
Ken-Betwa Link Project: भूख हड़ताल से दहला ‘चिता आंदोलन’: हजारों आदिवासियों ने नहीं बनाया खाना, केन नदी में संघर्ष तेज
छतरपुर: केन-बेतवा लिंक परियोजना से विस्थापित हो रहे आदिवासियों का ‘चिता आंदोलन’अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया। पिछले कई दिनों से केन नदी की जलधारा में चिताओं पर लेटकर विरोध कर रहे हजारों आदिवासियों ने आज एक और कठोर कदम उठाया – सामूहिक भूख हड़ताल।

●आज नहीं जले चूल्हे..
आंदोलन के आठवें दिन, प्रभावित गांवों के हजारों परिवारों ने एकजुट होकर सुबह से ही अपने घरों में चूल्हा नहीं जलाया। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं और पुरुष – सभी ने सामूहिक रूप से भोजन का त्याग किया। “खाना नहीं बनाएंगे, न्याय लेकर रहेंगे” के नारों के साथ, वे सभी नदी के किनारे से लेकर जलधारा के बीच बनी चिताओं तक पहुँच गए।
●आंदोलन स्थल का दृश्य.
नदी के बीचों-बीच, जलती हुई टॉर्च और दीयों के बीच, ‘चिता आंदोलन’ और अधिक भयावह और मार्मिक लग रहा था। सैकड़ों महिलाएं अपने बच्चों के साथ, कमजोर शरीर के बावजूद, दृढ़ संकल्प के साथ चिताओं पर लेटी हुई थीं। भूख और प्यास से उनके चेहरे थक चुके थे, लेकिन उनकी आँखों में ‘न्याय’ की माँग साफ दिख रही थी। नदी के किनारे जमा हजारों अन्य लोगों ने भी कुछ नहीं खाया और *”न्याय दो या मौत दो!”* के नारों के साथ आंदोलनकारियों का मनोबल बढ़ाया।
●जय किसान संगठन की प्रतिक्रिया..
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर (जय किसान संगठन) ने प्रशासन पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा:
“आज हजारों घरों में चूल्हा नहीं जला। यह भूख हड़ताल प्रशासन के दमन और असंवेदनशीलता का सीधा जवाब है। हमें झूठा मुआवजा नहीं, अपनी जल, जंगल, जमीन और संस्कृति चाहिए। जब तक हमारी वैधानिक मांगें (धारा 11, 15, 18 आदि का पालन) पूरी नहीं होंगी, यह सामूहिक भूख हड़ताल और चिता आंदोलन थमेगा नहीं। प्रशासन को तय करना है कि वह हमारे अस्तित्व को बचाएगा या हमारी मौत का गवाह बनेगा।”
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रशासन ने मेडिकल टीम और राशन-पानी की आपूर्ति पर रोक लगाकर मानवीय संकट पैदा किया है।
●प्रशासनिक प्रतिक्रिया..
कलेक्टर पार्थ जैसवाल ने आंदोलन को अवैध बताते हुए धारा 163 (धारा 144) के उल्लंघन पर कानूनी कार्यवाही की चेतावनी दी है। उनका दावा है कि 90% मुआवजा दिया जा चुका है, लेकिन आंदोलनकारियों का कहना है कि यह झूठ है और वे ग्राम सभा के दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की माँग पर अड़े हुए हैं।
●संघर्ष के 8 दिन..
8 दिनों के लगातार संघर्ष और आज की भूख हड़ताल ने आंदोलन को “जनसंघर्ष” में बदल दिया है। ग्रामीणों का संकल्प टूटता नहीं दिख रहा है। प्रशासन पीछे हटने को तैयार नहीं है और संघर्ष बढ़ता ही जा रहा है। ‘चिता आंदोलन’ ने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया है।





