कुख्यात सीमा में आस्था का उजाला, घने जंगलों के बीच पहाड़ों की गोद में पांडवकालीन सिदेश्वर महादेव मंदिर

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कुख्यात सीमा में आस्था का उजाला, घने जंगलों के बीच पहाड़ों की गोद में पांडवकालीन सिदेश्वर महादेव मंदिर

अमझेरा से गोपाल खंडेलवाल की विशेष रिपोर्ट

अमझेरा: धार जिले की गंधवानी तहसील के ग्राम केलीकला के समीप, कुख्यात माने जाने वाले जामदा-भूतिया गांव की सीमा पर बसा सिदेश्वर महादेव शिवालय आज आस्था, प्रकृति और जनसहयोग का अनूठा उदाहरण बन चुका है। घने जंगलों और ऊंची पहाड़ियों के बीच स्थित यह शिवालय न सिर्फ श्रद्धालुओं का, बल्कि जंगलों में रहने वाले वनवासी समुदाय का भी प्रमुख धार्मिक केंद्र है।

पांडवों की तपोभूमि, आस्था की विरासत

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह शिवालय पांडवकालीन है। मंदिर के पुजारी राकेश शर्मा ने बताया कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने यहां विश्राम कर भगवान भोलेनाथ की आराधना की थी। वर्षों पहले यहां शिवलिंग एक पहाड़ के नीचे छोटे से मंदिर में प्रतिष्ठित था। दुर्गम रास्ता, पथरीली जमीन और घना जंगल—इन सबके बावजूद श्रद्धा कभी कम नहीं हुई।

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जनसहयोग से बदला इतिहास

स्थानीय और क्षेत्रीय ग्रामीणों ने मिलकर शिवालय के जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया। मंदिर के पूर्व पुजारी 108 रामलाल महाराज की अहम भूमिका रही, परिणामस्वरूप आज यहां भव्य मंदिर, सुव्यवस्थित परिसर और हजारों फलदार-फूलदार वृक्षों की हरियाली नजर आती है। मंदिर परिसर में लगाए गए वृक्षों को आज भी कुओं के पानी से सींचा जाता है, जो सामूहिक श्रम और संरक्षण की मिसाल है।

“पहाड़ काटकर बना आस्था का रास्ता”

पहले शिवालय तक पहुंचना आसान नहीं था। पहाड़ों और पथरीली जमीन के बीच कोई मार्ग नहीं था। स्थानीय ग्रामीणों और ग्राम पंचायत के सहयोग से पहाड़ काटकर रास्ता बनाया गया। सरपंच बबलू चौहान बताते हैं—“पहले मंदिर तक कोई सीधा रास्ता नहीं था। लोगों ने श्रमदान कर पहाड़ काटे, तब आज श्रद्धालु यहां आसानी से पहुंच पा रहे हैं।”

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“शिवरात्रि से भगोरिया का आगाज़’

इस शिवालय की सबसे अनूठी परंपरा है कि महाशिवरात्रि के दिन से ही यहां आदिवासी लोकपर्व भगोरिया का शुभारंभ माना जाता है। क्षेत्र के कई वन ग्रामों से मादल (डोल) दल यहां पहुंचते हैं। मादल की थाप पर घंटों नृत्य होता है। पारंपरिक वेश-भूषा में सजी महिलाओं की बड़ी भागीदारी इस आयोजन को और खास बनाती है। आस्था, लोक संस्कृति और उत्सव—तीनों का संगम यहां एक साथ देखने को मिलता है।

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कुख्यात पहचान से आस्था की पहचान तक

एक समय जिस क्षेत्र को भय और बदनामी से जोड़ा जाता था, आज वही स्थान आस्था का केंद्र बन गया है। घने जंगलों के रहवासी, दूरस्थ वन गांवों के श्रद्धालु और आसपास के अंचलों से लोग शिवरात्रि पर पैदल चलकर भी यहां दर्शन को पहुंचते हैं। मान्यता है कि शिवरात्रि के दिन सिदेश्वर महादेव के दर्शन से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

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घने जंगल, पहाड़ों की गोद, पांडवकालीन मान्यताएं, शिवरात्रि पर भगोरिया की थाप और जनसहयोग से खड़ा हुआ भव्य शिवालय—सिदेश्वर महादेव आज सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और प्रकृति का जीवंत अजूबा है।

कैसे पहुंचे

अमझेरा, राजगढ़, सरदारपुर व बलेड़ी मार्ग से पहुंचा जा सकता है
इंदौर–अहमदाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग-47 पर सरदारपुर से लगभग 25 किमी
अमझेरा से करीब 18 किमी की दूरी