Mahashivpuran: शिव के पवित्र ग्रंथ महाशिवपुराण की महिमा

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Mahashivpuran: शिव के पवित्र ग्रंथ महाशिवपुराण की महिमा

सुषमा व्यास राजनिधि

नित त्रिशुल ड़मरू सहित,
रमहु -विषम -भय भवहरण।
‘रामलग्न’वंदत चरण,
व्याल-भाल-भूषण धरण।

श्रावण –मास में महाशिवपुराण ग्रंथ को पढने का अत्यधिक महत्व है।
कहा जाता है कि कलयुग में सारे पापों को नष्ट करने वाला, परमार्थदायक शिवपुराण सब ग्रंथों में सबसे उत्तम और वेदान्तासार में सर्वोत्तम है।
ये ग्रंथों में कहा है, यदि कोई महर्षि वेदव्यास द्वारा कहे गये इस पुराण का एक या आधा श्लोक भी पढेगा तो वो सारे दुखों और परेशानियों से मुक्त हो जाता है।
इसे सावधानीपूर्वक पढने से एक अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त होता है तथा सभी देवताओं की पूजा का फल समान रूप से प्राप्त होता है।कहते हैं स्वयं श्रीशिव भगवान ने उपनिषद् रूपी समुद्र को मथकर उसमें से इसे निकाला है।
इसके एकबार पढने से सारे पापों से मुक्ति मिलती है।जो शिवालय या विल्व वृक्ष के नीचे बैठकर पाठ करे तो अद्भूत फल मिलता है और भैरव जी की मूर्ति के सामने पढो तो सारे मनोरथ पूर्ण होते हैं।
इसमें शिवजी के द्वारा बताये—अर्थ, धर्म ,काम, मोक्ष चारों की विवेचना है।इसमें शिवजी की लीला भी है और विज्ञान से जुड़े रहस्य भी।इसलिऐ महाशिवपुराण आदरणीय है।

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महाशिवपुराण में12संहिताओं की रचना हुई है।इन सब संहिताओं में कुल एक लाख श्लोक है।कहा जाता है सृष्टि के आरम्भ में इसे शिवजी ने सौ करोड़ श्लोक में कहा था।
अब कलयुग में मात्र 24000 श्लोक में सिमीत करके इसे सात संहिताओं में शेष कर दिया है।
यथा—1) वाद्येश्वर संहिता 2) रूद्र संहिता 3)शत रूद्र संहिता 4)श्री कोटिरूद्र 5) उमा 6)श्री कैलास और 7)वायवीय संहिता।
कलयुग में इस सप्त संहिता युक्त पुराण को सब जीवों के कल्याणार्थ पढा जाता है।ये वेदांत और विज्ञान से परिपूर्ण है, सिर्फ कहानी नहीं यह भक्ति, ज्ञान और विज्ञान का अद्भूत संगम है।
महाशिवपुराण में—तीन मूल नामों का बड़ा माहात्म्य है।
(आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी )
1—प्रणव पंचाक्षरी का माहात्म्य
2—विभूति माहात्म्य –(भस्म महिमा)
3—रूद्राक्ष माहात्म्य
1) प्रणव-पंचाक्षरी—ऊं नमः शिवाय –यह अकार, उकार, मकार, विन्दु, नाद सहित तथा शब्द, काल कला से युक्त है अर्थात –‘अ’, ऊ ,म इन तीन दीर्घअक्षरों और मात्राओं से ये पंचाक्षरी बना है।जो योगियों के ह्दय में निवास करता है।हर रोज इसका जाप करने से योगियों की तरहा इंद्रियां सशक्त होती है।ह्दय और मस्तिष्क की शिराओं में मजबूती प्राप्त होती है।इसका जाप हर स्त्री-पुरूष को बुद्धि और शक्ति प्रदान करता है।आध्यात्मिकता से देखा जाये तो शरीर में भगवती की प्राप्ति होती है।
ऊं नमः शिवाय नाद को तो बड़े बड़े वैज्ञानिको ने माना है।कहते हैं पूरे ब्रम्हाण्ड़ मेंइसकी गूंज विद्यमान है। इसलिये पंचाक्षरी जाप प्रत्येक मानव को करना चाहिये।
भस्म -महिमा—
शिवनाम, रूद्राक्ष और भस्म ये महापुण्य के रूप में शिव को अर्पित त्रिवेणी फल है।
शिवनाम गंगा है
विभूति जमना और
रूद्राक्ष सरस्वती।
निश्चित ही ये कथन आधुनिक युग में भी सार्थक है।आधुनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आंकलन हो सकता है।
विद्वान लोग इसे मस्तिष्क पर धारण कर सकते हैं।विभूति से ये अर्थ नहीं कि इसे पूरे शरीर में धारण करें।गाय के गोबर के कंड़े से बनी विभूतिविद्वतजन मस्तिष्क पर धारण करें।
या तो मध्यमा और अनामिका से मध्य में प्रतिलोम में अंगुष्ठ द्वारा त्रिपुण्ड़ रेखा खींचे या तीन ऊंगलियों से यत्नपूर्वक भस्म लेकर त्रिपुण्ड़ धारण करें।
त्रिपुण्ड़ धारण करने वाला अत्यंत मेहनती होता है। आलस्य रूपी राक्षस पा नहीं फटकता।
त्रिपुण्ड़धारक पर लक्ष्मी और सरस्वती हमेशा प्रसन्न रहती है अर्थात वह ज्ञानी और धनवान होता है।
मस्तिष्क पर भस्म से ठंड़क होने पर मस्तिष्क की इंद्रियां सदाचरण की ओर प्रेरित करती है।
ऐसा मनुष्य कभी भी हत्या, गौ हत्या, वीर हत्या या अन्य पाप नहीं करता है।

3) रूद्राक्ष- महिमा—कहते हैं शिव नेसहस्त्रों वर्षों तक तप किया परन्तु उनका मन संतुष्ट नहीं हुआ।तब शिव ने अपने नैत्र बंद किये , उन नैत्रों से मल की कुछ बूंदें पृथ्वी पर गिर पड़ी और उनसे यत्र तत्र रूद्राक्ष के वक्ष उत्पन्न हो गये।
शिव के प्रिय रूद्राक्ष वृक्ष गौड़ देश की भूमि—मथुरा, अयोध्या, लंका, मलयाचल, सह्य पर्वत , काशी और अन्य देशों में भी उत्पन्न हुऐ।
ऋषि मुनि इनमे काले, लाल , पीले का भेद जान लेते हैं।
आंवले के समान रूद्राक्ष श्रेष्ठ माना गया है।
बेर(फल) के समान मध्यम और चने के समान फलित नहीं होता है।
कहते हैं रूद्राक्ष धारण करने वाले का सुख और सौभाग्य बढता है।
तीन सौ साठ या साढे पांच सौ रूद्राक्ष दाने की लड़ी करके यज्ञोपवित भी धारण किया जाता है।इसे माला के योग्य बनाकर जाप करने से शरीर में सशक्तता प्रदान होती है।इसके स्पर्शमात्र से अनेक रोगों से मुक्ति मिलती है।इसको धारण करने वाले के पास बाहरी बाधाएं और कष्ट कभी नहीं आते।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी इसका अत्यन्त महत्व है।इसकी चुंबकिय शक्ति ह्दय और मस्तिष्क को रोग से दूर रखती है।
कहा जाता है जब भी इसे धारण किया जाये—मंत्रोच्चार और जप के द्वारा ही धारण किया जाये।शिव के इन त्रिवेणी फल का महाशिवपुराण में अत्यंत ही विस्तार से वर्णन है।
महाशिवपुराण धार्मिक ग्रंथों मेंअग्रणी स्थान रखता है।ये शिव द्वारा रचित और महर्षि वेदव्यास द्वारा पढा गया ग्रंथ ब्रम्हाण्ड़ की उत्पत्ति से ही पूजित ग्रंथ रहा है।श्रावण मास में इसका विशेष महत्व है।
हर स्त्री पुरूष को अपने सम्पूर्ण जीवन में कम से कम एक बार महाशिवपुराण को एक बार जरूर बांचना चाहिये।
जय जय जय शिव त्रिपुरारी काम।
अरि चंद्रमौली जय।।
जय गिरिजापति नीलकंठ।
प्रभु आशुतोष जय।
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