व्यंग्य के रंग पुस्तक का लोकार्पण, रतलाम के आशीष दशोत्तर सहित देश-विदेश के 88 व्यंग्यकार सम्मिलित!

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व्यंग्य के रंग पुस्तक का लोकार्पण, रतलाम के आशीष दशोत्तर सहित देश-विदेश के 88 व्यंग्यकार सम्मिलित!

New Delhi /Ratlam : हिंदी साहित्य के क्षेत्र में व्यंग्य विधा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पहल के रूप में “व्यंग्य के रंग” नामक संकलन का लोकार्पण सांस्कृतिक केंद्र भारत मंडपम, प्रगति मैदान में हुआ। इस पुस्तक का प्रकाशन ‘अद्विक पब्लिकेशन’ द्वारा किया गया। इसमें आशीष दशोत्तर सहित देश-विदेश के 88 रचनाकार सम्मिलित हैं। उल्लेखनीय है कि ‘अद्विक पब्लिकेशन’ निरंतर साहित्यिक मूल्यों के संरक्षण, संवर्धन और रचनाकारों को मंच प्रदान करने में अग्रणी रहा है। “व्यंग्य के रंग” केवल एक पुस्तक ही नहीं बल्कि समकालीन समाज, राजनीति, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त दर्पण है।

 

इस अवसर पर आयोजित परिचर्चा में इस बात पर विशेष रूप से मंथन हुआ कि व्यंग्य साहित्य को अक्सर केवल हास्य का माध्यम समझा जाता है। वास्तव में यह समाज की विसंगतियों, विडम्बनाओं और विरोधाभासों को उजागर करने की सबसे सशक्त विधा है। “व्यंग्य के रंग” इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए पाठकों को न केवल हंसने के लिए प्रेरित करता है बल्कि सोचने, आत्ममंथन करने और प्रश्न उठाने की चेतना भी प्रदान करता है। आज के समय में समाज अनेक सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में व्यंग्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से व्यवस्था पर तीखे प्रहार करता है। इस पुस्तक में संकलित रचनाएं आम आदमी की पीड़ा, सत्ता की विडम्बनाएं, सामाजिक दिखावे, बदलते मूल्यों और आधुनिक जीवनशैली की विसंगतियों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती हैं। “व्यंग्य के रंग” एक ऐसा व्यंग्य-संग्रह है, जिसमें विविध विषयों, शैलियों और दृष्टिकोणों का अनूठा समावेश देखने को मिलता है। पुस्तक में शामिल 88 व्यंग्यकारों की रचनाएं यह सिद्ध करती हैं कि हिंदी व्यंग्य केवल एक शैली नहीं, बल्कि एक सशक्त वैचारिक आन्दोलन भी है।

पुस्तक की निम्न प्रमुख विशेषताओं पर भी विशेष रूप से चर्चा की गई-

• समाज और राजनीति पर तीखा किंतु सुसंस्कृत व्यंग्य

• समकालीन जीवन की सच्चाइयों का यथार्थ चित्रण

• हास्य के साथ गहरी वैचारिक दृष्टि

• भाषा की सरलता और प्रभावशीलता

• विविध पीढ़ियों के व्यंग्यकारों का समावेश!

 

इस महत्त्वपूर्ण व्यंग्य-संकलन का सम्पादन पवन कुमार जैन एवं परवेश जैन द्वारा किया गया है। दोनों सम्पादक हिंदी साहित्य के क्षेत्र में अपने सशक्त लेखन, गम्भीर दृष्टि और साहित्यिक प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं। पवन कुमार जैन एक अनुभवी साहित्यकार हैं जिनका साहित्यिक सफर हाइकु, व्यंग्य, कहानी और सम्पादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय रहा है। वहीं परवेश जैन समकालीन साहित्य में सक्रिय, सजग और प्रतिबद्ध लेखक के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। दोनों सम्पादकों ने इस संग्रह को तैयार करते समय रचनाओं की गुणवत्ता, विविधता और सामाजिक प्रासंगिकता पर विशेष ध्यान दिया है। उनके सम्पादन कौशल का परिणाम यह है कि “व्यंग्य के रंग” न केवल एक पठनीय पुस्तक बन पड़ी है, बल्कि एक संदर्भ ग्रंथ के रूप में भी अपनी जगह बनाएंगी।

 

इस अवसर पर आयोजित परिचर्चा में व्यंग्य विधा को नए संदर्भों में समझने और परखने का अवसर प्रदान किया।

“व्यंग्य के रंग” में शामिल सभी 88 व्यंग्यकारों की रचनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि हिंदी व्यंग्य आज भी जीवंत, प्रासंगिक और प्रभावशाली है। इस पुस्तक ने अनुभवी और स्थापित लेखकों के साथ-साथ नई प्रतिभाओं को भी समान मंच प्रदान किया जो साहित्यिक लोकतंत्र की सच्ची भावना को दर्शाता है। उल्लेखनीय है कि यह पुस्तक प्रसिद्ध व्यंग्यकार और कॉमेडियन राजू श्रीवास्तव जी को समर्पित है जिन्होंने जमीन से जुड़े तमाम करेक्टर गढ़े और उनके माध्यम से आमजनों की समस्याओं को निरूपित किया। आयोजन के माध्यम से व्यंग्यकारों के योगदान को सम्मानित किया गया और पाठकों को उनसे सीधे जुड़ने का अवसर मिला। इस साहित्यिक आयोजन में सभी साहित्यप्रेमियों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों और पाठकों को सादर आमंत्रित किया गया। इस अवसर पर सम्पादकद्वय पवन कुमार जैन और परवेश जैन के अतिरिक्त सहयोगी रचनाकार डॉ सुभाष चन्दर, डॉ. गिरीश पंकज, आचार्य राजेश कुमार, डॉ. लालित्य ललित, रण विजय राव, पंकज प्रसून, अर्चना चतुर्वेदी, रेनू अस्थाना, सीमा चड्ढा, विजय आनंद दुबे आदि भी उपस्थित थे। इस कार्यक्रम में अशोक कुमार गुप्ता प्रकाशक एवं जोया और विपिन भी उपस्थित रहें!