
मकरसंक्रांति सूर्य की उपासना का पर्व है लेकिन साथ ही यह भगवान विष्णु के अंतिम अवतार कल्कि के अवतरण तथा गंगा मैया और भीष्म पितामह से भी जुड़ा है..
डॉ विकास शर्मा
आइए जानिए, मकर संक्रांति का इतिहास मेरे साथ। हिन्दू पंचांग के अनुसार मकर संक्रांति प्रति वर्ष पौष माह में सूर्य के मकर राशि में प्रवेश वाले दिन मनाया जाता है जो ग्रेगेरियन केलेंडर के अनुसार सामन्यतः चौदह जनवरी या अधिवर्ष में पंद्रह जनवरी का दिन होता है।
यह ऋतू परिवर्तन का पर्व है, इस दिन से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण हो जाते हैं, अतः आज से क्रमशः दिन लम्बे और रातें छोटी होने लगेंगी। यह अवसर सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में संक्रमण/संक्रांति का प्रतीक है। यह त्योहार सौर देवता अर्थात सूर्य को समर्पित है, इस दिन पवित्र नदियों के जल में स्नान कर सूर्य देवता की पूजा की जाती है। मकर संक्रांति गंगा मैया के अवतरण और भीष्म पितामह के देह त्याग के साथ साथ भगवान श्री विष्णु जी के अंतिम अवतार, कल्कि के जन्म और आगमन से भी जुड़ी है। आइए जानते हैं विस्तार से…
मकर संक्रांति क्यों मनाया जाता है:
मकर संक्रांति मानाने के कई कारण हैं, सर्वप्रथम तो यह ऋतू परिवर्तन का समय है। इस दिन से लगातार रातें छोटी और दिन लम्बे होने लगते हैं इसका कारण यह है कि सूर्य देवता इस दिन दक्षिणायन से उत्तरायण हो जाते हैं अर्थात उत्तरी गोलार्ध की और झुकाव करते हैं जिसके फलस्वरूप दिन लम्बे और रातें छोटी हो जाती हैं। दूसरा कारण गंगा मैया के कुरुक्षेत्र में अवतरण और पितामह भीष्म के देह त्याग से जुडी है। गंगापुत्र भीष्म राजा शांतनु और गंगा मैया के पुत्र थे, इसी कारन उन्हें गंगापुत्र भीष्म कहा जाता है। राजा शांतनु सत्यवती से प्रेम करने लगे व उनसे विवाह करना चाहते थे, किन्तु सत्यवती के पिता ने राजा शांतनु के समक्ष यह शर्त राखी कि सत्यवती का पुत्र ही राजा बने, किन्तु ज्यष्ठ पुत्र होने के नाते भीष्म और फिर उसी की संतान को राजा बनने की उत्तराधिकारी थी। भीष्म ने अपने पिता के विवाह को पूर्ण करने के लिए आजीवन ब्रम्हचर्य व्रत का पालन करने और विवाह न करने के साथ साथ हस्तिनापुर के राज सिहांसन की आजीवन रक्षा की प्रतिज्ञा ले ली। इस भीषण प्रतिज्ञा के कारण देवदत्त को भीष्म नाम से जाना जाता है। इससे प्रसन्न होकर राजा शांतनु ने अपने पुत्र देवव्रत को इच्छा मृत्यु का वरदान दिया था।
अर्जुन के वाणों से घायल होने के बाद वे बाणों की शैया पर 58 दिनों तक लेटे रहे और सूर्य के उत्तरायण होने पर अपनी देह त्यागी थी। इस दिन देह त्यागने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। उस दिन माघ माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि थी अतः उस दिन को तिथि अनुसार भीष्म अष्टमी भी कहते हैं। अपने पुत्र दे देह त्याग से पूर्व माँ गंगा उनसे मिलने स्वयं कुरुक्षेत्र पधारी थीं इसीलिए इसे गंगा अवतरण दिवस भी कहते हैं, किन्तु यह भागीरथी द्वारा गंगा अवतरण से अलग घटना व तिथि है। इस दिन अर्जुन ने अपने वाणों के प्रयोग से कुरुक्षेत्र में भीष्म से मिलाने के लिए गंगा को प्रकट किया था जल पिलाकर उनकी तृष्णा शांत की थी। इस दिन को सूर्य से शनि के मिलन का दिन भी कहते हैं, इस मिलन से सूर्य और शनि के संबंधो में मधुरता आती है। मकर संक्रांति की तिथि पर ही 1863 में युवाओं के प्रेरणा स्रोत विवेकानंद जी का जन्म हुआ था। और आज ही के दिन स्वमी विवेकानंद जी के गुरुभाई अखंडानंद जी के शिष्य से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के द्वितीय सर संघचालक श्री गुरुजी ने दीक्षा प्राप्त की थी।
अन्य नाम :
मकर संक्रांति एक महत्वपूर्ण अखिल भारतीय सौर त्योहार है, जिसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। मकर संक्रांति को तमिलनाडु में पोंगल,गुजरात और उत्तराँचल में उत्तरायण, कश्मीर में संकरात, पश्चिम बंगाल में पौष संक्रांति, असं में माघ बिहू, हरियाणा व हिमाचल प्रदेश में माघी आदि नामो से भी जाना जाता है।
तिथि भिन्नताएं : मकर संक्रांति सौर चक्र द्वारा निर्धारित होती है और सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने की खगोलीय घटना के सटीक समय से मेल खाती है। यह आमतौर पर ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार 14 जनवरी को मनाई जाती है, लेकिन अधिवर्ष जिसे अंग्रेजी में लीप ईयर कहा जाता है के समय 15 जनवरी को मनाई जाती है। मकर संक्रांति की तिथि और समय मकर राशि (जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है) के नाक्षत्रिक समय के अनुरूप है।
एक वर्ष 365 दिन और 6 घंटे का होता है का होता है । ये अतिरिक्त 6 घंटे हर चौथे वर्ष में जाकर एक अतिरिक्त दिन का निर्माण कर लेते हैं इसीलिए हर चौथे वर्ष 365 दिन के स्थान पर 366 दिन पाए जाते हैं । इस अतिरिक्त दिन वाले वर्ष को अधिवर्ष कहते हैं । इसलिए, मकर संक्रांति हर अधिवर्ष में 14 के स्थान पर 15 जनवरी को पड़ती है। मकर राशि का नक्षत्र समय भी लीप वर्ष के कारण एक दिन से बदल जाता है। 21वीं सदी के अंत में, चार साल के चक्र में 15 जनवरी को मकर संक्रांति की घटनाएँ अधिक होंगी। और मकर संक्रांति वर्ष 2102 में पहली बार 16 जनवरी को होगी क्योंकि 2100 लीप वर्ष नहीं होगा।
मकर संक्रांति और स्नान परंपरा :
मकर संक्रांति की तिथि आध्यात्मिक रूप से बड़ी ही पवित्र मानी जाती है। इस दिन पवित्र नदियों के जल में डुबकी लगाकर स्नान करने का विशेष महत्त्व है। अतः लोग पवित्र नदियों के तट पर सुबह से ही स्नान के लिए एकत्रित हो जाते हैं। गंगा , यमुना , गोदावरी , कृष्णा, कावेरी, नर्मदा और ताप्ति नदियों के तट पर इस दिन श्रद्धालुओ का विशाल जमावड़ा होता है। सम्पूर्ण पृथ्वी पर मकर संक्रांति की तिथि ही वह दिन है जब एक साथ सबसे अधिक लोग नदियों में पवित्र स्नान कर अपने पिछले पाप कर्मो से मुक्ति पाते हैं।आज के दिन लोग सूर्यदेवता से खुशहाल और उर्जामय जीवन के लिए प्रार्थना करते हैं और साथ ही अपनी सफलताओं और समृद्धि के लिए भी धन्यवाद देते हैं। घर पर भी स्नान किया जाता है तो तिल डालकर स्नान स्नान करने से नदियों के जल से स्नान करने के सामान ही पुण्य प्राप्त होता है।
मकर संक्रांति का प्रसाद- तिल के लड्डू :
मकर संक्रांति में गुड व तिल के लड्डू का विशेष महत्व है। तिल का वानस्पतिक नाम सेसमम इंडिकम है, जो पेडिलीएसी कुल का सदस्य है। इसकी फसल खरीब की फसल के रूप में म.प्र. में लगाई जाती है। तिल विश्व की प्रथम तिलहन फसल मानी जाती है, जो 5-7 हजार वर्षों या इससे भी पूर्व से बोयी और उपयोग की जा रही है। वास्तव में तेल शब्द की उत्पत्ति ही तिल से हुयी है। सामान्य रूप से तिल को काली और सफेद तो प्रकार की तिल में विभाजित किया जा सकता है, किन्तु रंग, आकार, स्वाद और उत्पादन के हिसाब से इसके अधिक प्रकार भी हो सकते हैं। सफेद तिल भोज्य पदार्थ के रूप में तो वहीं काली तिल पूजा पाठ से लेकर तांत्रिक क्रियाओं के लिए महत्वपूर्ण है।
अगर आपके परिवार में कोई हृदय रोगी है तो फिर तिल और अलसी का तेल आपकी समस्याओं का समाधान करके आपकी सेहद को सुधार सकते हैं, क्योंकि इसमें ऐसे फैटी एसिड्स पाये जाते हैं, जो बेड कोलेस्ट्रॉल को कम करते हैं। इसके अलावा गठिया या वात रोग के उपचार में या फिर अगर जोड़ो के बीच द्रव्य कम हो गया है, और कार्टिलेज में भी नुकसान हो रहा है तो ऐसी परिस्थिति में भी जानकार तिल के तेल का सेवन और मसाज करने की सलाह देते हैं। किन्तु तिल की सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि इसमें मौजूद एंटीऑक्सिडेंट्स (सेसमिन) केंसर जैसी भयंकर बीमारी से लड़ने और इम्यून सिस्टम को मजबूत करने के लिए भी कारगर होते हैं।
मांसपेशियों की मजबूती के लिए तिल बेहतरीन ऊर्जा स्रोत है, पुराने समय मे पहलवान लोग गुड़- मूंगफली और गुड़- तिल का ही सेवन किया करते थे। आज भी गांव देहात में यह परंपरा कायम है। कही कही पर सामान्य जनों के लिए गुड़-चना प्रचलन में है। जबकि मेहनतकश लोगो की पसंद तो तिल या मूंगफली ही है। रूखी त्वचा वालो को भी तिल का सेवन करना फायदेमंद होता है। तिल के तेल से मसाज करने पर त्वचा पर पपड़ी बनना बंद हो जाती है। हाथो की चमड़ी उतारने पर तिल के तेल में रतनजोत का दूध जैसा रसायन मिलाकर लगाने से आराम मिलता है। और यह समस्या तुरंत समाप्त हो जाती है। आयुर्वेद में तिल का स्वभाव गर्म माना गया है, अतः ठंड का मौसम इसके सेवन के लिये सर्वोतम है। और तिल संग अगर गुड़ है तो यह सोने पे सुहागा जैसा है। प्रोस्टेट कैंसर और ब्लड कैंसर के रोगियों के लिये तिल का सेवन बहुत फायदेमंद होता है। साथ ही तिल में पाए जाने वाले सूक्ष्म और वृहद् पोषक तत्व तनाव को कम करके डिप्रेसन से निकलने में मदद करते हैं, जिसकी जरूरत केंसर रोगियों को सबसे ज्यादा है। इसमे मौजूद फॉस्फोरस हड्डियों को मजबूत बनाने का काम तो करता ही है, किन्तु यह कई तरह की मेटाबोलिक क्रियाओं में भी उपयोगी है।
हमारे भारतीय समाज मे तिल को तीज-त्यौहारों से लेकर सामान्य खान पान में शामिल किया गया क्योंकि हमारे बुजुर्ग जानते थे कि यह सिर्फ एक तिलहन नही बल्कि धरती माँ का अनमोल उपहार है। इसकी गजक, मूँगपट्टी, लड्डू, मुखवास, बिजोड़े, पापड़ आदि बेमिशाल भारतीय परंपराओं और भोजन की ओर इशारा करते हैं। बच्चों को स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए भी तिल अच्छा होता है, जो इन्हें गर्मी, ऊर्जा, हड्डियों की मजबूती और अधिक दुग्ध स्त्रावण की क्षमता प्रदान करता है। हमारे भारत के प्राचीन राजा महाराज भी अपने बालों की मालिश के लिये तिल के तेल का प्रयोग किया करते थे। तिल का प्रभाव भारतीय संस्कृति में कितना अधिक है इसकी जानकारी कई सारी कहावतों, मुहावरों और लोकोक्तियों में तिल शब्द के प्रयोग से समझा जा सकता है। जैसे तिल का ताड़ बनाना, ये ऐसी तिल्ली नही जिसमे से तेल निकले, तिल्ली भर जगह न होना, तिल रहे तो तेल निकले, नो मन तिल खाये फिर भी तिलेर के तिलेर ही रहे आदि आदि। बुंदेलखंडी कहावतों में भी दिन के घटने- बढ़ने को लेकर कही गई कहावत में एक स्थान पर तिल का उल्ल्लेख मिलता है, जिसमे माघ के माह में याने मकर संक्रांति के बाद सूर्य नारायण प्रतिदिन एक तिल जितना अधिक समय दिन को देते हैं और रातें क्रमशः छोटी होती जाती है। वह कहावत है- “कातक-बातक, अगहन-हड़िया अधन, पूस-कोनो धूस, माघ तिला तिल बाढ़े और फगना गोड़ पसारे”.
सामाजिक सन्देश :
संक्रान्ति का अर्थ है सम्यक दिशा में क्रांति जो सामाजिक जीवन का उन्नयन करने वाली तथा मंगलकारी हो। इसे नकारात्मकता से अधिक सकारात्मकता के प्रभाव के रूप में भी देखा जाता है। मकर संक्रांति का विशेष धार्मिक और पौराणिक महत्व भी है। तिल के पकवान लड्डू आदि बनाये जाते हैं और तिल का ही प्रसाद चढ़ाया जाता है। संक्रांति या सम्यक दिशा में क्रांति को हम प्रभु श्री राम चन्द्र जी के जीवन से अच्छी तरह समझ सकते हैं। प्रभु श्री राम ने वन वन भटकते हुए माता सबरी के जूठे बेर खाये, निषाद राज की मित्रता का मान रखा, जंगल में रहने वाले जीवों जैसे पशु,पक्षी, वानर, भालू, गिलहरी सभी को एकजुट कर सेना तैयार की और अधर्म के विरुद्ध युध्द किया। यही है मकर संक्रांति का सर्वोत्तम सन्देश कि सभी के साथ मिल जुलकर रहें, निरोगी रहें, धर्म सम्मत आचरण करें, और एक दुसरे के सुख दुःख में साथ बने रहें ।
मकर संक्रांति और पतंग :

जन्श्रुतियं में जानकारी मिलती है कि, मकर संक्रांति के दिन भगवान राम ने पतंग उड़ाई थी, जो बहुत ऊँची उड़कर इंद्रलोक तक पहुंच गई थी। इसी कारण से इस दिन पतंग उड़ाने की परंपरा शुरू हुई। इस विषय की जानकारी इन्टरनेट पर भी उपलब्ध है कि तमिल रामायण में भगवान् राम के पतंग उड़ाने का विवरण है, किन्तु धार्मिक जानकार इस विषय में एकराय प्रदर्शित नहीं करते ।
मकर संक्रांति और खिचड़ी:
खिचड़ी को राष्ट्रीय व्यंजन के रूप में स्वीकार किया जाता है। खिचड़ी का अर्थ होता है, सबसे मिलकर बना यानि एकता या संगठन का भाव वाला व्यंजन। मकरसंक्रांति के अवसर पर भारत के लगभग सभी घरों में खिचड़ी बनाने की परंपरा है। खिचड़ी का अर्थ होता है सबका घुल-मिल जाना या एक हो जाना। जैसे खिचड़ी में सब्जी-दाल- चावल-मसाले आदि भोजन के अलग अलग अवयव/रूप एक होकर अनूठा स्वाद प्रकट करते हैं। ठीक वैसे ही हम अलग अलग वेश भूसा, खान- पान, रंग- संस्कृति युक्त भारतीय भी एक दूसरे के साथ मिलकर सनातन खिचड़ी बन जाते हैं, एक होकर सिर्फ और सिर्फ सनातनी भारतीय कहलाते हैं। विधि के लिए तो आप जैसे चाहें सबको मिलाकर जैसे चाहें पका दें, बनेगी खिचड़ी ही। जैसे विश्व मे एकमात्र भाषा संस्कृत है जिसके शब्दो को कहीं भी किसी भी क्रम में रख दें वाक्य का अर्थ नही बदलता ऐसे ही हमारी खिचड़ी भी है, जैसे चाहें पका लें, कोई भी चीज आगे पीछे हो जाये तो भी न नाम बदलेगा न गुण और न ही स्वाद में कमी आयेगी। है न कमाल की बात। और एक खास बात बताऊं अगर इसे बिना तेल, घी के भी बनायेंगे तो भी स्वाद में कोई खास गिरावट नही आयेगी। विज्ञान की भाषा मे एक शब्द आता है सिंक- अर्थात इससे उसके अवयव को कितना भी निकाल लें या कितना भी जोड़ दें इसमी बदलाव नही होता। स्वाद के मामले में हम खिचड़ी को स्वादों का सिंक कह सकते हैं।

मकर संक्रांति हो और खिचड़ी की बात न हो, यह कैसे संभव है। इसीलिये कहानी घूम फिर कर खिचड़ी ओर चली आती है। खिचड़ी नाम का शाब्दिक अर्थ ही है- जो उपलब्ध है, उसे मिला जुला कर बनाया गया व्यंजन। तभी तो जब कोई अवांछित वस्तु किसी खास चीज में मिला देता है तो अनायास ही हमारे मुँह से निकल आता है, ये क्या किया भाई तुमने खिचड़ी कर दिया सब। मेरी राय में खिचड़ी सबसे आम भारतीय व्यंजन है, जो हर स्थान में बनाया, परोसा और पसंद किया जाता है। इसे स्वल्पाहार से लेकर भोजन और भोजन से लेकर प्रसाद सभी रुपों में स्वीकार किया जाता है। मरीज को खिलाना है तो पतली मूंगदाल की खिचड़ी, जमकर पेटभर उच्च पोषण प्राप्त करना हो तो समस्त सब्जी, दाल, चावल, घी, विविध मसाले आदि से इसे तैयार किया जाता है। प्रसाद के रूप में परोसना हो तो उच्च गुणवत्तायुक्त किन्तु कम मसालेदार यानि कि सात्विक तरीके से इसे बनाया जाता है। अलग अलग स्थानों में इसके अलग अलग नाम हैं, जिसकी जानकारी संलग्न छायाचित्र में दी हुई है, जो इंटरनेट से प्राप्त है।
यह एक ऐसा स्वादिष्ट भारतीय व्यंजन/ भोजन प्रसाद है, जिसे बनाना कभी सीखना नही पड़ता, मतलब यह है कि- जिस भी तरह चाहो झोक/ बघार लगा दो, फिर जितने भी कटे पिटे आइयम हैं प्याज, मिर्च, लहसन, कड़ी पत्ता, अनाब- शनाब सब डाल दो। थोड़ा भून लेने पर सब्जियां मटर, साग भाजी जो उपलब्ध हो डाल दो। मर्जी पड़े तब तक पकने दो। तब तक इधर उधर मटकना हो तो मटक आओ। आने के बाद चावल और दाल धोकर डाल दो। चम्मच चलाओ। स्वादानुसार नमक डाल दो। कुछ कम ज्यादा करना हो तो अभी भी विकल्प है। सब कुछ डाल दिया गया है कुछ और न बचा हो तो ढक्कन ढंक कर पकने के इंतजार करें। बीच बीच मे 2-3 बार चम्मच चलाते रहें वरना कभी कभी नीचे से थोड़ा जल जाता है। वैसे थोड़ा लग भी जाये तो चिंता न करें, स्वाद में और भी बढ़ोत्तरी होगी। अंत मे धीमी आंच पर पकाएं और पक जाने पर बिना इंतजार पेट पूजा कर लें।
आसान विधि, बेहतरीन स्वाद, उच्च पोषण गुणवत्ता, पाचक, हल्का और झंझट मुक्त होने के कारण यह कुआरों कि प्रिय तो है ही साथ ही परेशान शादिशुदाओं की राहत भी है। ज्यादातर परिवारों में धर्मपत्नी के मायके जाने पर भोजन के विकल्प में सबसे पहले यही सूझता है। कहीं नॉकरी पेशा लोगो के लिए यह समय बचाऊ भोजन है, तो कहीं बुजुर्गों का सहारा, कहीं पिकनिक की पसंद है तो कहीं पैसों की बचत। कहीं यह पोषण है तो कहीं हल्का भोजन। जिसने जिस रूप में चाहा वैसा अपनाया इसे। नाम की बात करें तो अवयवों और भाषा के हिसाब से थोड़े बहुत बदलाव के साथ खिचड़ी शब्द सर्वपरिचित है। लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी अगर देखा जाए तो इसमे कार्बोहायड्रेट, बसा, प्रोटीन, मिनरल्स और विटामिन्स सब कुछ होते हैं। और खिचड़ी के चार यार दही, पापड़, घी, अचार के साथ तो यह बेलेंस डाइट का फार्मूला बन जाती है। श्रद्धेय गुरुदेव स्वर्गीय दीपक आचार्य जी के साथ वनभ्रमन मे यही हमारा पसंदीदा भोजन होता था। स्वाद के दीवानों के लिये यह न तो स्वल्पाहार है, न ही भोजन, न ही प्रसाद और न ही दवा। अपने लिए तो यह अवसर है, खूब दबा के खाने का, समय बचाने का, पेट से लेकर मन तक संतुष्ट कर लेने का और परिवार एवं प्रियजनों के साथ पलों को अनमोल पलों में बदल लेने का। इति श्री खिचड़ी माता कथा…
भारतीय संस्कृति के विषय में संकलित यह जानकारी आपको कैसी लगी, बताइएगा।
धन्यवाद 
डॉ विकास शर्मा
वनस्पति शास्त्र विभाग
शासकीय महाविद्यालय चौरई
जिला छिंदवाड़ा (म.प्र.)





