, धुआँ जब तक भी उठता है

बड़े हो तुम कि तुम तो चाँदनी से घर सजाते हो
हमारी झुग्गियों में चाँद भी छन-छन के चुभता है

गया वो इस अदा से छोड़ कर चौखट कि मत पूछो
 हर इक आहट पे अब देखो ये दरवाजा तड़पता है

बना कर इस क़दर ऊँचे महल, तू छीन मत मुझसे
हवा का एक झोंका जो मेरी खिड़की में रहता है

चलो, चलते रहो, पहचान रुकने से नहीं बनती
बहे दरिया तो पानी पत्थरों पर नाम लिखता है

वो बचपन में कभी जो तितलियाँ पकड़ी थीं बागों में
बरस बीते, न अब तक रंग हाथों से उतरता है

बता ऐ आस्माँ कुछ तो कि करने चाँद को रौशन
तपिश दिन भर लिये सूरज भला क्यूँ रोज़ जलता है

कहो मत खोलने मुट्ठी हमारी, देख लो पहले
कि कैसे बंद मुट्ठी से यहाँ तूफ़ान रिसता है

किताबें बंद हैं यादों की जब सारी मेरे मन में
ये क़िस्से ज़ेह्‍न में माज़ी के रह-रह कौन पढ़ता है

कई रातें उनींदी करवटों में बीतती हैं जब
कि तब जाकर नया कोई ग़ज़ल का शेर बनता है

3-रात भर चाँद को यूँ रिझाते रहे

रात भर चाँद को यूँ रिझाते रहे
उनके हाथों का कंगन घुमाते रहे

इक विरह की अगन में सुलगते बदन
करवटों में ही मल्हार गाते रहे

टीस, आवारगी, रतजगे, बेबसी
नाम कर मेरे, वो मुस्कुराते रहे

शेर जुड़ते गये, इक गज़ल बन गयी
काफ़िया, काफ़िया वो लुभाते रहे

टौफियाँ, कुल्फियाँ, कौफी के जायके
बारहा तुम हमें याद आते रहे

कोहरे से लिपट कर धुँआ जब उठा
शौल में सिमटे दिन थरथराते रहे

मैं पिघलता रहा मोम-सा उम्र भर
इक सिरे से मुझे वो जलाते रहे

जब से यादें तेरी रौशनाई बनीं
शेर सारे मेरे जगमगाते रहे

0 comments      

Add Comment


गौतम राजऋषि

जन्म : 10 मार्च 1975, सहरसा, बिहार

भाषा : हिंदी

विधाएँ : कहानी. संपर्क : द्वारा- डा० रामेश्वर झा, वी.आई.पी. रोड, पूरब बाजार, सहरसा-852201

फोन : 09797795933

ई-मेल : gautam_rajrishi@yahoo.co.in