कानून और न्याय:रैगिंग के मामले में MP उच्च न्यायालय का अभिनव फैसला!

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कानून और न्याय:रैगिंग के मामले में MP उच्च न्यायालय का अभिनव फैसला!

आज भी रैगिंग एक ऐसी लाईलाज बीमारी है, जिसका कोई स्थाई इलाज सुझ नहीं दे रहा है। अभी भी रैगिंग की घटनाऐं घटित होती है तथा छात्रों में इस कारण भय का वातावरण निर्मित होता है। इस दौर में रैगिंग के ऊपर न्यायमूर्ति आनंद पाठक के द्वारा एक अनूठी पहल की। इस प्रकरण में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया था। समझौते के आधार पर रैगिंग लेने वाले छात्र द्वारा उसके विरूद्ध की गई प्रथम सूचना रिपोर्ट को निरस्त करने के लिए उच्च न्यायालय के समक्ष एक विविध फौजदारी प्रकरण प्रस्तुत किया गया। न्यायमूर्ति पाठक द्वारा इस आवेदन पर विचार करते हुए अपने आदेश में कहा गया कि रैगिंग के संबंध में कोई नरमी नहीं दिखाई जानी चाहिए। क्योंकि, यह एक छात्र के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक ढांचे को प्रभावित करता है। यह मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन भी है।

एक वरिष्ठ को एक कनिष्ठ छात्र की भावना और प्रतिभा को कुचलने की अनुमति नहीं दी जा सकती है, जो केवल मनोरंजन के लिए और अपने साथियों को प्रभावित करने के लिए किसी वरिष्ठ के विचलित व्यवहार के कारण खिल नहीं सकता। इस तरह की शारीरिक और मनोवैज्ञानिक गुंडागर्दी पर अंकुश लगाने की जरुरत है, ताकि कोई भी प्रतिभा विकृत वरिष्ठों के तुच्छ आनंद के बदले में बर्बाद न हो। अधिकारियों को एक और तथ्य के बारे में सावधान रहना होगा जो गलत निहितार्थ का है। किसी भी छात्र को झूठे बहाने से पीड़ित नहीं होना चाहिए, ताकि उपचार एक अभिशाप न बन जाए।

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उच्च न्यायालय खंडपीठ, ग्वालियर के समक्ष, याचिकाकर्ता के पिता याचिकाकर्ता के साथ उपस्थित हुए और उन्होंने रैगिंग करने वाले छात्र द्वारा किए गए कथित रैगिंग कदाचार के लिए बिना शर्त माफी मांगी। उन्हें इस तरह की गलती के लिए खैद था। न्यायालय द्वारा इससे पहले जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर को स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्दे दिया गया था। इसके अनुपालन में, विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार ने अध्यादेश संख्या-15 की प्रति साथ-साथ शिकायतकर्ता द्वारा की गई शिकायत पर समिति द्वारा की गई कार्यवाही सहित स्थिति रिपोर्ट दाखिल की। ऐसा प्रतीत होता है कि विश्वविद्यालय ने त्वरित कार्यवाही की थी। याचिकाकर्ता और शिकायतकर्ता को इस न्यायालय के प्रधान पंजीयक के पास उनकी पहचान और समझौते तक पहुंचने के इरादे का पता लगाने के लिए भेजा गया। दोनों पक्षों ने मामले को निपटाने की इच्छा व्यक्त की, क्योंकि वे मामले पर आगे मुकदमा नहीं चलाना चाहते थे। न्यायालय ने कहा कि सभी अपराध मुख्य रूप से शर्मनाक प्रकृति के होते हैं। इसके अलावा, कुछ अपवादों के साथ गैर-कंपाउंडेबल अपराधों के मामलों में भी, सर्वोच्च न्यायालय मामलों के कंपाउंडिग की अनुमति देता है।

विश्वविद्यालय और प्रबंधन को ऐसे विचलित व्यवहार दिखाने वाले अपराधियों या वरिष्ठ छात्रों के माता-पिता को बुलाना जरुरी है। यदि उनके माता-पिता को परामर्श के लिए बुलाया जाता है, तो यह उन छात्रों पर अनौपचारिक सामाजिक नियंत्रण उपाय के रूप में कार्य कर सकता है। इस तरह उस रैगिंग करने वाले अपराधी का अहंकार पिघल जाएगा। वह इस तरह की कार्यवाही से डर सकता है। छात्र अपने माता-पिता को उनके व्यवहार के लिए उनके संस्थान/परिसर में बुलाना पसंद नहीं करते हैं। यह उन्हें कमजोर और त्रुटिपूर्ण व्यवहार को दर्शाता है।

न्यायालय ने कहा कि चूंकि इस मामले में याचिकाकर्ता छात्र एक युवा छात्र है और उसे अपने कथित अव्यवहारिक व्यवहार के लिए खेद है। वह सामुदायिक सेवा करने का इरादा भी रखता है, इसलिए याचिकाकर्ता सचिन सिंह भदौरिया और शिकायतकर्ता अनुज राजावत द्वारा पसंद किए गए कंपाउंडिंग के लिए आवेदन की अनुमति दी जाती है। इस कारण न्यायालय ने इस याचिकाकर्ता सचिन सिंह भदौरिया से संबंधित अपराध के लिए की गई प्राथमिकी को रद्द कर दिया। अन्य अभियुक्तों के लिए प्राथमिकी को लंबित रखा जाएगा। न्यायमूर्ति आनंद पाठक ने इस छात्र को सजा के तौर पर याचिकाकर्ता जीवाजी विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में 7 दिनों की सामुदायिक सेवा करने का आदेश दिया। वह वहां ग्रंथपाल को सुबह 10ः30 बजे से दोपहर 2ः30 बजे तक या अपने खाली समय में सात दिनों के लिए प्रतिदिन कम से कम 4 घंटे पुस्तकों की व्यवस्था करने में मदद करेगा।

इस बीच, वह अपने पाठ्यक्रम में सुधार के लिए कुछ स्व-सहायता पुस्तकें भी पढ़ सकता है। ताकि, वह अपने विचलित व्यवहार के बारे में आत्मनिरीक्षण कर सके और यह सुनिश्चित कर सके कि उसे अपनी भविष्य की कार्रवाई के लिए कुछ अंतर्दृष्टि मिले। न्यायालय ने आशा की कि वह छात्र भविष्य में एक अच्छा नागरिक बन सकेगा। यह भी आशा व्यक्त की कि वह छात्र अहंकार के इस तरह के पिघलने से भावी पीढ़ी के लिए एक बेहतर व्यक्ति बन सकेगा। न्यायमूर्ति आनंद पाठक ने कहा कि जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर के कुलसचिव द्वारा इस न्यायालय के समक्ष लगभग सात दिनों के प्रवास के बारे में एक रिपोर्ट प्रस्तुत की जाएगी।

जीवाजी विश्वविद्यालय के कुलसचिव को विश्वविद्यालय और या जीवाजी विश्वविद्यालय के अधिकार क्षेत्र में आने वाले विभिन्न काॅलेजों के परिसरों में रैगिंग के खतरे से निपटने के लिए उठाए गए विभिन्न कदमों के बारे में तीन महीने के भीतर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करना होगी। इस फैसले के संदर्भ में रैगिंग के मामलों तथा इसकी रोकथाम एवं विधिक स्थिति पर भी विचार जरुरी है। देशभर के काॅलेजों में रैगिंग होना आम हो गया है। काॅलेज का नया सेशन शुरू होते ही रैगिंग भी शुरू हो जाती है। एक ओर जहां छात्र को काॅलेज में जाने की खुशी होती है, वहीं उनके मन में एक डर यह भी होता है कि कहीं काॅलेज में जाकर उनके साथ रैगिंग न हो। अक्सर इस रैगिंग से परेशान होकर कई छात्र आत्महत्या भी कर लेते हैं। अब यह आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। भारत में रैगिंग के खिलाफ कानून होने के बावजूद काॅलेजों में रैगिंग करना कम नहीं हो रहा है। कभी हंसी-मजाक में तो कभी बात-बात में रैगिंग की जा रही है।

भारत में रैगिंग के खिलाफ सख्त कानून है। ऐसे में अगर कोई भी छात्र रैगिंग करता है तो उसे जेल जाना पड़ सकता है। साथ ही जुर्माना भी देना पड़ता है। भारत में रैगिंग लाॅ प्रिवेंशन ऑफ़ रैगिंग एक्ट 1997 और इसके अमेंडमेंट्स के अंतर्गत आता है। साल 1999 में सर्वोच्च न्यायालय ने विश्व जागृति मिशन के तहत इस कानून को डिफाइन किया था। रैगिंग के बढ़ते मामलों को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगाने के लिए यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) को निर्देश दिए। इसके बाद यूजीसी ने भी रैगिंग के खिलाफ किसी भी तरह की लापरवाही न बरतने की हिदायत दी है। भारत में रैगिंग लाॅ प्रिवेंशन ऑफ़ रैगिंग एक्ट 1997 और इसके अमेंडमेंट्स के अंतर्गत आता है। शैक्षिक संस्थानों में रैगिंग पर रोक लगाने के लिए यह अधिनियम बनाया गया। इसके पहले और बाद में इसमें कई संशोधन हुए। साल 1999 में विश्व जागृति मिशन के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने रैगिंग को परिभाषित और इसकी विवेचना भी की थी। अगर इसके इतिहास पर नजर डालें, तो भारत में रैगिंग आजादी के पहले से ही हो रही है। पहले ये इंग्लिश और आर्मी स्कूलों में मजाक के तौर पर ली जाती थी। लेकिन, इसमें किसी प्रकार की हिंसा शामिल नहीं थी।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने खुलासा किया है कि पिछले साढ़ें पांच वर्षों में रैगिंग के शिकार होने के बाद कम से कम 25 छात्रों ने आत्महत्या की है। आरटीआई कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौर द्वारा दायर एक आरटीआई के जवाब में, यूजीसी ने कहा कि ये शिकायतें 1 जनवरी 2018 से 1 अगस्त, 2023 के बीच केंद्रीय निकाय में दर्ज की गई थीं। यूजीसी के अध्यक्ष मामिडाला जगदी कुमार ने ‘द हिंदू’ को बताया कि यूजीसी छात्रों के लिए एक समर्पित 24 गुना 7 एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन रखता है। उन्होंने कहा कि यूजीसी का रैगिंग रोधी प्रकोष्ठ छात्रों और शैक्षणिक अधिकारियों के बीच एक सेतु का काम करता है। हेल्पलाइन के माध्यम से प्राप्त रिपोर्ट और शिकायतों को समय पर कार्रवाई के लिए उपयुक्त अधिकारियों को भेज दिया जाता है। यूजीसी को हेल्पलाइन से छात्रों द्वारा अनुरोध की गई सहायता के प्रकार के बारे में जानकारी मिलती है। इससे हेल्पलाइन पर देशभर से बड़ी संख्या में काॅल आते हैं। यूजीसी मीडिया द्वारा रिपोर्ट किए जाने या शीकायतें मिलने पर मामलों को उठाता है।

यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि अधिकांश मामले इंजीनियरिंग या मेडिकल काॅलेजों से सामने आते हैं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों को छात्रों के लिए अपनी भावनाओं के बारे में स्वतंत्र रूप से बात करने के अवसर पैदा करने चाहिए। ऐसे छात्रों को समर्थन और समझ की आवश्यकता होती है। उन्हें विश्वविद्यालय के परामर्श केंद्र में पेशेवर मदद लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। छात्रों की आत्महत्या का मुद्दा एक जटिल और बहुआयामी चुनौती है। उच्च शिक्षण संस्थानों में रैगिंग के खतरे पर अंकुश लगाने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश होना चाहिए। सभी संस्थानों को रैगिंग को रोकने और छात्रों को चरम कदम उठाने से बचने में मदद की जाना जरुरी है।

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विनय झैलावत

लेखक : पूर्व असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल एवं इंदौर हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं