महाशिवरात्रि पर्व विशेष: चेतना और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का महापर्व

*विजय प्रकाश पारीक स्तंभकार*

52

महाशिवरात्रि पर्व विशेष: चेतना और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का महापर्व

*(प्रस्तुति – डॉ घनश्याम बटवाल मंदसौर)*

महाशिवरात्रि केवल एक परंपरा या कैलेंडर की तिथि मात्र नहीं है, बल्कि यह मानव अस्तित्व, खगोल विज्ञान और आध्यात्मिक पराकाष्ठा का एक दुर्लभ संगम है। जहाँ एक ओर यह पर्व शिव-शक्ति के मिलन का उत्सव है, वहीं दूसरी ओर यह स्वयं के भीतर छिपे ‘शिवत्व’ को पहचानने का विज्ञान भी है।

आध्यात्मिक गहराई: शून्य से अनंत की यात्रा

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ‘शिव’ का अर्थ है ‘वह जो नहीं है’। शिव उस असीम रिक्त स्थान (शून्य) के प्रतीक हैं जिससे संपूर्ण सृष्टि उत्पन्न होती है और अंततः उसी में विलीन हो जाती है। महाशिवरात्रि की रात को ‘अंधकार की महान रात्रि’ कहा जाता है। आमतौर पर अंधकार को नकारात्मक माना जाता है, लेकिन अध्यात्म में अंधकार पूर्ण विश्राम और असीमित क्षमता का प्रतीक है।

भगवान शिव का ‘तांडव’ नृत्य ब्रह्मांड के सृजन, संरक्षण और विनाश के चक्र को दर्शाता है। इस दिन भक्त जो उपवास रखते हैं, उसका गहरा अर्थ ‘इंद्रियों पर नियंत्रण’ है। जब हम अपनी बाहरी भूख और इच्छाओं को शांत करते हैं, तभी हम आंतरिक आनंद की ओर मुड़ पाते हैं। रात्रि जागरण का उद्देश्य केवल जागते रहना नहीं, बल्कि अज्ञानता की नींद से जागकर आत्म-साक्षात्कार की ओर कदम बढ़ाना है। शिव को अर्पित किया जाने वाला ‘बेलपत्र’ हमारे तीन गुणों—सत्व, रज और तम—को परमात्मा के चरणों में समर्पित करने का प्रतीक है।

प्रकृति का अनूठा उपहार

महाशिवरात्रि के पीछे का वैज्ञानिक तर्क पृथ्वी की स्थिति और मानव शरीर पर उसके प्रभाव से जुड़ा है। खगोलीय गणनाओं के अनुसार, फाल्गुन मास की इस चतुर्दशी को पृथ्वी का उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) एक विशिष्ट कोण पर होता है। इस विशेष भौगोलिक स्थिति के कारण, पृथ्वी पर मौजूद हर जीवित प्राणी के भीतर की ऊर्जा (प्राण शक्ति) स्वाभाविक रूप से ऊपर की ओर (Upward Movement) प्रवाहित होने लगती है।

आधुनिक विज्ञान मानता है कि मनुष्य की रीढ़ की हड्डी केवल हड्डियों का ढांचा नहीं, बल्कि संचार का मुख्य मार्ग है। महाशिवरात्रि की रात को रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर बैठने (जागरण करने) से इस प्राकृतिक ऊर्जा के प्रवाह का अधिकतम लाभ मिलता है। यह ऊर्जा शरीर के निचले केंद्रों (चक्रों) से उठकर ऊपरी केंद्रों (आज्ञा और सहस्रार चक्र) की ओर बढ़ती है, जिससे मानसिक स्पष्टता, शारीरिक स्वास्थ्य और आध्यात्मिक तीव्रता में वृद्धि होती है।

इसके अतिरिक्त, शिवलिंग पर जल या दूध के अभिषेक का वैज्ञानिक पक्ष ‘ऊर्जा के स्थिरीकरण’ से जुड़ा है। शिवलिंग को ऊर्जा का एक ‘कंडेंसर’ माना जाता है, और अभिषेक उस तीव्र ऊर्जा को संतुलित बनाए रखने की एक प्रक्रिया है, जो वातावरण में सकारात्मक तरंगें (Vibrations) पैदा करती है।

विज्ञान और श्रद्धा का मिलन

महाशिवरात्रि हमें यह संदेश देती है कि धर्म और विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। जहाँ विज्ञान हमें ऊर्जा के प्रवाह और शारीरिक लाभों के बारे में बताता है, वहीं अध्यात्म हमें उस ऊर्जा को भक्ति और करुणा में बदलने का मार्ग दिखाता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि हम केवल मांस और रक्त का शरीर नहीं हैं, बल्कि हम उस विराट ब्रह्मांडीय चेतना का हिस्सा हैं जिसे हम ‘महादेव’ कहते हैं।

ॐ नमः शिवाय हर हर महादेव 🎇