निर्भया गैंगरेप केस: क्या अब भी टल सकती है दोषी विनय शर्मा की फांसी

निर्भया गैंगरेप केस: क्या अब भी टल सकती है दोषी विनय शर्मा की फांसी

मीडियावाला.इन।

दिल्ली के निर्भया गैंगरेप मामले में चारों दोषियों को तीन मार्च सुबह छह बजे फांसी सुनाए जाने का आदेश हुआ है.

इस मामले में दो बार अदालत ने पहले भी तारीख़ तय की थी लेकिन दोषियों की अलग-अलग याचिकाओं के कारण यह टल गई थी.

इस मामले में मुकेश सिंह, विनय शर्मा, अक्षय ठाकुर और पवन गुप्ता दोषी हैं.

आशा देवी

नया डेथ वारंट जारी होने के बाद निर्भया की मां आशा देवी ने उम्मीद जताई थी कि इस बार हर हाल में दोषियों को सज़ा हो ही जाएगी और वो किसी क़ानूनी पेचीदगी का फ़ायदा नहीं उठा सकेंगे.

लेकिन विनय शर्मा के वकील, एपी सिंह ने 20 फ़रवरी को भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त को चिट्ठी लिखकर नीतिगत न्याय की मांग की है.

उन्होंने एक याचिका तो मुख्य चुनाव आयोग को दी है और एक याचिका पटियाला हाउस कोर्ट की विशेष अदालत में दायर की है.

विशेष अदालत में दायर इस याचिका में उन्होंने विनय कुमार के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य का हवाला देते हुए न्याय की मांग की है.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "जिस समय दिल्ली सरकार ने विनय शर्मा की दया याचिका को ख़ारिज किये जाने की अनुशंसा भेजी थी उस समय दिल्ली में विधानसभा चुनावों की वजह से आचार संहिता लागू थी. ऐसे में गृहमंत्री जोकि मनीष सिसोदिया थे वो हस्ताक्षर नहीं कर सकते थे. यही कारण है कि उनके हस्ताक्षर मूल कॉपी पर नहीं हैं."

पटियाला हाउस कोर्ट में स्पेशल कोर्ट में दायर याचिका के बारे में उन्होंने बताया "उसका सिर फटा हुआ है, दायां हाथ फ्रैक्चर्ड है और वो अपनी मां को भी नहीं पहचान पा रहा है. वो मुझे भी नहीं पहचान रहा. आवाज़ पहचान ले रहा है लेकिन देखकर किसी को पहचान नहीं पा रहा है. इसलिए हमने कोर्ट में याचिका लगाई है कि उसे बेहतर से बेहतर इलाज मिले."

तो क्या इस आधार पर वो फांसी से विनय को बचाना चाहते हैं?

इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं कि सिज़ोफ्रेनिया, मानसिक बीमारी जैसी कंडिशन को लेकर हमने कोई क़ानून तो नहीं बनाया है जो है वो क़ानून में पहले से है.

एपी सिंह- विनय के वक़ील

लेकिन सवाल ये भी है कि 17 फ़रवरी को जब डेथ वारेंट जारी किया गया होगा तो उससे पहले उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति की जांच की ही गई होगी और उसके बाद ही कोर्ट ने फ़ैसला दिया होगा. इस पर एपी सिंह कहते हैं "ये बात बिल्कुल सही है लेकिन क्या कोई इस दौरान बीमार नहीं हो सकता."

वहीं निर्भया की मां आशा देवी का कहना है "दोषियों के वकील एपी सिंह के पास अब कहने को कुछ भी बचा नहीं है. वो इस केस में दो दोषियों के वकील हैं. विनय की सभी याचिकाओं के विकल्प ख़त्म हो चुके हैं. अक्षय की भी तो अब उनके पास कहने को कुछ भी बचा नहीं है इसलिए वो कोर्ट को गुमराह कर रहे हैं. मुझे लगता है कि विनय को नहीं एपी सिंह को आराम की ज़रूरत है क्योंकि वो मानसिक तौर पर बीमार हो चुके हैं."

वो कहती हैं, "जिस समय विनय की मर्सी पिटीशन ख़ारिज हुई थी उसी समय उसकी स्टेटस रिपोर्ट भी आई थी. वो मानसिक और शारीरिक तौर पर पूरी तरह फ़िट है लेकिन इनके (एपी सिंह) के उकसाने पर वो अपने को नुक़सान पहुंचा रहा है."

लेकिन अब सवाल यही है कि क्या इन दोनों याचिकाओं के आधार पर विनय की फांसी को उम्रकै़द में बदल दिया जाएगा या क्या फिर उनकी फांसी टल जाएगी?

क्या सुप्रीम कोर्ट ने कभी किसी ऐसे जघन्य अपराध में दोषी का फांसी की सज़ा को उम्रक़ैद में तब्दील किया है? इसका जवाब है - देवेंदर पाल सिंह भुल्लर के मामले में.

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 1993 में दिल्ली में हुए बम धमाके के दोषी देवेंदर पाल सिंह भुल्लर की फांसी की सज़ा को उम्रक़ैद में बदल दिया था.

अप्रैल, 2013 में सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने भुल्लर की दया याचिका को ख़ारिज कर दिया था और उनकी मौत की सज़ा को कम करने से इनक़ार भी कर दिया था. इस आदेश के बाद देवेंदर पाल सिंह भुल्लर की पत्नी ने सर्वोच्च न्यायालय में अपने पति का 'मानसिक रूप से असुंतलित' बताते हुए एक क्यूरेटिव पेटिशन (याचिका) दायर की थी.

उनके वकील केटीएस तुलसी ने अदालत से उनकी मानसिक हालत के आधार पर मौत की सज़ा माफ़ करने की मांग की थी. जिसके बाद भारत के सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सज़ा पाए चरमपंथी देवेंदर पाल सिंह भुल्लर की सज़ा को आजीवन कारावास में बदल दिया था.

तो क्या इस मामले में भी यही होगा?

गाइडलान्स के मुताबिक़, फांसी की सज़ा पाने वाले कैदी की शारीरिक और मानसिक जांच की जाती है और दोषी को फांसी तभी दी जाती है जब जेल के अधिकारी इस बात को लेकर संतुष्ट होंगे कि वह शख़्स स्वस्थ है.

ब्लैक वॉरेंट किताब के लेखक और तिहाड़ जेल के पूर्व जेलर सुनील गुप्ता का कहना है कि इस मामले के संदर्भ में फांसी टलने की गुंजाइश तो कम ही लगती है.

वो कहते हैं "अगर चुनाव आयोग को दी गई याचिका की बात करें तो यहां ये समझना होगा कि फ़ैसला तो दिल्ली सरकार ने लिया नहीं वो तो माध्यम थी. याचिका ख़ारिज करने का फ़ैसला तो राष्ट्रपति ने ही लिया है. रही बात मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं होने और चोट लगे होने की तो यह बिल्कुल सही है कि फांसी के लिए दोषी को मानसिक तौर पर स्वस्थ होना चाहिए लेकिन जो हालत वो बता रहे हैं वो सिज़ोफ्रेनिक की नहीं है. सिज़ोफ्रेनिक आदमी ना तो खुद खा पाता, ना कपड़े पहना पाता है उसे अपना होश नहीं रहता. तो ऐसी कोई स्थिति तो उसके साथ है नहीं फिर वो सिज़ोफ्रेनिक तो हो नहीं सकता. शारीरिक स्वास्थ्य के संदर्भ में वो कहते हैं कि जब किसी को कोई क्रॉनिक बीमारी होती है, तब ये स्थिति लागू होती है."

सुप्रीम कोर्ट में वकील और क्रिमिनल मामलों की जानकार एडवोकेट कमलेश के मुताबिक़, इस मामले में फांसी को बदलकर उम्रक़ैद कर दिया जाए ऐसा तो नहीं लगता.

वो कहती हैं, "इस तरह की याचिकाएं बिल्कुल नई हैं. रही बात भुल्लर केस की तो उनकी मानसिक स्थिति वाली बात शुरू से ही उस केस में ही यह स्टैंड रखा गया था. लेकिन इस मामले में आप ख़ुद को चोट पहुंचाकर ये उम्मीज करें कि आपकी फांसी टल जाएगी तो ऐसा नहीं होगा."

वो कहती हैं "कोर्ट भी सबकुछ समझता है. अगर ऐसा होता तो 2012 से लेकर अब ना जाने इस तरह के कितने ही मामले आ चुके होते. रही बात किसी की फांसी में देरी की तो कोर्ट दोषी की हर बात इसलिए सुनता है क्योंकि कोर्ट का रुख़ बेहद मानवीय होता है."

"रही बात मुख्य चुनाव आयुक्त के पास जाने की तो अगर ग़लती देखी जाए तो आपकी ही है. आपकी ओर से तारीखों का ध्यान नहीं रखा गया और वो गृहमंत्री तो थे ही. ऐस तो नहीं कि पद पर ही नहीं थे."

लेकिन क्या है सिज़ोफ्रेनिया?

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ सिज़ोफ्रेनिया एक गंभीर मानसिक डिस्ऑर्डर है जिससे दुनियाभर में क़रीब दो करोड़ लोग पीड़ित हैं. सिज़ोफ्रेनिया की वजह से सोचने, विचारने, भावनात्मक तौर पर, भाषाई स्तर पर, व्यवहार के स्तर पर विकृति आ जाती है. कई बार इसमें मतिभ्रम होने की भी आशंका होती है.

विश्व स्वास्थ संगठन के मुताबिक़, सिज़ोफ्रेनिया लाइलाज नहीं है. इसका उपचार संभव है. दवाइयों के साथ-साथ अगर इससे पीड़ित शख़्स को साइकोलॉजिकल मदद दी जाए तो वो इससे जल्दी उबर सकता है.

क्या हैं लक्षण?

- दृष्टिभ्रम होना

- मतिभ्रम होना

- असामान्य व्यवहार

- बातचीत में असंतुलन

- भावनाओं में असंतुलन

क्या होता है असर

सिज़ोफ्रेनिया की वजह से दुनियाभर में क़रीब दो करोड़ लोग प्रभावित हैं लेकिन यह उतना सामान्य नहीं है जितना दूसरी मानसिक बीमारियां.

सिज़ोफ्रेनिया होने की आशंका पुरुषों में अधिक होती है.

जिन लोगों के साथ भेदभाव हुआ हो और जिनके मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ हो उनमें इसके होने की आशंका सबसे अधिक होती है.

क्या हो सकते हैं कारण

इसका कोई एक कारण स्पष्ट नहीं है. कुछ शोधों में कहा गया है कि यह जीन ट्रांसफ़र होने की वजह से, आस-पास के वातावरण की वजह से हो सकता है.

source: bbc.com/hindi

RB

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