आओ आज बिहार के जलियांवाला नरसंहार की बात करते हैं…

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आओ आज बिहार के जलियांवाला नरसंहार की बात करते हैं…

कौशल किशोर चतुर्वेदी

भारत पर राज करते हुए दुष्ट अंग्रेजों ने भारतीयों पर कितने कहर ढाए हैं, इसका एक अंतहीन सिलसिला रहा है। जलियांवाला बाग नरसंहार को तो हम सब जानते हैं लेकिन इसी तरह की कई घटनाएँ देश के इतिहास में भरी पड़ी हैं। जहाँ भारतीय अपने राष्ट्र की आन, बान और शान के लिए शहादत देते रहे और दुष्ट अंग्रेज बर्बरता की सीमाएँ लांघते रहे। ऐसा ही एक जलियाँवाला बाग नरसंहार बिहार में हुआ था। इसे “तारापुर झंडा सत्याग्रह” के नाम से जानते हैं। “तारापुर झंडा सत्याग्रह” के शहीदों की स्मृति में तारापुर शहीद दिवस, प्रतिवर्ष 15 फरवरी को मनाया जाता है।

15 फरवरी 1932 को बिहार राज्य के मुंगेर के तारापुर के एक ब्रिटिश थाने पर पहली बार राष्ट्रीय झंडा फहराया गया, जिसपर ब्रिटिश पुलिस के हमले में 34 क्रांतिकारी शहीद हुए थे। 1931 में गांधी-इरविन समझौता भंग होते ही अंग्रेजी दमन के जवाब में युद्धक समिति के प्रधान सरदार शार्दुल सिंह कवीश्वर द्वारा जारी संकल्प पत्र कांग्रेसियों और क्रांतिकारियों में आजादी का उन्माद पैदा कर दिया था, जिसकी स्पष्ट गूंज 15 फरवरी 1932 को तारापुर के जरिये लन्दन ने भी सुनी थी। युद्धक समिति के प्रधान सरदार शार्दुल सिंह कवीश्वर के आदेश पर बिहार के वर्तमान संग्रामपुर प्रखंड के सुपोर-जमुआ गाँव में इलाके भर के क्रांतिकारियों, कांग्रेसियों और अन्य देशभक्त इकट्ठा हुए। बैठक में मदन गोपाल सिंह (ग्राम – सुपोर-जमुआ), त्रिपुरारी कुमार सिंह (ग्राम- सुपोर-जमुआ), महावीर प्रसाद सिंह (ग्राम-महेशपुर), कार्तिक मंडल(ग्राम- चनकी) और परमानन्द झा (ग्राम- पसराहा) सहित दर्जनों सदस्यों का धावक दल चयनित किया गया।

15 फरवरी 1932 को तारापुर थाना भवन पर राष्ट्रीय झंडा तिरंगा फहराने का निर्णय लिया गया था, जिसकी सूचना ब्रिटिश पुलिस को पहले ही मिल गई। इसी को लेकर ब्रिटिश कलेक्टर मिस्टर ईओ ली डाकबंगले में और एसपी डब्ल्यूएस मैग्रेथ सशस्त्र बल के साथ थाना परिसर में मौजूद थे।

15 फरवरी को धावक दल ने ब्रिटिश थाना पर धावा बोला तथा ध्वज वाहक दल के मदन गोपाल सिंह, त्रिपुरारी सिंह, महावीर सिंह, कार्तिक मंडल, परमानन्द झा ने तारापुर थाना पर तिरंगा फहरा दिया। नागरिकों और पुलिस बल के बीच संघर्ष और लाठीचार्ज हुआ, जिसमें कलेक्टर ईओ ली घायल हो गए। पुलिस बल ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाई जिसमें 34 क्रांतिकारी शहीद हुए एवं सैंकडों क्रान्तिकारी घायल हुए।

अंग्रेजी हुकूमत की इस बर्बर कार्रवाई में 34 स्वतंत्रता सेनानी शहीद हुए थे। इनमें से 13 की पहचान हुई, जबकि अन्य 21 अज्ञात ही रह गए। आनन-फानन में अंग्रेजी पुलिस बल ने शहीदों के शवों को वाहन में लादकर सुल्तानगंज भिजवाकर गंगा में बहा दिया था।

जिन 13 वीर सपूतों की पहचान हो पाई थी उनमें विश्वनाथ सिंह (छतिहार), महिपाल सिंह (रामचुआ), शीतल चमार (असरगंज), सुकुल सोनार (तारापुर), संता पासी (तारापुर), झोंटी झा (सतखरिया), सिंहेश्वर राजहंस (बिहमा), बदरी मंडल (धनपुरा), वसंत धानुक (लौढिया), रामेश्वर मंडल (पढवारा), गैबी सिंह (महेशपुर), अशर्फी मंडल (कष्टीकरी) तथा चंडी महतो (चोरगाँव) शामिल थे। इस घटना ने अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग गोलीकांड की बर्बरता की याद ताजा कर दी थी।

आकाशवाणी पर प्रसारित किए जाने वाले कार्यक्रम “मन की बात” में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी तारापुर में 15 फरवरी 1932 को ब्रिटिश हुकूमत द्वारा हुए भीषण नरसंहार पर चर्चा कर चुके हैं। नरेंद्र मोदी ने आजादी के मृत महोत्सव की शुरुआत में मन की बात में बताया था कि साथियो, हम आजादी के आंदोलन और बिहार की बात कर रहें हैं, तो, मैं, नमो ऐप पर ही की गई एक और टिप्पणी की भी चर्चा करना चाहूँगा। मुंगेर के रहने वाले “जयराम विप्लव” जी ने मुझे तारापुर शहीद दिवस के बारे में लिखा है। 15 फरवरी, 1932 को, देशभक्तों की एक टोली के कई वीर नौजवानों की अंग्रेजों ने बड़ी ही निर्ममता से हत्या कर दी थी। उनका एकमात्र अपराध यह था कि वे ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माँ की जय’ के नारे लगा रहे थे। मैं उन शहीदों को नमन करता हूँ और उनके साहस का श्रद्धापूर्वक स्मरण करता हूँ। मैं जयराम विप्लव जी को धन्यवाद देना चाहता हूँ। वे, एक ऐसी घटना को देश के सामने लेकर आए, जिस पर उतनी चर्चा नहीं हो पाई, जितनी होनी चाहिए थी।

तो आइए आज 15 फरवरी को हम सब मिलकर उन शहीदों को नमन करते हैं जिन्होंने भारत को आजाद कराने के लिए अंग्रेजों के अधीन थाने पर भारतीय झंडा फहराया और शहादत देकर हमेशा के लिए अमर हो गए। हम सब भारतीयों को इन शहीदों पर गर्व है…।

 

 

लेखक के बारे में –

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।

वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।