हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन लेने वाले कोरोना वायरस के मरीजों की जान को ज्यादा खतरा : अध्ययन

हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन लेने वाले कोरोना वायरस के मरीजों की जान को ज्यादा खतरा : अध्ययन

मीडियावाला.इन।

मलेरिया के लिए इस्तेमाल होने वाली एक प्रमुख दवा हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन को कोरोना वायरस संकट से निपटने की दिशा में बड़ी उम्मीद के तौर पर देखा जा रहा है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद इसकी तरफदारी कर चुके हैं. लेकिन साइंस जर्नल 'लैंसेट' के अध्ययन में यह बात सामने आई है कि कोरोना वायरस के जिन मरीजों को हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन दी जा रही है उन्हें मौत का खतरा ज्यादा है. खबरों के मुताबिक अध्ययन में पाया गया है कि इस दवाई से मरीजों को कोई फायदा नहीं हो रहा.

द लैंसेट के अध्ययन में कोरोना वायरस से संक्रमित 96 हजार मरीजों को शामिल किया गया. इनमें से 15 हजार लोगों को हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन या फिर कोई दूसरी क्लोरोक्विन दी गई. कुछ मरीजों को सिर्फ यही दी गई जबकि कुछ में इसे किसी एंटीबायोटिक के साथ आजमाया गया. बाद में पता चला कि दूसरे मरीजों की तुलना में हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन खाने वाले वर्ग में ज्यादा मौतें हुईं. इन मरीजों में हृदय रोग की समस्या भी देखी गई. जिन्हें हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन दी गई उनमें मृत्यु दर 18 फीसदी रही. दूसरी तरह की क्लोरोक्विन लेने वालों में यह आंकड़ा 16.4 फीसदी रहा. जिन्हें यह दवा नहीं दी गई उनमें मृत्यु दर नौ फीसदी रही.

करीब एक सदी पहले मलेरिया के इलाज के लिए खोजी गई हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन का इस्तेमाल एमीबियेसिस (पेचिश) और अर्थराइटिस (जोड़ों के दर्द) जैसी बीमारियों में भी होता रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की जो जरूरी दवाओं की सूची है उसमें यह शामिल है. इसे सबसे प्रभावी और सुरक्षित दवाओं में से एक माना जाता है. कोरोना वायरस के इलाज के मामले में यह कितनी सुरक्षित और प्रभावी है इसकी जांच चल रही है. भारत इसका सबसे बड़ा उत्पादक है और उसने हाल ही में इसकी एक बड़ी खेप अमेरिका भेजी है.

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