
महाभारत केवल महाकाव्य नहीं, जीवंत सभ्यता-दस्तावेज: राष्ट्रीय संगोष्ठी में गहन विमर्श
UJJAIN: भारतीय संस्कृति, इतिहास और दर्शन की अक्षय धरोहर महाभारत को लेकर उसके काल निर्धारण, सामाजिक संरचना और कूटनीतिक दृष्टि पर राष्ट्रीय स्तर पर गहन वैचारिक मंथन किया गया। सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय उज्जैन की हिंदी अध्ययनशाला एवं ललित कला अध्ययनशाला के संयुक्त तत्वावधान में राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय चरखारी महोबा तथा चातुर्वेद संस्कृत प्रचार संस्थानम् वाराणसी के सहयोग से आयोजित इस राष्ट्रीय व्याख्यान संगोष्ठी में देशभर से आए विद्वानों ने महाभारत को केवल एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता का जीवंत ऐतिहासिक दस्तावेज बताया। संगोष्ठी में इतिहास, खगोल, पुरातत्व, साहित्य और कूटनीति के समन्वित दृष्टिकोण से महाभारत पर सार्थक विमर्श हुआ।
● घटनाओं और ग्रहीय स्थिति से संभव है काल गणना: डॉ मोहन गुप्त
संगोष्ठी के मुख्य अतिथि पूर्व संभागायुक्त एवं कुलपति डॉ मोहन गुप्त ने महाभारत के काल विमर्श पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि महाभारत के समय निर्धारण के लिए अनेक ऐतिहासिक घटनाएं, खगोलीय स्थितियां और आंतरिक साक्ष्य उपलब्ध हैं। इन साक्ष्यों के आधार पर महाभारत की काल गणना संभव है। उन्होंने कहा कि रामायण और महाभारत को लेकर समाज में अनेक भ्रामक अवधारणाएं प्रचलित हैं, जिनसे सावधान रहना आवश्यक है। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पूर्व तर्क, प्रमाण और विवेक का सहारा लेना चाहिए, तभी चिंतन सही दिशा में आगे बढ़ता है।
● सार्वभौमिक और सार्वकालिक है महाभारत का संदेश: प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि महाभारत का संदेश किसी एक कालखंड या समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सार्वभौमिक और सार्वकालिक है। यह ग्रंथ भारतीय संस्कृति और परंपरा के अमूल्य रत्नों का विलक्षण भंडार है। उन्होंने कहा कि महाभारत के समय और तत्कालीन समाज जीवन को समझने के लिए आंतरिक साक्ष्यों के साथ-साथ पुरातात्विक और लोक साक्ष्य भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। महाभारत को मानव सभ्यता का जीवंत इतिहास कहा जा सकता है, जिसकी विशालता इसकी विश्वकोशीय विषयवस्तु और इसके शाश्वत जीवन संदेश से पूरी तरह मेल खाती है।
● कणिक कूटनीति आज भी प्रासंगिक: डॉ धर्मेंद्र कुमार गुप्त
प्राचार्य डॉ धर्मेंद्र कुमार गुप्त श्रावस्ती ने कणिक कूटनीति पर अपने व्याख्यान में कहा कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसके वैदेशिक और आंतरिक संबंधों की सुदृढ़ता पर निर्भर करती है। यदि ये संबंध कमजोर हों तो राष्ट्र का समग्र विकास बाधित हो जाता है। उन्होंने साम, दाम, दंड और भेद की नीति का उल्लेख करते हुए कहा कि शासक को अपनी दुर्बलताओं को पहचानकर उन्हें दूर करना चाहिए। शासक को कछुए के समान अपने अंगों की रक्षा करनी चाहिए, जिनमें उसकी सेना, राजकोष, मंत्री और गुप्तचर प्रमुख होते हैं।
● हिंदी साहित्य में महाभारत की समृद्ध परंपरा
प्रास्ताविकी एवं स्वागत भाषण समन्वयक प्रो जगदीश चन्द्र शर्मा ने प्रस्तुत किया। उन्होंने हिंदी साहित्य में महाभारत विषयक परंपरा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि रामायण, महाभारत और श्रीमद्भागवत पुराण भारतीय सांस्कृतिक चेतना के आधार स्तंभ हैं। श्रीमद्भागवत पुराण भारतीय संस्कृति, कला रूपों और जीवन दर्शन का विश्वकोश है। हिंदी साहित्य में महाभारत को आधार बनाकर अनेक महत्वपूर्ण और कालजयी रचनाएं सृजित हुई हैं।
● देशभर के विद्वानों की सहभागिता
संगोष्ठी में मुद्राशास्त्री डॉ रामचंद्र ठाकुर, पुरातत्वविद डॉ रमण सोलंकी सहित देश के विभिन्न भागों से आए विद्वानों ने सहभागिता की। कार्यक्रम का मंगलाचरण डॉ अनन्या श्रीवास्तव ने किया। राष्ट्रीय संगोष्ठी का संचालन संयोजक डॉ चंद्रकांत दत्त शुक्ल मऊ उत्तर प्रदेश ने किया। आभार प्रदर्शन सह-समन्वयक प्रो उमाशंकर त्रिपाठी महोबा द्वारा किया गया।





