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हाल-फिलहाल तो मोहन यादव के लिये यह संतोष की बात है कि उनके कार्यकाल के पहले चुनाव में उन्होंने आशातीत नतीजे दिये हैं।वैसे प्रारंभ से ये अटकलें लगाई जा रही थीं कि इस बार भाजपा को मप्र में 28-01 की स्थिति बरकरार रखना मुश्किल होगा। फिर 25 के आसपास भी चर्चायें आकर ठहरीं,लेकिन 29-0 की कल्पना तो नहीं ही रही होगी। भले ही राजनीतिक बयानबाजी होती रही हो। जब देश में भाजपा ने उल्लेखनीय संख्या में सीटें खोई हैं, तब मप्र में बढ़ोतरी मायने रखेगी। अब यह मोहन यादव पर निर्भर करेगा कि वे इस उपलब्धि पर केवल आत्म मुग्धता का भाव रखेंगे या इसे सामूहिक प्रयासों का नतीजा मानेंगे। इसे जिम्मेदारी का बढ़ जाना मानेंगे तो भाजपा परिवार में राजपथ पर आगे बढ़ सकते हैं।
मोहन यादव के हिस्से में संयोगवश जो कीर्ति दर्ज हुई है,वह उनके लिये एक अवसर भी है,चुनौती और खतरा भी। यह उन पर निर्भर करेगा कि वे अपने आगामी राजनीतिक जीवन को चमकाने के लिये इसे एक दुर्लभ मौका मानकर संघ-भाजपा की मंशानुरूप अपना सफर जारी रखना चाहेंगे या इस उपलब्धि को गले में टांगे-टांगे घूमने में लग जायेंगे। वैसे भाजपा की कार्य प्रणाली में किसी भी अनुकूल परिणाम को निजी खाते में डालने की परंपरा नहीं है। कार्यकर्ता आधारित राजनीतिक दल में अनुशासन की जंजीर में बंधकर जितना लंबा जा सकते हैं,उससे अधिक की अनुमति मांगना कमजोरी मानी जाती है और अपेक्षा रखना महत्वाकांक्षा। दोनों ही आपको कमजोर करने के लिये काफी होती हैं।
विसंगति पूर्ण यह है कि मप्र भाजपा अपनी इस महती उपलब्धि का एकतरफा उत्सव भी नहीं मना सकती। यदि केंद्र में भी निर्बाध रूप से सरकार बन रही होती तो बात अलग है। फिर भी मुख्यमंत्री मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष वी.डी. शर्मा को इसका साझा श्रेय दिया जाना चाहिये कि उन्होंने संगठन व सरकार के बीच तालमेल को टूटने नहीं दिया । मोहन यादव ने लोकसभा चुनाव में जितना परिश्रम किया है, वह मायने रखता है। वे प्रदेश की सभी सीटों पर तो पहुंचे ही,उप्र व बिहार में भी उनका उपयोग किया गया। आने वाले समय में वे अपनी सांगठनिक समझ को तराशकर दल हित में पिछड़ा वर्ग को साधे रहे तो दूसरी पंक्ति में वे ससम्मान दर्ज हो सकेंगे।